नूपुर को फटकारने वाले जज पहले भी सुर्खियों में रहे:आरक्षण को तरक्की में रोड़ा कहा तो 58 सांसद ले आए थे महाभियोग

2 महीने पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय

'नूपुर शर्मा ने बिना परिणाम सोचे ही अनर्गल और गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया।'

'देश में जो भी हो रहा है, उसके लिए ये महिला अकेले ही जिम्मेदार है।'

'उन्हें टीवी पर आना चाहिए और देश से माफी मांगनी चाहिए'

'...उन्होंने बहुत देर से माफी मांगी...और उन्होंने माफी भी अगर भावनाएं आहत हुई हैं कहकर सशर्त मांगी थी।'

ये सख्त कमेंट सुप्रीम कोर्ट ने 1 जुलाई को नूपुर शर्मा पर किए। नूपुर अपने ऊपर देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज सभी FIR को दिल्ली ट्रांसफर करने की अपील के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं, लेकिन उन्हें जजों के गुस्से का सामना करना पड़ा। ये जज हैं- जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला।

चलिए इस एक्सप्लेनर में आगे बढ़ने से पहले एक पोल में हिस्सा लेते हैं:

भास्कर एक्सप्लेनर में आज हम इन दोनों जजों के चर्चित मामलों की कहानी पेश कर रहे हैं…

अब जानते हैं कि नूपुर शर्मा मामले की सुनवाई में शामिल रहे जज जस्टिस जमशेद बुरजोर यानी जेबी पारदीवाला कौन हैं...

जस्टिस पारदीवाला से जुड़े चर्चित केस और सख्त टिप्पणियां…

केस-1ः रिजर्वेशन पर टिप्पणी से घिरे, महाभियोग तक लाया गया

दिसंबर 2015 में गुजरात हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस जेबी पारदीवाला ने आरक्षण सिस्टम पर कमेंट्स किए थे, जिस पर देशभर में बवाल मच गया था। उन्होंने ये टिप्पणी पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के खिलाफ लगे राजद्रोह के मामले को खारिज किए जाने की अपील की सुनवाई के दौरान की थी।

जस्टिस पारदीवाला ने कहा था, 'अगर कोई मुझसे देश को बर्बाद करने वाली या उसे सही दिशा में तरक्की करने से रोकने वाली दो चीजों का नाम पूछे तो मैं कहूंगा- आरक्षण और भ्रष्टाचार।'

उन्होंने कहा था, 'देश की आजादी के 65 साल बाद किसी नागरिक का आरक्षण मांगना बहुत ही शर्मनाक है। जब हमारा संविधान बनाया गया था, तो माना गया था कि आरक्षण 10 साल के लिए रहेगा, लेकिन दुर्भाग्य से ये देश की आजादी के 65 सालों बाद भी जारी है।'

पारदीवाला के इस कमेंट पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए थे। इस टिप्पणी से नाराज 58 राज्यसभा सांसद जस्टिस पारदीवाला के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने के लिए प्रस्ताव लाए थे। महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने के बाद जस्टिस पारदीवाला ने अपने जजमेंट से आरक्षण को लेकर किए गए कमेंट्स को ये कहते हुए हटा दिया था कि ये ‘प्रासंगिक और जरूरी’ नहीं हैं।

केस-2ः कोविड मैनेजमेंट को लेकर गुजरात सरकार पर भड़के थे

मई 2020 में गुजरात सरकार के कोविड से निपटने के मामले में दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करने वाली दो जजों की बेंच में शामिल रहे जस्टिस पारदीवाला ने बेहद तल्ख कमेंट किए थे।

उन्होंने अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल की तुलना 'कालकोठरी' से की थी। उन्होंने कोविड मैनेजमेंट के मामले में गुजरात सरकार के सब कुछ ठीक है, वाले नैरेटिव को नहीं माना था और उसे क्लीन चिट देने से इनकार कर दिया था।

उस समय जस्टिस पारदीवाला ने गुजरात में प्रवासी मजदूरों के पलायन और अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल में हो रही मौतों से जुड़ी कई मीडिया रिपोर्ट्स के बाद खुद संज्ञान लिया था। कुछ दिनों बाद ही जस्टिस पारदीवाला को उस बेंच से अचानक हटा दिया गया था।

जस्टिस सूर्यकांत से जुड़े चर्चित केस और सख्त टिप्पणियां…

केस-1: CBI और IB को कहा- आप जजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं

अगस्त 2021 में जजों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए चीफ जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस सूर्यकांत की एक बेंच ने एक मामले की सुनवाई करते हुए सुरक्षा एजेंसियों को आड़े हाथों लिया था।

बेंच ने कहा था, 'IB, CBI और पुलिस न्यायपालिका की बिल्कुल भी मदद नहीं कर रही हैं। ये एक बहुत गंभीर मुद्दा है।'

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा था, 'ऐसे क्रिमिनल केस जिनमें गैंगस्टर्स और हाई प्रोफाइल लोग जुड़े हों, उनमें जब आरोपी को कोर्ट से उसके मन-मुताबिक आदेश नहीं मिलता है, तो वे न्यायपालिका को नुकसान पहुंचाने लगते हैं।'

'राज्यों में कुछ जगहों पर ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को धमकाया जा रहा है, न केवल फिजिकली बल्कि मेंटली भी, उन्हें वॉट्सऐप, फेसबुक और यूट्यूब के जरिए धमकी भरे मैसेज भेजे जाते हैं। एक या दो जगहों पर कोर्ट ने CBI जांच का आदेश दिया, लेकिन CBI ने आदेश के एक साल बाद भी कुछ नहीं किया है।'

केस-2ः PM मोदी की सुरक्षा चूक मामले में केंद्र पर भड़के थे

इस साल की शुरुआत में पंजाब की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में हुई चूक के मामले की सुनवाई करने वाली तीन जजों की बेंच में जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल थे। इस बेंच के दो अन्य जज CJI एनवी रमना और हिमा कोहली थीं।

मामले की सुनवाई करते हुए तीन जजों की बेंच ने केंद्र के पंजाब के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को कारण बताओ नोटिस जारी करने पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि ऐसा लगता है कि केंद्र ने पहले ही सारा अनुमान लगा लिया है, तो उसने कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप के लिए क्यों कहा?

जस्टिस सूर्यकांत ने सॉलिसिटर जनरल से कहा था, 'आपका कारण बताओ नोटिस पूरी तरह से विरोधाभासी है। क्या कोई उल्लंघन हुआ, इसकी जांच के लिए आप एक समिति का गठन करना चाहते हैं और फिर आप राज्य के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को दोषी मानते हैं। उन्हें किसने दोषी ठहराया?'

सुप्रीम कोर्ट की इसी बेंच ने इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी गठित करने का आदेश दिया था।

केस-3: ‘लाइसेंसी बंदूकें हर्ष फायरिंग के लिए नहीं हैं’

अपने एक फैसले में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि लाइसेंसी बंदूकों का इस्तेमाल जश्न मनाने के लिए फायरिंग में नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा था, 'आत्मरक्षा या फसलों और मवेशियों की सुरक्षा के लिए मिली लाइसेंसी बंदूक को जश्न के आयोजनों में नहीं चलाया जा सकता है। ऐसा करना खतरनाक और जानलेवा भी साबित हो सकता है।'

इसके अलावा जस्टिस सूर्यकांत आर्टिकल-370, CAA और पेगासस समेत कई अहम केसेज की सुनवाई में भी शामिल रहे हैं।

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