भास्कर एक्सप्लेनर:मलेरिया से मौतों को कम करेगा मॉस्किरिक्स; सिर्फ 30% एफिकेसी वाली इस वैक्सीन को क्यों बताया जा रहा है चमत्कारिक, जानिए सब कुछ

2 महीने पहले

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बुधवार को जानलेवा मलेरिया के खिलाफ वैक्सीन को मंजूरी दे दी है। यह वैक्सीन पी. फाल्सिपेरम के खिलाफ कारगर है, जिसे दुनियाभर में सबसे खतरनाक मलेरिया पैरासाइट माना जाता है। यह दुनिया की पहली मलेरिया वैक्सीन है, जिसने क्लिनिकल डेवलपमेंट प्रक्रिया को पूरा कर लिया है और यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (EMA) से भी पॉजिटिव साइंटिफिक राय हासिल की है।

इस समय पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है। इसके खिलाफ आई वैक्सीन की इफेक्टिवनेस 95% तक बताई गई है। ऐसे में मलेरिया की वैक्सीन सिर्फ 30% इफेक्टिव है। इसके बाद भी इसे गेमचेंजर बताया जा रहा है। ऐसा क्यों? यह वैक्सीन क्या है? इसे किसने बनाया है? यह मलेरिया के खिलाफ जंग में किस तरह हथियार साबित होगी? आइए जानते हैं

क्या है मॉस्किरिक्स?

  • मॉस्किरिक्स (Mosquirix या RTS,S/ASO1 या RTS.S) दुनिया की पहली और अब तक की इकलौती मलेरिया वैक्सीन है। इससे अफ्रीका में बच्चों पर हुए ट्रायल्स में जानलेवा गंभीर मलेरिया को कमजोर करने में बड़ी सफलता हासिल की है।
  • यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (EMA) के मुताबिक मॉस्किरिक्स वैक्सीन 6 से 17 महीने के बच्चों को चार डोज में दी जाती है। यह मलेरिया के खिलाफ प्रोटेक्शन देती है। यह साथ ही हेपेटाइटिस B वायरस के साथ इन्फेक्शन को लिवर तक पहुंचने से भी रोकती है। EMA ने चेतावनी दी है कि वैक्सीन का इस्तेमाल सिर्फ इसी उद्देश्य के लिए किया जाए।
  • यह वैक्सीन ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन (GSK) ने 1987 में विकसित की थी। इसके बाद इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मॉस्किरिक्स के चार डोज देने पड़ते हैं और प्रोटेक्शन कुछ महीनों बाद बेकार हो जाता है। इसके बाद भी वैज्ञानिकों को लगता है कि यह वैक्सीन अफ्रीका में मलेरिया के खिलाफ प्रभावी रह सकती है।
  • 2019 के बाद मॉस्किरिक्स के 23 लाख डोज घाना, केन्या, मालावी में बच्चों को दिए गए। इस पायलट प्रोग्राम को WHO ने कोऑर्डिनेट किया। इन इलाकों में मलेरिया की वजह से अंडर-5 मॉर्टेलिटी रेट बहुत ज्यादा है।

मॉस्किरिक्स का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा?

  • मॉस्किरिक्स को 0.5 मिली इंजेक्शन के जरिए जांघ या कंधे की मांसपेशी में लगाया जाता है। बच्चे को तीन इंजेक्शन एक महीने के अंतर से दिए जाते हैं। चौथा इंजेक्शन तीसरे के 18 महीने बाद लगाया जाता है। मॉस्किरिक्स सिर्फ प्रिस्क्रिप्शन से लगाया जा सकता है।

मॉस्किरिक्स कैसे काम करती है?

  • EMA के वैज्ञानिकों के मुताबिक मॉस्किरिक्स का एक्टिव सबस्टेंस प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम पैरासाइट की सतह पर पाए जाने वाले प्रोटीन से बना है। जब किसी बच्चे को यह इंजेक्शन लगते हैं तो उसका इम्यून सिस्टम पैरासाइट से ‘फॉरेन’ प्रोटीन की पहचान कर उसके खिलाफ एंटीबॉडी बना लेता है।

मॉस्किरिक्स कितनी इफेक्टिव है?

  • वैक्सीन की इफेक्टिवनेस मलेरिया के गंभीर केसेस से बचाने में सिर्फ 30% है। यह ध्यान रखना होगा कि मलेरिया के खिलाफ यह इकलौती अप्रूव्ड वैक्सीन है। यूरोपीय यूनियन के ड्रग रेगुलेटर ने इसे 2015 में मंजूरी दी थी। यह भी कहा था कि इसके जोखिम के मुकाबले फायदे अधिक हैं। WHO ने भी कहा कि वैक्सीन के साइड इफेक्ट बहुत ही कम हैं, पर कभी-कभी बुखार के साथ अस्थाई दौरे पड़ सकते हैं।

मॉस्किरिक्स किस तरह मलेरिया को फैलने से रोक सकेगी?

  • इम्पीरियल कॉलेज ऑफ लंदन की इन्फेक्शियस डिजीज की प्रमुख आजरा घनी ने कहा कि इफेक्टिवनेस को देखें और यह मलेरिया वैक्सीन अफ्रीका में 30% असर भी दिखाए तो 80 लाख कम केस आएंगे और 40 हजार बच्चों की जान बचाई जा सकेगी। यह महत्वपूर्ण है।
  • घनी ने कहा कि जो लोग मलेरिया से प्रभावित देशों में नहीं रहते, उन्हें 30% कमी ज्यादा असरदार न लग रही हो, पर जो लोग उन इलाकों में रहते हैं उनके लिए मलेरिया सबसे बड़ी समस्या है। 30% उनके हिसाब से बड़ा आंकड़ा है और यह कई बच्चों की जान बचाएगी।

अब तक मलेरिया की वैक्सीन क्यों नहीं बन सकी थी?

  • कोविड-19 महामारी से लड़ने में सबसे तेजी से वैक्सीन बनी है। एक साल से भी कम समय में कई वैक्सीन इफेक्टिव साबित हुई हैं। इसने महामारी को रोकने में मदद भी की है। ऐसे में यह सवाल उठ सकता है कि मलेरिया की वैक्सीन में इतने साल क्यों लग गए।
  • दरअसल, एक बड़ी वजह यह है कि कोविड-19 के लिए WHO समेत दुनियाभर के ड्रग रेगुलेटर्स ने कई नियमों को बदला। कोविड-19 से पहले 1970 के दशक में मम्स की वैक्सीन सबसे तेजी से बनी थी, जिसे विकसित होने में करीब 4 साल लगे थे। वरना, अन्य वैक्सीन के लिए 10-15 साल सामान्य ही रहे हैं।
  • जहां तक मलेरिया की वैक्सीन का सवाल है तो प्रयास 80 साल से चल रहे थे। जिस वैक्सीन को अभी WHO ने मंजूरी दी है, वह भी 1987 में बन गई थी। दिक्कत यह है कि यह एक पैरासाइट से होने वाली बीमारी है। ये पैरासाइट के प्रजनन के लिए जरूरी गमीटोसाइट भी खून में रिलीज करते हैं।
  • जीवन के हर चरण पर पैरासाइट की सतह पर लगा प्रोटीन बदल जाता है। इस वजह से यह शरीर के इम्यून सिस्टम से बचता रहता है। वैक्सीन आमतौर पर इस प्रोटीन को टारगेट करके ही बनाई जाती हैं और इसलिए अभी तक इसमें सफलता नहीं मिल सकी थी।

वैक्सीन को 30 से अधिक साल क्यों लग गए?

  • GSK की वैक्सीन भी लंबे समय तक ट्रायल्स में फंसी रही थी। साल 2004 में द लैंसेट में छपी स्टडी कहती है कि 1-4 साल के 2000 बच्चों में मोजांबिक में जब ट्रायल किया गया तो वैक्सीनेशन के 6 महीने बाद इन्फेक्शन 57% कम हो गया था। धीरे-धीरे यह बेअसर होने लगी।
  • साल 2009-2011 के बीच 7 अफ्रीकी देशों में ट्रायल किया गया तो 6-12 हफ्ते के बच्चों में पहली खुराक के बाद कोई सुरक्षा नहीं देखी गई। हालांकि, पहली खुराक 17-25 महीने की उम्र पर देने से इसमें 40% इन्फेक्शन और 30% गंभीर इन्फेक्शन कम पाए गए।
  • रिसर्च जारी रही और साल 2019 में WHO ने घाना, केन्या और मालावी में एक पायलट प्रोग्राम शुरू किया, जिसमें 8 लाख से ज्यादा बच्चों को वैक्सीन दी गई। इसके नतीजों के आधार पर WHO ने वैक्सीन के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। 23 लाख से ज्यादा खुराकें देने के बाद घातक मामलों में 30% की गिरावट देखी गई है।

क्या अफ्रीका में कोरोना से खतरनाक है मलेरिया?

  • हां। मलेरिया अफ्रीका के लिए कोविड-19 से भी ज्यादा खतरनाक साबित हुआ है। WHO का अनुमान है कि 2019 में 3.86 लाख लोगों की मौत इस पैरासाइट के इन्फेक्शन की वजह से हुई है। इसकी तुलना में कोविड-19 की वजह से 18 महीनों में सिर्फ 2.12 लाख लोगों की मौत हुई है। WHO का कहना है कि मलेरिया के 94% केस और मौतें अफ्रीका में होती हैं, जिस महाद्वीप पर 1.3 अरब लोग रहते हैं।

अब तक कितने देश मलेरिया को खत्म कर चुके हैं?

  • दुनियाभर में ऐसे देशों की संख्या बढ़ रही है जिन्होंने मलेरिया को बहुत कम या खत्म होने की स्थिति में ला दिया है। 2000 में सिर्फ छह देश मलेरिया मुक्त थे, जो 2019 में बढ़कर 27 देश हो चुके हैं। यहां 100 से भी कम स्थानीय केस सामने आए हैं।
  • जो देश लगातार तीन साल तक जीरो मलेरिया केस रिपोर्ट करते हैं, उन्हें WHO से मलेरिया एलिमिनेशन (उन्मूलन) का सर्टिफिकेट मिलता है। पिछले दो दशकों में 11 देशों ने WHO से यह सर्टिफिकेट हासिल किए हैं। UAE (2007), मोरक्को (2010), तुर्कमेनिस्तान (2010), आर्मेनिया (2011), श्रीलंका (2016), किर्गीस्तान (2016), पैराग्वे (2018), उज्बेकिस्तान (2018), अल्जीरिया (2019), अर्जेंटीना (2019) और अल-सल्वाडोर (2021)।
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