भास्कर एक्सप्लेनर:कंगना और नवनीत राणा पर देशद्रोह के जिस कानून में केस दर्ज हुआ, कई बड़े देशों ने उसे रद्दी की टोकरी में डाला

7 दिन पहलेलेखक: नीरज सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भारत में 152 पुराने देशद्रोह कानून पर रोक लगा दी है। देखा जाए तक इसे बनाने वाले ब्रिटेन ने भी 13 साल पहले इस कानून को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। वहीं न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, अमेरिका ने भी या तो इस कानून को रद्द कर दिया है या इसमें संशोधन किया है। देश के सिविल लिबर्टीज एक्टिविस्ट, ह्यूमन राइट लॉयर्स और जर्नलिस्ट लंबे समय से तर्क देते आ रहे हैं कि देशद्रोह कानून को अब खत्म कर देना चाहिए। देखा जाए तो स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गए कानून के जरिए सरकारें अब इसका इस्तेमाल असंतोष और आलोचना को शांत करने के लिए कर रही हैं। लॉ कमीशन भी अपने कंसल्टेंट पेपर में इस कानून पर सवाल उठा चुका है। अभिनेत्री कंगना रनोट और सांसद नवनीत राणा समेत कई प्रमुख हस्तियों के खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज हो चुका है।

ऐसे में आइए जानते हैं कि अब तक किन देशों में देशद्रोह कानून को खत्म किया जा चुका है? साथ ही लॉ कमीशन ने अपने कंसल्टेंट पेपर में इस पर क्या सवाल उठाए थे।

क्या है देशद्रोह कानून और कितनी सजा?

इंडियन पीनल कोड, यानी IPC के सेक्शन 124A में देशद्रोह की परिभाषा के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय चिन्हों या संविधान का अपमान या उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करता है या सरकार विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है तो उसके खिलाफ IPC सेक्शन 124A के तहत देशद्रोह का केस दर्ज हो सकता है।

इसके अलावा ऐसा कोई भाषण या अभिव्यक्ति जो देश में सरकार के खिलाफ घृणा, उत्तेजना या असंतोष भड़काने का प्रयास करता है, वह भी देशद्रोह में आता है। साथ ही अगर कोई व्यक्ति देश विरोधी संगठनों से जाने या अनजाने संबंध रखता है, उन्हें किसी भी तरह का सहयोग देता है, तो भी वह देशद्रोह के दायरे में आता है।

देशद्रोह मामले में दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को 3 साल की जेल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। देशद्रोह गैर जमानती अपराध की कैटेगरी में आता है।

152 साल पुराने कानून को लॉर्ड मैकॉले ने बनाया था

ब्रिटिश राज में 1837 में लॉर्ड टीबी मैकॉले की अध्यक्षता वाले पहले लॉ कमीशन ने इंडियन पैनल कोड यानी IPC तैयार किया था। 1870 में ब्रिटिश सरकार ने सेक्शन 124-A को IPC के छठे अध्याय में जोड़ा। 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में इसका इस्तेमाल ज्यादातर प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों और स्वतंत्रता सेनानियों के लेखन और भाषणों के खिलाफ हुआ।

1891 में देशद्रोह का पहला मामला दर्ज किया गया

पहला मामला 1891 में अखबार निकालने वाले संपादक जोगेन्द्र चंद्र बोस का सामने आता है। बाल गंगाधर तिलक से लेकर महात्मा गांधी तक पर इस सेक्शन के अंतर्गत ट्रायल चले। मैगजीन में छपे अपने तीन लेखों के मामले में ट्रायल झेल रहे महात्मा गांधी ने इस कानून को लेकर कहा था कि सेक्शन 124-A, जिसके तहत मुझ पर आरोप लगा है, IPC के राजनीतिक वर्गों के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए रचे गए कानूनों का राजकुमार है।

कौन से देश इस कानून को खत्म कर चुके हैं

ब्रिटेन : 13 साल पहले कानून को रद्द किया

जिस देश ने दुनिया को देशद्रोह कानून दिया, उसी ने 13 साल पहले, यानी 2009 में ही इस कानून को खत्म कर दिया। इस कानून को 12 जनवरी 2010 से ब्रिटेन में रद्द माना जाता है। हालांकि, अभी भी विदेशी नागरिकों पर देशद्रोह का मामला चलाया जा सकता है।

न्यूजीलैंड : 2007 में खत्म हुआ

न्यूजीलैंड में संसद ने देशद्रोह कानून को खत्म करने वाले संशोधन विधेयक को भारी बहुमत के साथ पारित किया था। 114 सासंद इस संशोधन विधेयक के पक्ष में थे, जबकि सिर्फ 7 विरोध में थे। यह संशोधन विधेयक 24 अक्टूबर 2007 को पारित हुआ और 1 जनवरी 2008 से लागू हुआ।

स्कॉटलैंड : 12 साल पहले खत्म हुआ कानून

स्कॉटलैंड ने देशद्रोह कानून को 2010 में एक विधेयक के जरिए इसे खत्म कर दिया था।

इंडोनेशिया : 2007 में खत्म किया

इंडोनेशिया ने 2007 में देशद्रोह को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

घाना : 21 साल पहले खत्म कर दिया था

घाना की संसद ने सर्वसम्मति से देशद्रोही कानूनों को खत्म कर दिया था।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने या तो देशद्रोह से संबंधित अपने कानूनों में विभिन्न प्रोविजंस को रद्द कर दिया है, या दुरुपयोग को रोकने के लिए इस कानून की लैंग्वेज में ही बदलाव कर दिया है।

ऑस्ट्रेलिया : 2010 में इसे बदल दिया गया

ऑस्ट्रेलिया में पहला व्यापक कानून जिसमें देशद्रोह का अपराध शामिल था, वह क्राइम एक्ट 1920 था। इसे दो बार 1984 और 1991 में रिवाइज किया गया। इसके बाद 2010 ऑस्ट्रेलियन लॉ रिफॉर्म कमीशन, यानी ALRC की सिफारिश पर नेशनल सिक्योरिटी अमेंडमेंट एक्ट 2010 में देशद्रोह शब्द को हिंसा के लिए उकसाने वाले अपराध में बदल दिया गया।

अमेरिका : डेड लॉ का रूप ले चुका है

इस बारे में बहुत सारी बहसें होने के बावजूद कि क्या देशद्रोह को समाप्त करना एक सही विकल्प होगा, अमेरिका में एक अपराध बना हुआ है। हालांकि, अमेरिका में इसे लगभग एक डेड लॉ के रूप में माना जाता है। अमेरिका में 1798 के देशद्रोह एक्ट के जरिए इसे एक दंडनीय अपराध माना गया। 1820 में इस एक्ट को खत्म कर दिया गया था। हालांकि, 1918 में अमेरिका ने फिर से देशद्रोह एक्ट को पारित किया, क्योंकि पहले वर्ल्ड वॉर में कांग्रेस अमेरिकी हितों की रक्षा करना चाहती थी।

इन देशों में अभी भी देशद्रोह का कानून मौजूद

अभी भारत के अलावा दुनिया के कई देशों में ये कानून लागू है। इन देशों में-ईरान, सऊदी अरब, मलेशिया जैसे कई देश शामिल हैं।

2018 में लॉ कमीशन ने अपने कंसल्टेंट पेपर में क्या कहा था?

भारतीय लॉ कमीशन ने 2018 में देशद्रोह के ऊपर एक परामर्श यानी कंसल्टेंट पेपर जारी किया था। देशद्रोह कानून के लिए क्या रास्ता अपनाना चाहिए- इस पर लॉ कमीशन ने कहा कि लोकतंत्र में एक ही गाने की बुक से गाना देशभक्ति का पैमाना नहीं है। साथ ही लोगों को अपने तरीके से अपने देश के प्रति अपना स्नेह दिखाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। ऐसा करने के लिए सरकार की नीति में खामियों की ओर इशारा करते हुए कोई रचनात्मक आलोचना या बहस की जा सकती है।

लॉ कमीशन ने कहा कि इस तरह के विचारों में प्रयुक्त अभिव्यक्ति कुछ के लिए कठोर और अप्रिय हो सकती है, लेकिन ऐसी बातों को देशद्रोह नहीं कहा जा सकता है। लॉ कमीशन ने यह भी कहा कि सेक्शन 124ए केवल उन मामलों में लागू किया जाना चाहिए जहां किसी भी कार्य के पीछे की मंशा सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने, या हिंसा और अवैध साधनों से सरकार को उखाड़ फेंकने की है।

कंसल्टेंट पेपर में लॉ कमीशन ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के हर गैर-जिम्मेदाराना प्रयोग को देशद्रोह नहीं कहा जा सकता है। साथ ही यह भी कहा कि तत्कालीन सरकार की नीतियों से मेल न खाने वाले विचार व्यक्त करने के लिए किसी व्यक्ति पर राजद्रोह की धारा के तहत आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए।

लॉ कमीशन ने कहा था कि ब्रिटेन ने 10 साल पहले देशद्रोह कानूनों को समाप्त कर दिया था और ऐसा करते वक्त कहा था कि वो देश ऐसे कठोर कानूनों का उपयोग करने का उदाहरण नहीं बनना चाहता। कंसल्टेंट पेपर में पूछा गया कि उस सेक्शन 124ए को बनाए रखना कितना उचित है जिसे अंग्रेजों ने भारतीयों पर अत्याचार करने के लिए एक उपकरण के रूप में यूज किया था।

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