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भास्कर एक्सप्लेनर:फ्रेंच वेबसाइट की रिपोर्ट के बाद फिर विवादों में राफेल, जानिए क्या है नया विवाद और क्या होगा इसका भारत की राजनीति पर असर

15 दिन पहलेलेखक: आबिद खान
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फ्रांस के एक खबरिया पोर्टल मीडिया पार्ट ने दावा किया है कि लड़ाकू विमान राफेल बनाने वाली कंपनी दैसो एविएशन ने भारत में एक बिचौलिया कंपनी Defsys Solutions को 5 लाख 8 हजार 925 यूरो (4.39 करोड़ रुपए) का भुगतान किया। यह खुलासा दैसो एविएशन की 2017 की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। फ्रांस की एंटी करेप्शन एजेंसी AFA ने दैसो एविएशन के खातों के ऑडिट अकाउंट्स की जांच की तो पता चला कि यह राशि कंपनी ने गिफ्ट के तौर पर दिखाई थी।

फ्रेंच वेबसाइट की इस रिपोर्ट के बाद मोदी सरकार कठघरे में है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला का आरोप है कि आखिरकार राफेल डील की सच्चाई सामने आ ही गई। राफेल तब से सुर्खियों में बना हुआ है, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA-2 सरकार ने इसके लिए डील की थी। नरेंद्र मोदी सरकार ने इस डील को रद्द कर गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट डील की, पर इस दौरान कथित तौर पर इसकी कीमत कई गुना बढ़ा दी गई।

जानिए क्या है राफेल को लेकर विवाद और नए खुलासे से इस मामले पर क्या असर पड़ेगा-

राफेल डील को लेकर हुए नए खुलासे में क्या कहा गया है?

  • फ्रेंच वेबसाइट मीडिया पार्ट ने AFA के हवाले से दावा किया कि दैसो एविएशन ने 2017 में 5 लाख 8 हजार 925 यूरो (4.39 करोड़ रुपए) खर्च किए। जब AFA ने इस खर्च को लेकर दैसो एविएशन से स्पष्टीकरण मांगा तो उसने बताया कि विमान के छोटे कार बराबर 50 मॉडल भारतीय कंपनी से बनवाए है। एक मॉडल के लिए 20 हजार यूरो (17 लाख रुपए) का भुगतान किया गया है।
  • रिपोर्ट कहती है कि इन 50 मॉडल को बनाने का काम भारतीय कंपनी Defsys Solutions को दिया था। ये कंपनी दैसो की भारत में सब-कॉन्ट्रैक्टर है। इस कंपनी का कर्ता-धर्ता सुषेण मोहन गुप्ता दैसो का एजेंट है और रक्षा सौदों में बिचौलिया भी रहा है। सुषेण को 2019 में अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद घोटाले के सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था।

नए विवाद का भारत में क्या असर पड़ सकता है?

  • कोई नहीं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले में मोदी सरकार को क्लीन चिट दे चुका है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मोदी सरकार की फैसले लेने की प्रक्रिया पर शक करने का कोई आधार नहीं है। इस मामले की सीबीआई जांच की मांग को भी खारिज कर दिया था। इसके एक साल बाद समीक्षा याचिका भी खारिज हो चुकी है। ऐसे में कांग्रेस भले ही इस मामले में बयानबाजी कर लें, कानूनी तौर पर मोदी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।

वायुसेना के लिए राफेल क्यों जरूरी है?

  • एक अनुमान के मुताबिक 2027 तक भारत को कम से कम 42 स्क्वाड्रन की जरूरत होगी। फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास केवल 33 स्क्वाड्रन ही है। एक स्क्वाड्रन में 16 लड़ाकू विमान होते हैं ।
  • वायुसेना ने आखिरी बार 1997-98 में रुस से सुखोई विमान खरीदे थे। अब टेक्नोलॉजी बदल गई है और वायुसेना को आधुनिक विमानों की जरूरत है। पाकिस्तान के पास चीनी जे-17 और अमेरिकी एफ-16 विमान है। ऐसे में पड़ोसी मुल्क से खतरे को देखते हुए भी वायुसेना के लिए नए लड़ाकू विमान खरीदना जरूरी था।

राफेल विमान की खासियत क्या है?

  • 2 इंजन वाला ये विमान हवा से जमीन पर निशाना साधने के साथ-साथ हवा से हवा में भी सटीक निशाना लगा सकता है। इस विमान से परमाणु हमले और लेजर गाइडेड मिसाइल भी दागी जा सकती है। विमान में ऑक्सीजन जनरेशन सिस्टम लगा है यानी इसमें ईंधन के तौर पर लिक्विड ऑक्सीजन भरने की जरूरत नहीं होती। कंपनी का दावा है कि उड़ान भरने के 1 मिनट के भीतर राफेल 50 हजार फीट की ऊंचाई को छू सकता है।

रक्षा मंत्रालय ने राफेल को ही क्यों चुना?

  • रक्षा मंत्रालय ने जब लड़ाकू विमानों के लिए टेंडर जारी किए थे तो अमेरिका के बोइंग और मार्टिन एफ-16 फाल्कन, फ्रांस के राफेल, रुस के मिखोयान मिग-25, ब्रिटेन के यूरोफायटर ने भी हिस्सा लिया था। राफेल की कीमत सबसे कम थी। रखरखाव भी सस्ता था, जो इसे चुनने का आधार बना।
  • अगस्त 2007 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने 126 एयरक्राफ्ट की खरीदी को मंजूरी दी। इसके लिए टेंडर जारी किए गए। रक्षा मंत्रालय ने राफेल को वायुसेना के लिए अनुकूल मानते हुए 31 जनवरी 2012 को ये टेंडर दैसो एविएशन को दे दिया।
  • यूपीए-2 सरकार ने दैसो एविएशन के साथ जो डील की थी, उसमें 108 विमानों का उत्पादन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को करना था। बाकी 18 विमान फ्रांस से मिलने थे। उस वक्त राफेल विमानों की कीमत 54000 करोड़ रुपए तय हुई थी यानी एक विमान की कीमत 428 करोड़ रुपए।

मोदी सरकार के समय क्या डील हुई?

  • पू्र्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के कार्यकाल में 23 सितंबर 2016 को राफेल की खरीद के लिए फ्रांस के साथ इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (IGA) हुआ। डील में फैसला हुआ कि भारत फ्रांसीसी विमान निर्माता कंपनी से 36 राफेल लड़ाकू विमान 58,000 करोड़ रुपए में खरीदेगा। एक विमान की कीमत होगी 1,611 करोड़ रुपए। ये भी तय हुआ कि मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के उद्देश्य से फ्रांस की कंपनी किसी भारतीय कंपनी को पार्टनर बनाएगी।

राफेल विवाद में रिलायंस का नाम कैसे आया?

  • राफेल के पुर्जों की असेम्बलिंग और मेंटेनेंस के लिए दैसो एविएशन ने भारतीय कंपनी रिलायंस को चुना। आरोप है कि रिलायंस ने पहले कभी इस तरह को कोई काम नहीं किया है और सरकार ने अंबानी परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए रिलायंस का नाम आगे बढ़ाया। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को नजरअंदाज किया।
  • सरकार का कहना है कि हर विमान यूपीए-2 की डील के मुकाबले 59 करोड़ रुपये सस्ता पड़ा है। पहली डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात नहीं थी। सरकार ने यह आरोप भी खारिज किया कि HAL की जगह रिलायंस को तरजीह दी गई है। मोदी सरकार का कहना है कि दैसो एविएशन ने खुद ही रिलायंस को अपना पार्टनर चुना और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।
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