अडाणी-अंबानी एक दूसरे के कर्मचारियों को नहीं देंगे नौकरी:देश की 2 सबसे बड़ी कंपनियों के बीच हुआ ‘नो पोचिंग एग्रीमेंट’ आखिर क्या है?

6 दिन पहले

सुभाष गुप्ता 'रिलायंस पावर' में मैनेजर हैं। उन्हें 'अडाणी पावर' में सीनियर मैनेजर की वेकैंसी के बारे में पता चलता है। करिअर ग्रोथ के लिहाज से सुभाष ये नौकरी पाना चाहते हैं, लेकिन अब उनके रास्ते बंद हो चुके हैं। इस काल्पनिक किरदार सुभाष गुप्ता जैसी स्थिति फिलहाल 4 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की है।

बिजनेस इनसाइडर के मुताबिक देश के दो सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप रिलायंस और अडाणी ने एक समझौता किया है। इसके तहत इनके कर्मचारियों को एक-दूसरे के यहां नौकरी नहीं मिलेगी। इस नए समझौते का नाम है- ‘नो-पोचिंग एग्रीमेंट।’ भास्कर एक्सप्लेनर में हम नो-पोचिंग एग्रीमेंट को आसान भाषा में जानेंगे…

सबसे पहले ग्राफिक में रिलायंस और अडाणी ग्रुप की ताकत जान लीजिए…

एक-दूसरे के सेक्टर में एंट्री के बाद हुआ एग्रीमेंट
मई 2022 में हुए इस डील की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता ऐसे वक्त में हुआ, जब अडाणी कंपनी उस बिजनेस में उतर रही थी, जिसमें रिलायंस पहले से बड़ा बिजनेस प्लेयर है। दरअसल अडाणी ने पिछले साल 'अडाणी पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड' के साथ पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र में एंट्री की है, इस बिजनेस में रिलायंस पहले से ही बड़ी कंपनी है।

इसी तरह हाई-स्पीड डेटा यानी इंटरनेट सेक्टर में भी अडाणी ने 5G स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगाई है। इस बिजनेस में भी रिलायंस देश की सबसे बड़ी कंपनी है।

समझौते की वजह से मुकेश अंबानी की कंपनियों में काम करने वाले 3.80 लाख से ज्यादा कर्मचारी अब अडाणी की कंपनी में काम नहीं कर पाएंगे। वहीं, अडाणी की कंपनी में काम करने वाले 23 हजार से ज्यादा कर्मचारी मुकेश अंबानी की किसी कंपनी में नौकरी नहीं कर पाएंगे।

अब एक ग्राफिक्स में देखते हैं कि कौन से बिजनेस में अडाणी और अंबानी दोनों आमने-सामने हैं…

1890 में US के शरमन एक्ट से आया है ‘नो-पोचिंग एग्रीमेंट’ का कॉसेप्ट
1890 में अमेरिकी संसद से एक बिल पास हुआ था, जिसे शरमन एक्ट के नाम से जाना गया था। इस एक्ट का सेक्शन- 1, 2 राज्यों के ट्रेड को किसी भी तरह से प्रभावित होने से रोकने की बात कहता था। बाद में इस कानून का रूप समय और जरूरत के हिसाब से बदलता गया।

2010 में अमेरिका में नो-पोचिंग एग्रीमेंट से जुड़ा कानून उस वक्त लाइम-लाइट में आया, जब अमेरिका के कानून विभाग ने सिलिकॉन वैली की गूगल, एडोब, इंटेल और एपल जैसी कंपनियों के खिलाफ एक शिकायत दर्ज की।

इस शिकायत में कहा गया कि ये कंपनियां आपस में एक-दूसरे के कर्मचारियों को नौकरी नहीं दे रही थीं। साथ ही कर्मचारियों की पद, सैलरी और सुविधाएं फिक्स कर दी गई थीं।

इसे क्रिमिनल केस मानकर अमेरिकी लॉ डिपार्टमेंट ने जांच के आदेश दिए थे। हालांकि, कानूनी तौर पर इसमें नियमों को तोड़ने जैसा कुछ भले ही नहीं मिला हो, लेकिन जांच में ये जरूर पता चला कि इससे अमेरिका के लाखों कर्मचारियों के जीवन पर बुरा असर पड़ा था।

1990 में स्किल्ड लेबर की कमी से ‘वॉर फॉर टैलेंट’ में आई तेजी
1990 को ग्लोबलाइजेशन का दौर माना जाता है। इस वक्त ‘टैलेंट वॉर’ के नाम से एक नया टर्म पहली बार चर्चा में आया। इस वक्त दुनियाभर की कंपनियों में स्किल्ड लेबर की जबरदस्त कमी महसूस हो रही थी। टैलेंटेड कर्मचारी बेहतर अवसर और सुविधाओं को देख एक कंपनी से दूसरी कंपनी चले जाते थे। इसे ही ‘वॉर फॉर टैलेंट’ के नाम से जाना गया।

इसे रोकने और कर्मचारियों को लंबे समय तक अपनी कंपनी से जोड़े रखने के लिए मैनेजमेंट कई तरीके अपनाती थी। इनमें से ही एक तरीका था- ‘नो-पोचिंग एग्रीमेंट।’

‘वॉर फॉर टैलेंट’ को रोकने के लिए शुरू हुआ ‘नो-पोचिंग एग्रीमेंट’
‘नो-पोचिंग एग्रीमेंट’ को दूसरे शब्दों में ‘नो हायर एग्रीमेंट’ भी कहा जाता है। यह दो या अधिक कंपनियों के बीच किया गया ऐसा समझौता होता है, जिसके तहत एक कंपनी में काम करने वाले को समझौते में शामिल दूसरी कंपनी में नौकरी नहीं मिलती है। या फिर नौकरी मिलती है, तो उनके पद, पैसा और सुविधाओं में कोई बढ़ोतरी नहीं होती है।

इस तरह का समझौता आमतौर पर तब खत्म हो जाता है, जब कोई कंपनी अपने वादे को तोड़कर समझौते में शामिल कर्मचारी को नौकरी देती है। इस तरह के ज्यादातर एग्रीमेंट दो या ज्यादा कंपनियों के बीच कानूनी तरीके से नहीं होती है। कई कंपनियां इस तरह के एग्रीमेंट को इंफॉर्मली करती है, जिससे स्किल्ड मैन पावर का संतुलन बना रहे।

भारत में स्किल्ड लेवर की कमी से बढ़ रहा ‘वॉर फॉर टैलेंट’
2020 में कामगारों के मामले में चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर भारत था। ‘मैनपॉवर टैलेंट शॉर्टेज सर्वे’ के मुताबिक भारत दुनिया के उन टॉप 4 देशों में शामिल है, जहां सबसे ज्यादा स्किल्ड कर्मचारियों की कमी है।

यही वजह है कि भारत में बड़ी कंपनियों के सामने तेजी से ‘वॉर फॉर टैलेंट’ बढ़ रहा है। जिन देशों में कम स्किल्ड कर्मचारी हैं, वहां मैनपॉवर तेजी से महंगे हो रहा है। ऐसे में भारत में भी अब कंपनियों के बीच इस तरह के एग्रीमेंट हो रहे हैं। आने वाले समय में बड़ी कंपनियों के बीच और भी इस तरह के एग्रीमेंट देखने को मिल सकते हैं।

इस तस्वीर से आप वॉर ऑफ टैलेंट के पूरे मामले को समझ सकते हैं। 1990 के बाद कुशल कर्मचारियों की दुनिया में भारी कमी महसूस हुई है।
इस तस्वीर से आप वॉर ऑफ टैलेंट के पूरे मामले को समझ सकते हैं। 1990 के बाद कुशल कर्मचारियों की दुनिया में भारी कमी महसूस हुई है।

राइवल कंपनियों के बीच नहीं हो सकता है ऐसा एग्रीमेंट- एक्सपर्ट
कॉरपोरेट लॉ फर्म में काम करने वाले एक एक्सपर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो 2 कंपनियों को ऐसे समझौतों में प्रवेश करने से रोक सके, जब तक की दोनों कंपनियां एक सेक्टर में राइवल न हो। इतना ही नहीं इन कंपनियों के बीच एग्रीमेंट समाप्त होने के बाद भी एक कंपनी के कर्मचारी दूसरी कंपनी में तुरंत शामिल नहीं हो सकते।

ऐसा इसलिए क्योंकि एग्रीमेंट खत्म होने के बाद कुछ समय का कूलिंग पीरियड होता है। कूलिंग पीरियड के बाद कोई भी कर्मचारी किसी भी कंपनी को जॉइन कर सकते हैं। इस तरह के ज्यादातर एग्रीमेंट दो कंपनियों के बीच ट्रस्ट के आधार पर होता है।

दुनिया में कितना कामयाब है ‘नो-पोचिंग एग्रीमेंट’?
अगस्त 2018 में अमेरिका में फास्ट फूड चेन की 7 बड़ी कंपनियों ने अपने सभी फ्रेंचाइजी में 'नो-पोचिंग एग्रीमेंट' को खत्म करने का ऐलान किया। इन 7 फास्ट फूड कंपनियों में आरबीज, आंटी एंस, बफेलो वाइल्ड विंग्स, कार्ल्स जूनियर, सिनाबोन, जिमी जोन्स और मैकडॉनल्ड्स जैसे बड़े नाम शामिल थे।

इन कंपनियों ने फैसला किया था कि वह आपस में किसी भी कंपनी के कर्मचारी को बड़े पॉजिशन और ज्यादा पैसा देकर नौकरी नहीं देंगे। ऐसे में अच्छे कर्मचारी या तो इन सभी कंपनियों में नौकरी करने से या फिर नौकरी बदलकर दूसरी कंपनी में जाने से बचते थे।

इसका असर इन कंपनियों के ग्रोथ पर भी देखने को मिल रहा था। यही वजह था कि एग्रीमेंट होने के कुछ महीने बाद ही सभी कंपनियों से इसे खत्म करने का फैसला किया।

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