बूथ से मुर्गे को लेकर भागा गिद्ध तो हारा कैंडिडेट:137 साल पहले भारत में चुनाव चिन्ह की शुरुआत; 5 बार शिवसेना का बदला सिंबल

4 महीने पहलेलेखक: अनुराग आनंद

साल 1985 की बात है। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हो रहा था। बाल ठाकरे की पार्टी शिवसेना के पास कोई निश्चित चुनाव चिन्ह नहीं था। ऐसे में पार्टी के कैंडिडेट को ‘मशाल’ चुनाव चिन्ह मिला। अब 37 साल बाद एक बार फिर से बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे की पार्टी को ‘मशाल’ चुनाव चिन्ह मिला है। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह या पार्टी सिंबल की जरूरत क्यों पड़ती है?

इस सवाल के जवाब को जानने से पहले चुनाव चिन्ह की शुरुआत और भारत में पार्टी सिंबल बांटने की प्रोसेस को जानेंगे। साथ ही इससे जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से भी।

233 साल पहले राजनीतिक दल को मिला था पहला चुनाव चिन्ह
ब्रिटेनिका के मुताबिक करीब 2,722 साल पहले ग्रीस के शहर स्पार्टा में पहली बार चुनाव हुआ था। हालांकि, इस वक्त आज की तरह संगठित राजनीतिक दलों की मौजूदगी नहीं थी। 1789 में अमेरिका में ‘अलेक्जेंडर हैमिल्टन’ के नेतृत्व में पहली संगठित राजनीतिक पार्टी बनी, जिसका नाम ‘फेडरलिस्ट पार्टी’ था। इस पार्टी का निशान एक वृत्ताकार छल्ले यानी साइकिल की रिंग के जैसा था। इस छल्ले का रंग काला था। यहीं से दुनियाभर के संगठित दलों के बीच चुनाव चिन्ह या पार्टी सिंबल की प्रक्रिया शुरू हुई।

ग्राफिक्स में अमेरिका के 2 सबसे पुराने दलों के शुरुआती चुनाव चिन्ह देख सकते हैं..

भारत में 137 साल पहले कांग्रेस बनने के बाद हुई पार्टी सिंबल की शुरुआत
1947 से पहले देश में दो प्रमुख राजनीतिक दल थे। एक कांग्रेस और दूसरा मुस्लिम लीग। 28 दिसंबर 1885 को स्थापना के बाद 'दो बैलों का जोड़ा' कांग्रेस पार्टी का सिंबल था। वहीं, 1906 में बनने वाली ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का अर्ध चंद्रमा और तारा पार्टी सिंबल था। लेकिन, भारत में पार्टी सिंबल या चुनाव चिन्ह के सफर की असली कहानी 1951 के बाद शुरू हुई।

देश की आजादी के 3 साल बाद 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच देश में पहला आम चुनाव हुआ। इस समय सबसे बड़ी चुनौती देश के करोड़ों अशिक्षित लोगों की इलेक्शन में भागीदारी बढ़ाने की थी। सभी दलों के चुनाव चिन्ह की तस्वीर को अलग-अलग बॉक्स पर लगाया गया था। इस वजह से पहले आम चुनाव में 20 लाख से ज्यादा बक्सों का इस्तेमाल हुआ था।

इस चुनाव में 14 राष्ट्रीय राजनीतिक दल मैदान में थे। तब हाथ यानी पंजा ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (रुइकर ग्रुप) का सिंबल था।

देखिए पहले आम चुनाव में हिस्सा लेने वाले 14 राष्ट्रीय दलों के चुनाव चिन्ह...

इस वक्त भी चुनाव आयोग ने किसी पार्टी को धर्म और जाति से जुड़े सिंबल देने से मना कर दिया था। ज्यादातर दलों को ऐसा चुनाव चिन्ह मिला, जिसके बारे में आम लोगों को जानकारी थी। एमएस सेठी ने सभी दलों के चुनाव चिन्ह को स्कैच किया था।

मुर्गे को लेकर इलेक्शन बूथ से भागा गिद्ध तो कैंडिडेट की हुई हार
चुनाव चिन्ह और उम्मीदवारों से जुड़े कई दिलचस्प किस्से हैं। 1957 के आम चुनाव में एक उम्मीदवार को मुर्गा छाप चुनाव चिन्ह मिला। इसके बाद वह उम्मीदवार जिंदा मुर्गे के साथ इलेक्शन बूथ पर पहुंचा, जहां से गिद्ध मुर्गे को लेकर फरार हो गया।

इसके बाद जनता के बीच चर्चा होने लगी कि जो एक छोटे से पक्षी की देखभाल नहीं कर सका, वह अपने क्षेत्र के हजारों मतदाताओं की रक्षा कैसे कर सकता है। परिणाम ये हुआ कि नेताजी चुनाव हार गए।

इसी तरह मुंबई में एक प्रत्याशी को हाथी चुनाव चिन्ह मिला तो वह अपने साथ हाथी लेकर ही लोगों के बीच प्रचार करने लगा। जबकि एक अन्य उम्मीदवार को बाघ चुनाव चिन्ह मिला तो वह पिंजरे में बंद बाघ के साथ प्रचार करने लगा।

इन दोनों उम्मीदवारों की चुनाव में जीत हुई या हार ये जानकारी भले ही हम नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन, ये जरूर था कि दोनों उम्मीदवार इन जानवरों के जरिए भीड़ जुटाने में कामयाब रहे।

राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह देने के लिए चुनाव आयोग को एक नियम की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद 1968 में बना कानून….

  • इलेक्शन सिंबल (रिजर्वेशन और अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 के तहत चुनाव आयोग को दलों के चुनाव चिन्ह तय करने का अधिकार मिल गया।
  • इस कानून के पैराग्राफ 15 के तहत विवाद की स्थिति में चिन्ह तय करने का सुप्रीम अधिकार चुनाव आयोग के पास होता है।
  • इस कानून के तहत चुनाव आयोग 2 तरह के सिंबल दे सकता है-

पहला: आरक्षित चुनाव चिन्ह जो सिर्फ एक दल का होता है। जैसे- कांग्रेस का हाथ, BJP का कमल फूल

दूसरा: मुक्त चुनाव चिन्ह जो किसी दल का नहीं होता। ये किसी नई पार्टी या उम्मीदवार को किसी चुनाव में दिया जाता है।

  • निर्वाचन आयोग की फ्री सिंबल वाली लिस्ट में सितंबर, 2021 तक 197 मुक्त (फ्री) चुनाव चिह्न थे।
  • पशु-पक्षी, धर्म और जाति से जुड़े चुनाव चिन्ह किसी भी उम्मीदवार या पार्टी को दिए जाने पर रोक है।
  • राजनीतिक दल चाहे तो 3 सिंबल चुनाव आयोग को भेज सकता है, जिनमें से किसी एक पर आयोग की मुहर लगती है। ग्राफिक्स में देखिए देश की 2 बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों की कितने बार चुनाव चिन्ह बदली हैं…

शिवसेना का 56 साल में बदला 5 से ज्यादा ‘पार्टी सिंबल’
19 जून 1966 को कार्टूनिस्ट और पत्रकार बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र में एक राजनीतिक पार्टी की नींव रखी। इस पार्टी का नाम ‘शिवसेना’ रखा गया। 2 साल बाद ही शिवसेना ने बृहन्मुंबई नगर निगम यानी BMC चुनाव में उतरने का फैसला किया। इस चुनाव में शिवसेना कैंडिडेट का सिंबल तलवार और ढाल था।

फिर 1970 में पहली बार वामनराव महादिक शिवसेना पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने। इस वक्त उगता हुआ सूरज इनका चुनाव चिन्ह था। 15 साल बाद 1985 तक शिवसेना को स्थायी चुनाव चिन्ह नहीं मिला था। ऐसे में इस साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के छगन भुजबल मशाल निशान पर चुनाव जीते थे।

ये तस्वीर 1985 की है। इसमें बाल ठाकरे की पार्टी से मशाल निशान पर चुनाव लड़ने वाले छगन भुजबल नजर आ रहे हैं। Source: Indian Express
ये तस्वीर 1985 की है। इसमें बाल ठाकरे की पार्टी से मशाल निशान पर चुनाव लड़ने वाले छगन भुजबल नजर आ रहे हैं। Source: Indian Express

आखिरकार 1989 में शिवसेना को चुनाव आयोग की तरफ से स्थायी चुनाव चिन्ह तीर-धनुष मिल गया। साथ ही बाल ठाकरे की पार्टी को राज्य पार्टी के रूप में मान्यता भी मिल गई। 1966 से 1989 तक शिवसेना ने कई अलग-अलग सिंबल पर चुनाव लड़े। जिनमें प्रमुख- मशाल, ढाल और तलवार, उगते सूरज, रेलवे इंजन, ताड़ के पेड़ आदि थे।

अब जानते हैं कि दलों को आखिर चुनाव चिन्ह की जरूरत क्यों पड़ी….

लंदन की ब्रांडिंग एजेंसी फैब्रिक के मुताबिक इस बात की 3 बड़ी और प्रैक्टिकल वजह हैं…

पहली वजह: भारत जैसा देश जहां अनपढ़ लोगों की संख्या काफी ज्यादा थी। ऐसे में कैंडिडेट के नाम को पढ़ने के बजाय उनके चुनाव चिन्ह को आसानी से पहचान सकते थे।

दूसरी वजह: इंसानी दिमाग 90% जानकारी विजुअल माध्यमों से प्राप्त करता है। यही नहीं लोग ऑडियो या लिखित जानकारी की तुलना में 40% ज्यादा विजुअल डेटा याद रख सकते हैं। इसलिए दलों के वादों, नाम या काम को याद रखने की बजाय पार्टी के एक सिंबल या चिन्ह को याद रखना ज्यादा आसान है।

तीसरी वजह: 17वीं और 18वीं सदी के बीच कई आंदोलन, विद्रोह और विरोध हुए, जिसका एक प्रतीक होता था। इनसे निकलने वाली पार्टी या नेताओं ने इन प्रतीकों को अपना चुनाव चिन्ह या सिंबल बना लिया था।

अंत में पढ़िए दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका की पार्टियों के चुनाव चिन्ह की कहानी…

1828 की बात है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहे थे। डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से इस वक्त ऐन्ड्रयू जैक्सन मैदान में थे। उन्होंने लोगों से खूब सारे लोक-लुभावने वादे किए थे।

ऐन्ड्रयू जैक्सन के किए गए वादों की वजह से लोग उनके लिए गधे जैसे विशेषण का इस्तेमाल करते थे। इसकी जानकारी जैसे ही ऐन्ड्रयू जैक्सन को हुई उन्होंने गधे को अपने चुनावी पोस्टर में शामिल कर लिया। इस चुनाव में उन्हें जीत मिली और ऐन्ड्रयू अमेरिका के 7वें राष्ट्रपति बने। यहां भी सिंबल की भूमिका अहम रही।

फिर दुनियाभर में मशहूर हुई ‘हाथी’ Vs ‘गधे’ निशान के बीच की लड़ाई
करीब 33 साल बाद 1861 में अमेरिका में सिविल वॉर यानी गृह युद्ध की शुरुआत हुई। इस वक्त हार्पर्स विकली मैग्जीन में काम करने वाले कार्टूनिस्ट थॉमस नैस्ट ने एक कार्टून बनाया था।

इस कार्टून में सिविल वॉर के विरोध कर रहे लोगों को गधा की तरह दिखाया गया था। इसके बाद ही अमेरिका में गधा डेमोक्रेटिक पार्टी का लोकप्रिय चुनाव चिन्ह बन गया।

1879 में हार्पर वीकली मैग्जीन में थॉमस नैस्ट का यह कार्टून छपा था, जिसके जरिए रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी पर व्यंगात्मक हमला किया गया था। Source: Kean Collection/Archive Photos
1879 में हार्पर वीकली मैग्जीन में थॉमस नैस्ट का यह कार्टून छपा था, जिसके जरिए रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी पर व्यंगात्मक हमला किया गया था। Source: Kean Collection/Archive Photos

1874 में एक बार फिर थॉमस नैस्ट के एक कार्टून पर बवाल मचा। इस बार उन्होंने हाथी को रिपब्लिकन पार्टी के प्रतीक के तौर पर दिखाया था। यहीं से अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में हाथी और गधे के बीच लड़ाई की शुरुआत हुई।

आपने पूरी खबर पढ़ ली है तो आइए अब इस पोल में हिस्सा लेते हैं....

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