मुस्लिमों ने नाबालिग पत्नी से संबंध बनाया तो पॉक्सो-एक्ट लगेगा:केरल हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और 4 हाईकोर्ट के फैसलों को किनारे किया

15 दिन पहले

सबसे पहले हाईकोर्ट के फैसले को पढ़िए…

‘मुस्लिम पर्सनल लॉ में नाबालिगों की शादी वैध होने के बावजूद POCSO एक्ट के तहत इसे अपराध माना जाएगा।’

मुस्लिम विवाह के एक मामले में 18 नवंबर 2022 को केरल हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने ये फैसला सुनाया। इसके साथ ही नाबालिग पत्नी से यौन संबंध बनाने वाले पति की जमानत अर्जी भी खारिज कर दी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ के नियमों और 4 हाईकोर्ट के पुराने फैसलों से अलग केरल हाईकोर्ट का ये फैसला ऐतिहासिक माना जा रहा है।

आज के भास्कर एक्सप्लेनर में केरल हाईकोर्ट के फैसले और इसके मायने हम आसान भाषा में बता रहे हैं…

मामला क्या है?
मार्च 2021 की बात है। 31 साल के खलीदुर्रहमान ने 16 साल की फरीहा (बदला हुआ नाम) को अगवा कर शादी कर ली। एक रोज जब फरीहा ने गर्भवती होने की आशंका जताई तो खलीदुर्रहमान उसे एक स्वास्थ्य केंद्र ले गया। लड़की को नाबालिग देखकर स्वास्थ केंद्र के डॉक्टर ने पुलिस को खबर कर दी, इसके बाद पुलिस ने 5 से ज्यादा धाराओं में आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया।

इन धाराओं में IPC 366 यानी शादी के लिए किडनैप करना, IPC 376 (2) यानी नाबालिग के शरीर को नुकसान पहुंचना, IPC 376 (3) यानी जबरन शारीरिक संबंध बनाना, POCSO की धारा 5 (j) (ii) यानी नाबालिग लड़की का रेप, POCSO की धारा 5 (i) और POCSO की धारा 6 में 10 साल या आजीवन जेल की सजा का प्रावधान है।

आरोपी ने बचाव में क्या दलीलें दी?
केरल हाईकोर्ट में अपनी जमानत याचिका दायर करते हुए आरोपी शख्स ने अपने बचाव में ये तर्क दिया है...

  • आरोपी ने कहा कि उसने पश्चिम बंगाल से होने की वजह से पश्चिम बंगाल एक्ट XXVI, 1961 के तहत शादी की है, जिसके मुताबिक पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी की उम्र के बाद मुस्लिम लड़की की शादी वैध है। जिस दिन केस दर्ज हुआ, उस समय लड़की की उम्र 15 साल 8 महीना था। ऐसे में ये शादी वैध है।
  • दूसरा तर्क ये दिया कि 3 हाईकोर्ट ने 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी को पर्सनल लॉ के तहत सही बताकर पहले भी ऐसे मामलों को खारिज किया है। ऐसे में इस मामले को भी खारिज किया जाना चाहिए।

हालांकि, अदालत ने उसकी सभी दलीलों को मानने से इनकार करते हुए उसकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

केरल हाईकोर्ट ने 3 हाईकोर्ट के फैसलों को ये कहते हुए मानने से किया इनकार

फैसला सुनाते हुए केरल हाई कोर्ट ने इसी तरह के जिन फैसलों को मानने से इनकार किया, वो इस तरह से हैं…

  • जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला।
  • फिजा और अन्य बनाम दिल्ली राज्य सरकार और अन्य के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला।
  • मोहम्मद वसीम अहमद बनाम राज्य मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला।

इन मामलों में फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश को लेकर केरल हाईकोर्ट के जज बेचू कुरियन थॉमस ने कहा- ‘ऐसे मामलों में इससे पहले सुनाए गए सम्मानित जजों के फैसलों को मैंने पढ़ा है। मैं उन फैसलों की इस बात से सहमत नहीं हूं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी को पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।’

मुस्लिम शादी वैध होने के बावजूद लड़की नाबालिग तो दूल्हा अपराधी होगा
कोर्ट में फैसला सुनाते हुए जज ने कहा कि जांच में पाया गया है कि नाबालिग लड़की के माता-पिता की जानकारी के बिना आरोपी ने उसे बहला-फुसला कर अगवा किया है।

इस कथित विवाह के समय लड़की नाबालिग थी। ऐसे में ये विवाह कितना सही है, ये मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार भी बहस योग्य है।

जस्टिस बेचू कुरियन ने आगे कहा कि पॉक्सो एक्ट काफी सोच समझकर बनाया गया था। यह बाल विवाह और बाल यौन शोषण के खिलाफ है। इस हिसाब से शादी होने के बाद भी किसी नाबालिग से शारीरिक संबंध बनाना कानूनी अपराध है।

IPC 375 का एक्सेप्शन कहता है कि अगर पति 15 साल से ज्यादा की पत्नी के साथ रिलेशन बनाता है तो इजाजत है, ये सभी धर्मों के लिए है।

ऐसे में एक्सपर्ट के जरिए जानते हैं कि क्या इस फैसले को हिंदू धर्म के पति से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए…

सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘रेप लॉज एंड डेथ पेनाल्टी’ किताब के लेखक विराग गुप्ता ने कहा कि व्यक्तिगत मामले में सुनाए गए हाईकोर्ट के इस फैसले को यूनिफॉर्म या सार्वजनिक फैसला मानना गलत है।

ऐसे फैसलों को दूसरे मामलों में नजीर के तौर पर पेश किया जा सकता है, लेकिन इसे किसी दूसरे धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

एडवोकेट के मुताबिक ऐसे मामलों में कई अदालतों के अलग-अलग फैसले से भ्रम और विवाद की स्थिति बन रही है। IPC कानून के तहत पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को रेप के दायरे से बाहर रखा गया है, ये हर धर्म के लोगों के लिए है।

इसका उद्देश्य था कि परिवारिक यानी सिविल मामलों को आपराधिक मामलों से अलग रखा जाए, लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में शादी की न्यूनतम उम्र के बारे में कानूनी स्थिति अलग-अलग है।

हिंदू, बौद्ध, सिख आदि धर्म में शादी की न्यूनतम उम्र को लेकर कानून निर्धारित है, लेकिन मुस्लिम धर्म में पर्सनल लॉ की वजह से शादी की उम्र निश्चित नहीं है। इसकी वजह से ही अनेक तरह के विवाद हो रहे हैं।

अब एक ग्राफिक के जरिए जान लीजिए देश में अलग-अलग धर्मों में शादी-ब्याह किन कानून के आधार पर हो रहा है…

‘विवाद की जड़ में 2 सवाल हैं और इसे हल करने का सिर्फ एक तरीका’

विराग गुप्ता कहते हैं कि पॉक्सो या दूसरे कानूनों के दायरे में न्यूनतम उम्र वाला मामला आएगा या नहीं, इसको लेकर भी अलग-अलग हाईकोर्ट के अलग-अलग फैसले हैं। ऐसे में इन सभी विवादों की जड़ में 2 सवाल हैं…

1. क्या 18 साल से कम उम्र की लड़की कानूनन शादी कर सकती है?

2. 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना अपराध है या नहीं?

इन सवालों और विवादों को हल करने का सिर्फ एक तरीका ये है कि सभी धर्मों के लिए एक समान कानून बनाई जानी चाहिए। सीनियर एडवोकेट ने कहा कि कॉमन सिविल कोड भले ही लागू नहीं हो, लेकिन सभी धर्मों की महिलाओं की शादी ब्याह के लिए निश्चित उम्र को लेकर एक समान कानून बनाने की जरूरत है।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की के निकाह को बताया था कानूनन सही
इससे पहले पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस जे. एस. बेदी ने जून महीने में सुनाए अपने एक फैसले में कहा था कि सर दिनशा फरदुनजी मुल्ला की किताब ‘प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मडन लॉ’ के अनुच्छेद 195 के मुताबिक 16 साल की लड़की और 21 साल के लड़के के बीच निकाह कानूनन सही है।

वहीं, इस फैसले को चुनौती देते हुए NCPCR ने कहा था- हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देकर बाल विवाह की अनुमति दी है। कोर्ट का यह फैसला एक तरह से बाल विवाह रोकने के लिए 2006 में बनाए गए कानून को तोड़ता है, जिसमें 18 साल से कम उम्र में लड़कियों की शादी बैन है।

सिर्फ एक नहीं 2 अहम कानून के खिलाफ है ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’
पंजाबा-हरियाणा हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में लड़कियों की शादी की उम्र 15 साल बताया गया है जो देश के 2 अहम कानून के खिलाफ है..

पहला: बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006: इसके मुताबिक 18 साल से कम उम्र में शादी कानूनी रूप से अपराध है। इतना ही नहीं जबरन इस तरह की शादी कराने वाले लोग भी अपराधी हैं। हालांकि, इस कानून में कोई ऐसा प्रोविजन नहीं है कि यह किसी दूसरे कानून को खत्म कर देगा। इसलिए पर्सनल लॉ के तहत 15 साल में मुस्लिम लड़कियों को शादी की इजाजत मिल जाती है।

दूसरा: पॉक्सो एक्ट 2012: इसके मुताबिक 18 साल से कम उम्र की लड़कियों को नाबालिग माना जाता है। नाबालिग लड़कियों से शादी करके शारीरिक संबंध बनाना कानूनन अपराध है। यही वजह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ इन दोनों कानून के खिलाफ है।

अब जानिए कब-कब कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े ऐसे मामले सामने आए हैं…

'18 से कम उम्र में लड़कियों की शादी गैरकानूनी तो नहीं लेकिन वॉइडेबल है'
एडवोकेट गुप्ता के मुताबिक बच्चों की शादी को रोकने के लिए 2006 में बना बाल विवाह निषेध अधिनियम है। इस कानून की धारा 2(A) के मुताबिक 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 से कम उम्र के लड़कों की शादी नहीं हो सकती। ऐसी शादी कानून की धारा 3 के तहत गैरकानूनी तो नहीं है, लेकिन वॉइडेबल है।

इसका मतलब ये हुआ कि माइनर में शादी होती है तो वयस्क होने पर कोर्ट में याचिका देकर नाबालिग लड़की शादी को रद्द या शून्य कराने की मांग कर सकती है।

विराग इस पूरे मर्ज की दवा यूनिफॉर्म सिविल कोड को अनेक चरणों में लागू करने को बता रहे हैं। संविधान के अनुसार सभी धर्मों की महिलाओं को शादी, तलाक और गुजारा भत्ता के बारे में समान अधिकार मिलने चाहिए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर दाखिल कई याचिकाओं के बाद 18 अक्टूबर 2022 को केंद्र सरकार ने एक हलफनामा दायर कर कहा है, 'यूनिफॉर्म सिविल कोड एक नीतिगत मामला है। इन मामलों में संसद फैसला करती है। ऐसे में कोर्ट सरकार को इस मामले में मसौदा तैयार करने का निर्देश नहीं दे सकता है।'

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