भास्कर एक्सप्लेनरकट्टर औरंगजेब के भाई दारा शिकोह पर RSS नरम:5 यूनिवर्सिटी में बनेगा रिसर्च पैनल, सरकार भी कब्र की तलाश में जुटी; आखिर क्यों?

7 महीने पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय

'दारा शिकोह सच्चे हिंदुस्तानी और भारतीयता के प्रतीक थे।'

मुगल बादशाह शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह को लेकर ये बयान करीब तीन साल पहले 2019 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी RSS के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने दिया था।

संघ पिछले कई सालों से औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह को ‘सच्चा मुसलमान’ बताते हुए उनके जीवन और शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश में लगा है। हाल ही में संघ ने दारा के ऊपर रिसर्च प्रोजेक्ट भी शुरू किया है। आने वाले दिनों में संघ दारा के विचारों को आगे बढ़ाने के और भी नए प्रोजेक्ट शुरू करेगा। मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र है।

ऐसे में चलिए समझते हैं कि आखिर कौन थे दारा शिकोह? संघ क्यों दारा शिकोह को बता रहा है सच्चा मुसलमान और करवा रहा है उन पर रिसर्च?

दारा शिकोह पर रिसर्च के लिए AMU, जामिया जैसे संंस्थानों में संघ का प्रोजेक्ट

2017 में संघ प्रचारक चमल लाल की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में दारा शिकोह पर चर्चा हुई थी। इसके बाद 2019 में दारा शिकोह प्रोजेक्ट का काम संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल को सौंपा गया। गोपाल इस संबंध में कई बैठकें और वर्कशॉप आयोजित कर चुके हैं।

अब दारा शिकोह के जीवन और शिक्षाओं के प्रचार के लिए संघ ने एक प्रोजेक्ट शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत दारा शिकोह के कामों पर रिसर्च होगी और उनकी किताबों को अलग-अलग लैंग्वेजेज में ट्रांसलेट किया जाएगा।

हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी यानी AMU ने अपने दारा शिकोह सेंटर के तहत आपसी संवाद के लिए पैनल बनाने की घोषणा की है। इस पैनल में हिंदू इतिहास और आस्था पर रिसर्च करने वाले मुस्लिम और ईसाई विद्वानों और शिक्षाविदों को शामिल किया गया है। जल्द ही जामिया मिलिया इस्लामिया, मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी भी इसी तरह का पैनल बनाने जा रहा है।

नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी को दारा शिकोह पर रिसर्च में RSS की मदद के लिए जोड़ा गया है। साथ ही भारत इस्लामिक कल्चरल सेंटर को इस मामले पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ संपर्क बढ़ाने का काम सौंपा गया है।

दारा शिकोह की कब्र की तलाश के लिए सरकार ने बनाई थी कमेटी

2020 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने दारा शिकोह की कब्र की तलाश के लिए पुरात्तविदों की एक 7 सदस्यीय कमेटी बनाई थी। माना जाता है कि 1659 में दारा शिकोह की हत्या के बाद उसे औरंगजेब ने दिल्ली स्थित हुमायूं के मकबरे में दफन करवाया था। हुमायूं के विशाल मकबरे में 140 कब्रें हैं और वहां मकबरे के बीच में स्थित हुमायूं की कब्र को छोड़कर किसी और कब्र की पहचान मुश्किल है।

दिल्ली स्थित हुमायूं का मकबरा, जहां एक अज्ञात कब्र में दारा शिकोह को दफनाया गया था। केंद्र सरकार अब उसी कब्र की पहचान का जिम्मा पुरात्तव विभाग को सौंपा है। शाहजहां के शाही इतिहासकार मोहम्मद सालेह कम्बोह लाहौरी ने अपनी पुस्तक 'शाहजहां नामा' में लिखा है कि जब दारा शिकोह को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया, तब उनके शरीर पर मैले-कुचैले कपड़े थे। कुछ दिनों बाद औरंगजेब ने उनकी हत्या करवा दी। उन्हीं मैले और खून से सने कपड़ों में उनकी लाश को हुमायूं के मकबरे में दफना दिया गया।
दिल्ली स्थित हुमायूं का मकबरा, जहां एक अज्ञात कब्र में दारा शिकोह को दफनाया गया था। केंद्र सरकार अब उसी कब्र की पहचान का जिम्मा पुरात्तव विभाग को सौंपा है। शाहजहां के शाही इतिहासकार मोहम्मद सालेह कम्बोह लाहौरी ने अपनी पुस्तक 'शाहजहां नामा' में लिखा है कि जब दारा शिकोह को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया, तब उनके शरीर पर मैले-कुचैले कपड़े थे। कुछ दिनों बाद औरंगजेब ने उनकी हत्या करवा दी। उन्हीं मैले और खून से सने कपड़ों में उनकी लाश को हुमायूं के मकबरे में दफना दिया गया।

संघ क्यों दारा शिकोह के प्रचार में जुटा है?

पिछले कुछ सालों के दौरान सरकार ने दारा शिकोह के प्रचार में तेजी दिखाई है। 2016 में दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलकर दारा शिकोह रोड कर दिया गया था। 2017 में राष्ट्रपति भवन के पास के डलहौजी रोड का नाम बदलकर दारा शिकोह रोड कर दिया गया था।

  • दारा शिकोह के प्रचार की वजह क्या है? दरअसल, कई इतिहासकार औरंगजेब को कट्टरपंथी और दूसरे धर्मों से भेदभाव करने वाले मुसलमान के तौर पर देखते हैं। माना जाता है कि काशी, मथुरा समेत कई शहरों के चर्चित हिंदू मंदिरों को औरंगजेब ने ही तोड़वाया था।
  • 2019 में संघ के सीनियर लीडर कृष्ण गोपाल ने कहा था कि अगर औरंगजेब की जगह दारा शिकोह मुगल सम्राट बनते तो इस्लाम भारत में और फलता-फूलता और हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ पाते। इस एक बयान से संघ के दारा शिकोह के जीवन और कामों को प्रमोट करने की वजह पता चलती है।
  • जानकारों का मानना है कि, औरंगजेब की छवि हिंदू विरोधी है जबकि दारा शिकोह हिंदुओं के प्रति उदार थे और उन्होंने हिंदू उपनिषदों का अनुवाद कराकर हिंदू धर्म के प्रचार का काम किया था। इसी वजह से संघ दारा को प्रमोट करने में लगा है।
  • संघ दारा को उदार मुस्लिम चेहरा मानता है, इसलिए उन्हें मुस्लिमों के लिए एक आदर्श के तौर पर प्रमोट करना चाहता है।
  • एक्सपर्ट्स का मानना है, संघ दारा शिकोह को प्रमोट करके हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश भी देना चाहता है। संघ पिछले कई वर्षों से मुस्लिम समुदाय से जुड़ने के लिए उन तक अपनी पहुंच बढ़ाने में लगा है। दारा शिकोह का प्रमोशन उसी योजना का हिस्सा है।
  • जानकारों का कहना है कि संघ आज के समय में दोनों धर्मों के बीच समन्वय के धागे तलाश रहा है। इसकी बानगी संघ प्रमुख मोहन भागवत के हाल के एक बयान से भी मिलती है। काशी विश्वानाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद के विवाद पर मोहन भागवत ने हिंदुओं से हर मस्जिद में शिवलिंग की तलाश न करने की अपील की थी।
संघ और सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने दारा शिकोह के बारे में सही वर्णन न करने के लिए इतिहासकारों की आलोचना की थी और कहा था कि ये मुगल शहजादा कुछ इतिहासकारों की योजनाबद्ध साजिशों का शिकार हुआ था। संघ का कहना है कि दारा शिकोह ने दर्शन की एक ऐसी धारा पेश करने की कोशिश की जहां इस्लाम और हिंदुत्व एक साथ बह सकते हैं।
संघ और सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने दारा शिकोह के बारे में सही वर्णन न करने के लिए इतिहासकारों की आलोचना की थी और कहा था कि ये मुगल शहजादा कुछ इतिहासकारों की योजनाबद्ध साजिशों का शिकार हुआ था। संघ का कहना है कि दारा शिकोह ने दर्शन की एक ऐसी धारा पेश करने की कोशिश की जहां इस्लाम और हिंदुत्व एक साथ बह सकते हैं।

इस एक्सप्लेनर में आगे बढ़ने से पहले चलिए एक पोल में हिस्सा लेते हैं...

अब जानते हैं दारा शिकोह कौन थे, क्यों उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने वाला कहा जाता है?

4 पॉइंट्स में जानते हैं कि आखिर दारा शिकोह थे कौन?

  • दारा शिकोह का जन्म 20 मार्च 1615 को राजस्थान के अजमेर में हुआ था। शिकोह मुगल बादशाह शाहजहां और उनकी दूसरी पत्नी मुमताज महल के बेटे थे।
  • शाहजहां ने उनका नाम दारा रखा, जिसका फारसी में मतलब होता है खजानों या सितारों का मालिक।
  • दारा शिकोह के सगे और सौतेले 13 भाई-बहन थे, जिनमें से 6 ही जीवित बचे-जिनमें जहांआरा, शाह शुजा, रोशनआरा, औरंगजेब, मुराद बख्श और गौहारा बेगम शामिल हैं।
  • 1633 में दारा ने नादिरा बानो से शादी की थी। दारा ने अपने जीवन में एक ही शादी की थी।

अब बात दारा शिकोह की

दारा शिकोह को बेहद उदार और गैर-रूढ़िवादी मुसलमान माना जाता है। दारा की इस्लाम के साथ ही विशेष तौर पर हिंदू धर्म में गहरी रुचि थी। दारा न केवल इस्लाम बल्कि हिंदू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों का भी सम्मान करते थे। वह सभी धर्मों को समानता की नजर से देखते थे। ऐसा कहा जाता है कि कई हिंदू मंदिरों के लिए दारा ने दान भी किया था।

दारा ने हिंदू और इस्लाम हिंदू धर्म में समानताएं खोजने का प्रयास किया। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने 52 उपनिषदों और महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक किताबों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद कराया था। ताकि हिंदुओं के उपनिषदों को मुस्लिम विद्वान भी पढ़ सकें। साथ ही उन्होंने हिंदू उपनिषदों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार में भी मदद की थी।

दरअसल, दारा शिकोह द्वारा उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराने का फायदा ये हुआ कि ये यूरोप तक पहुंचा और वहां से उनका लैटिन भाषा में भी अनुवाद हुआ, इससे उपनिषदों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध होने में मदद मिली।

दारा शिकोह की सबसे प्रसिद्ध किताब , मजमा-उल-बहरीन ('द कॉन्फ्लुएंस ऑफ द टू सीज') यानी 'दो सागरों का मिलन है।' इस किताब में और वेदांत और सूफीवाद का तुलनात्मक अध्ययन है।

नादिरा से दारा शिकोह की शादी को मुगल इतिहास की सबसे महंगी शादियों में गिना जाता है। उस समय भारत भ्रमण पर आए इंग्लैंड के पीटर मैंडी ने लिखा है कि उस शादी में 32 लाख रुपए खर्च हुए थे। केवल दुल्हन के जोड़े की कीमत ही 8 लाख रुपए थी। ये तस्वीर दारा शिकोह के विवाह समारोह की है। इसमें घोड़े पर सवार दारा के पीछे उनके भाई शाह शुजा और औरंगजेब हैं। (तस्वीर साभार: रॉयल कलेक्शन ट्रस्ट, लंदन)
नादिरा से दारा शिकोह की शादी को मुगल इतिहास की सबसे महंगी शादियों में गिना जाता है। उस समय भारत भ्रमण पर आए इंग्लैंड के पीटर मैंडी ने लिखा है कि उस शादी में 32 लाख रुपए खर्च हुए थे। केवल दुल्हन के जोड़े की कीमत ही 8 लाख रुपए थी। ये तस्वीर दारा शिकोह के विवाह समारोह की है। इसमें घोड़े पर सवार दारा के पीछे उनके भाई शाह शुजा और औरंगजेब हैं। (तस्वीर साभार: रॉयल कलेक्शन ट्रस्ट, लंदन)

2. शाहजहां ने घोषित किया था उत्तराधिकारी, युद्ध से ज्यादा फिलॉसफी में थी रुचि

शाहजहां हमेशा से चाहते थे कि दारा शिकोह ही उनके उत्तराधिकारी बने, लेकिन ये कभी हो नहीं सका।1652 में शाहजहां ने दरबार में एक खास आयोजन किया और दारा को तख्त पर बैठाया और उन्हें शाहे-ए-बुलंद इकबाल यानी बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

इतिहासकारों का मानना है कि दारा शिकोह की रुचि युद्ध से ज्यादा फिलॉसफी और सूफीवाद में थी।

इतिहासकार अवीक चंदा ने अपनी किताब 'दारा शुकोह, द मैन हू वुड बी किंग' में लिखा है- ‘दारा शाहजहां को इतने प्रिय थे कि वह उन्हें सैन्य अभियानों पर नहीं भेजते और अपने साथ दरबार में अपनी आंखों के सामने ही रखना चाहते थे। वहीं शाहजहां ने अपने छोटे बेटे औरंगजेब को 16 साल की उम्र में ही सैन्य अभियान के लिए दक्षिण भारत भेज दिया था।’
इतिहासकार अवीक चंदा ने अपनी किताब 'दारा शुकोह, द मैन हू वुड बी किंग' में लिखा है- ‘दारा शाहजहां को इतने प्रिय थे कि वह उन्हें सैन्य अभियानों पर नहीं भेजते और अपने साथ दरबार में अपनी आंखों के सामने ही रखना चाहते थे। वहीं शाहजहां ने अपने छोटे बेटे औरंगजेब को 16 साल की उम्र में ही सैन्य अभियान के लिए दक्षिण भारत भेज दिया था।’

3. दारा, औरंगजेब से कैसे हारे उत्तराधिकार की जंग

1657 में शाहजहां के बीमार पड़ने के बाद मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार की जंग छिड़ गई। दारा को सबसे बड़ी चुनौती मिली छोटे भाई औरंगजेब से। 30 मई 1658 को दारा शिकोह और उसके दो छोटे भाइयों औरंगजेब और मुराद बख्श के बीच आगरा से 13 किलोमीटर दूर 'समुगढ़ की जंग' हुई। इस युद्ध में दारा की हार हुई।

जीत के बाद औरंगबेज ने आगरा के किले पर कब्जा जमा लिया और 8 जून 1658 को अपने पिता शाहजहां को गद्दी से हटाते हुए उन्हें आगरा में जेल में डाल दिया। मार्च 1659 में दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच फिर जंग हुई। अमजेर के पास हुई देवरई की जंग में दारा को फिर से शिकस्त मिली।

इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब' में लिखते हैं- ‘दारा कुछ घुड़सवारों के साथ आगरा के किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। पूरे शहर में सन्नाटा पसरा हुआ था, मानो वो किसी बात का शोक मना रहा हो। दारा शिकोह मुगल बादशाहत की लड़ाई हार गए थे।' (हाथी पर बैठे दारा शिकोह की अपने सैनिकों के साथ युद्ध के दौरान की प्रतीकात्मक तस्वीर)
इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब' में लिखते हैं- ‘दारा कुछ घुड़सवारों के साथ आगरा के किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। पूरे शहर में सन्नाटा पसरा हुआ था, मानो वो किसी बात का शोक मना रहा हो। दारा शिकोह मुगल बादशाहत की लड़ाई हार गए थे।' (हाथी पर बैठे दारा शिकोह की अपने सैनिकों के साथ युद्ध के दौरान की प्रतीकात्मक तस्वीर)

4. औरंगजेब ने बंदी बनाकर दारा शिकोह को दिल्ली की सड़कों पर घुमाया

युद्ध में हराने के बाद औरंगजेब ने दारा को जंजीरों में जकड़कर दिल्ली की सड़कों पर घुमाया था। इतिहासकारों का कहना है कि दारा शिकोह जनता में बहुत लोकप्रिय थे और औरंगजेब ऐसा करके ये दिखाना चाहता था कि केवल जनता में लोकप्रिय होने से कोई हिंदुस्तान का बादशाह नहीं बन सकता।

दारा के साथ औरंगबेज ने जो रोंगटे खड़े करने वाला सलूक किया, उसका जिक्र कई इतिहासकारों ने किया है।

फ्रेंच इतिहासकार फ्रांस्वा बर्नियर ने अपनी किताब 'ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर' में लिखा है- 'औरंगजेब ने दारा को जंजीरों में जकड़कर एक हाथी पर बैठाकर दिल्ली की उन सड़कों पर घुमावाया था, जहां उनकी कभी तूती बोलती थी। दुनिया के सबसे अमीर राजपरिवार का वारिस फटेहाल कपड़ों में अपनी ही जनता के सामने बेइज्जत हो रहा था। उनकी ये हालत देखकर वहां खड़े लोगों की आंखें भर आईं।' (इस तस्वीर में औरंगजेब का चित्रण है)
फ्रेंच इतिहासकार फ्रांस्वा बर्नियर ने अपनी किताब 'ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर' में लिखा है- 'औरंगजेब ने दारा को जंजीरों में जकड़कर एक हाथी पर बैठाकर दिल्ली की उन सड़कों पर घुमावाया था, जहां उनकी कभी तूती बोलती थी। दुनिया के सबसे अमीर राजपरिवार का वारिस फटेहाल कपड़ों में अपनी ही जनता के सामने बेइज्जत हो रहा था। उनकी ये हालत देखकर वहां खड़े लोगों की आंखें भर आईं।' (इस तस्वीर में औरंगजेब का चित्रण है)
इतिहासकार अवीक चंदा लिखते हैं कि जब दारा को जंजीरों में जकड़कर औरंगजेब के सैनिक दिल्ली की सड़कों पर घुमा रहे थे तो 'एक भिखारी ने उनसे चिल्लाकर कहा कि एक जमाने में जब आप धरती के मालिक हुआ करते थे, तो मुझे कुछ दे कर जाते थे। आज आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है। ये सुनते ही दारा ने अपने कंधे पर रखी शॉल उठाकर भिखारी की ओर फेंक दी थी।'
इतिहासकार अवीक चंदा लिखते हैं कि जब दारा को जंजीरों में जकड़कर औरंगजेब के सैनिक दिल्ली की सड़कों पर घुमा रहे थे तो 'एक भिखारी ने उनसे चिल्लाकर कहा कि एक जमाने में जब आप धरती के मालिक हुआ करते थे, तो मुझे कुछ दे कर जाते थे। आज आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है। ये सुनते ही दारा ने अपने कंधे पर रखी शॉल उठाकर भिखारी की ओर फेंक दी थी।'

कुछ ही दिनों बाद 30 अगस्त 1659 को औरंगजेब ने दारा का सिर धड़ से अलग करवा दिया। औरंगजेब ने दारा का सिर एक थाली में सजाकर आगरा में कैद शाहजहां को कीमती तोहफा कहकर भिजवाया था। जब शाहजहां ने थाली से कपड़ा हटाया तो दारा का कटा सिर देखकर उनकी चीख निकल गई। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, दारा के धड़ को दिल्ली स्थित हुमायूं के मकबरे के पास दफन किया गया था, जबकि उनके सिर को औरंगजेब ने आगरा में ताजमहल के पास दफन करवाया था।

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