पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

भास्कर एक्सप्लेनर:कर्नाटक के दत्तात्रेय होसबाले बने RSS में नंबर दो; दक्षिण भारत में विस्तार पर रहेगा फोकस

3 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी
  • कॉपी लिंक

दत्तात्रेय होसबाले को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सर्वोच्च इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की दो दिवसीय बैठक के दौरान सर्वसम्मति से सरकार्यवाह (महासचिव) चुना गया है। वे संघ प्रमुख मोहन भागवत के बाद संगठन में नंबर दो की भूमिका में होंगे। होसबाले सुरेश भैयाजी जोशी की जगह लेंगे, जो 2009 से सरकार्यवाह की भूमिका निभा रहे थे। होसबाले इस समय सह-सरकार्यवाह (संयुक्त महासचिव) की भूमिका निभा रहे थे।

इससे पहले 2018 में भी होसबाले के प्रमोशन की बात चली थी, पर 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर उसे टाल दिया गया था। RSS ने खुद अपने ट्विटर अकाउंट से इस नियुक्ति की घोषणा की। दरअसल, शुक्रवार को बेंगलुरू में शुरू हुई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में यह फैसला लिया गया। होसबाले का कार्यकाल तीन साल का होगा। 65 वर्षीय होसबाले को दो कार्यकाल दिए जा सकते हैं। इससे वे 2024 के लोकसभा चुनावों और 2025 में संघ के स्थापना के शताब्दी वर्ष के दौरान भी RSS के संगठनात्मक ढांचे को कंट्रोल करते दिखेंगे।

कई भाषा के जानकार हैं होसबाले, 13 साल की उम्र में बन गए थे स्वयंसेवक

कर्नाटक के शिवमोगा जिले में सोरबा तालुका के होसबाले गांव के रहने वाले दत्तात्रेय की मातृभाषा कन्नड़ है, लेकिन वे हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, तमिल और मराठी के अलावा कई विदेशी भाषाएं भी जानते हैं। वे कन्नड़ भाषा की मासिक पत्रिका असीमा के संस्थापक और संपादक भी हैं। 1968 में 13 साल की उम्र में ही स्वयंसेवक बन गए थे। 1972 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े और 15 साल तक संगठन महामंत्री रहे।

होसबाले 1975-77 तक चले जेपी आंदोलन में भी शामिल रहे और मीसा कानून के तहत 21 महीने के लिए जेल भी गए। जेल में उन्होंने हाथ से लिखित दो पत्रिकाओं का संपादन किया। 1978 में वे विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक कार्यकर्ता हो गए। अंडमान निकोबार द्वीप समूह और पूर्वोत्तर भारत में ABVP को आगे बढ़ाने का पूरा श्रेय इन्हीं को जाता है। दत्तात्रेय होसबाले अमेरिका, रूस, फ्रांस, इंग्लैंड और नेपाल की यात्राएं भी कर चुके हैं। 2004 में उन्हें RSS का अखिल भारतीय सह-बौद्धिक प्रमुख बनाया गया था।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भारतमाता का पूजन कर बैठक की शुरुआत की।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भारतमाता का पूजन कर बैठक की शुरुआत की।

क्यों खास है होसबाले का सरकार्यवाह चुना जाना?

बताया जा रहा है कि होसबाले कम से कम दो कार्यकाल पूरा करेंगे। यानी छह साल तक। भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर हिस्सों में पैठ बनाने के बाद RSS का फोकस पूरी तरह से दक्षिण पर है। ऐसे में कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले होसबाले इस लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। आने वाले समय में दक्षिण भारत के कई राज्यों में चुनाव हैं। कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले होसबाले इसमें मददगार हो सकते हैं। ABVP में लंबे समय तक रहने के दौरान दत्तात्रेय के पास संगठन चलाने का अनुभव भी है।

प्रतिनिधि सभा की इस बैठक में मंच पर सिर्फ भागवत और जोशी ही बैठे। साफ है कि सरकार्यवाह का पद कितना महत्वपूर्ण होता है।
प्रतिनिधि सभा की इस बैठक में मंच पर सिर्फ भागवत और जोशी ही बैठे। साफ है कि सरकार्यवाह का पद कितना महत्वपूर्ण होता है।

क्यों खास है अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक?

RSS की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक आम तौर पर हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में होती है। इसमें साल भर की गतिविधियों पर चर्चा होती है। पर हर तीन साल में सरकार्यवाह का चुनाव होता है और यह फैसला सिर्फ नागपुर में ही होता रहा है। पहली बार है जब यह बैठक महाराष्ट्र से बाहर बेंगलुरु में हो रही है। आम तौर पर इस सभा में 1,500 प्रतिनिधि भाग लेते हैं, लेकिन इस बार कोरोनावायरस संक्रमण को देखते हुए सिर्फ 450 प्रतिनिधि ही बेंगलुरु में हैं। करीब 1,000 प्रतिनिधि 44 स्थानों से वर्चुअल तौर पर बैठक से जुड़े थे।

कितना महत्वपूर्ण है सरकार्यवाह का पद?

यह समझने के लिए RSS की व्यवस्था को समझना होगा। संघ प्रमुख या सरसंघचालक के लिए चुनाव नहीं होते। संघ प्रमुख अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति करते हैं। केएस सुदर्शन ने ही मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत की नियुक्ति की थी। पर संघ प्रमुख की भूमिका मुख्य तौर पर मार्गदर्शन की होती है। संगठन का सारा कामकाज सरकार्यवाह ही देखते हैं।

सरकार्यवाह का कार्यकाल तीन साल का ही होता है। आमतौर पर सभा की बैठक मार्च के दूसरे या तीसरे हफ्ते में 3 दिन के लिए होती है। शुक्रवार को शुरू होकर रविवार को खत्म होती है। इस बार यह बैठक दो दिन के लिए है और शनिवार को ही नए सरकार्यवाह की घोषणा हो गई।

बेंगलुरु में आयोजित बैठक में 450 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। करीब 1,000 अन्य प्रतिनिधि वर्चुअल तौर पर इस बैठक से जुड़े।
बेंगलुरु में आयोजित बैठक में 450 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। करीब 1,000 अन्य प्रतिनिधि वर्चुअल तौर पर इस बैठक से जुड़े।

सरकार्यवाह की चुनाव प्रक्रिया में होता क्या है?

सरकार्यवाह का चुनाव आम तौर पर तीन दिन की बैठक में दूसरे दिन होता है। इस साल यह दो दिन की मीटिंग में दूसरे दिन ही हुआ। आम तौर पर सरकार्यवाह अपने कार्यकाल में किए गए कामों की जानकारी देता है। साथ ही सूचना देता है कि उसका कार्यकाल खत्म हो गया है, इस वजह से नया सरकार्यवाह चुना जाना चाहिए।

तब वरिष्ठ स्वयंसेवकों में से किसी को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया जाता है। कोई वरिष्ठ नेता नए सरकार्यवाह के नाम का प्रस्ताव रखता है। यह नाम आमतौर पर स्वीकार कर लिया जाता है और सरकार्यवाह को निर्वाचित घोषित किया जाता है। शनिवार को इसी तर्ज पर दत्तात्रेय होसबाले का नाम सामने रखा गया, जिस पर सभी ने सहमति दी। अब होसबाले अपनी टीम चुनेंगे और आने वाले दिनों में उसकी घोषणा होगी।

सरकार्यवाह को चुने जाने की मौजूदा प्रक्रिया 1950 के दशक में अपनाई गई थी। आपातकाल (1975-77) के दौरान और 1993 में चुनाव नहीं हुए थे। बाबरी मस्जिद ढांचे के ढहने के बाद संघ को प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया था। इस वजह से 1993 में चुनाव नहीं हुए थे।

भैयाजी जोशी को क्यों नहीं मिला एक और विस्तार?

भैयाजी जोशी 73 वर्ष के हो चुके हैं, जबकि उनकी जगह चुने गए होसबाले 65 वर्ष के हैं। भैयाजी जोशी सरकार्यवाह बने रहते तो उनके नेतृत्व में 2025 में RSS का शताब्दी वर्ष मनाया जाता। तीन साल पहले जोशी ने 2018 में भी पद छोड़ने की पेशकश की थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए उनका कार्यकाल बढ़ाया गया था।

संघ के कार्यकारी प्रमुख यानी सरकार्यवाह का कंट्रोल संगठन की प्रत्येक गतिविधि पर होता है। सुरेश भैयाजी जोशी तीन साल का अपना चौथा कार्यकाल (2009 से 2021) पूरा कर चुके हैं। इससे पहले सिर्फ एचवी शेषाद्री ही लगातार चार कार्यकाल (1987 से 2000) तक सरकार्यवाह रहे थे। अब उनके हटने के बाद यह स्पष्ट है कि संघ के इतिहास में जोशी और शेषाद्री ही ऐसे सरकार्यवाह हैं, जिन्होंने लगातार चार कार्यकाल पूरे किए।

आम तौर पर सरकार्यवाह का चुनाव सह-सरकार्यवाहों यानी संयुक्त महासचिव में से होता है। भैयाजी जोशी के साथ 6 सह-सरकार्यवाह काम कर रहे थे। इस वजह से दत्तात्रेय होसबाले, सुरेश सोनी, डॉ. कृष्णा गोपाल, मनमोहन वैद्य, बी. भगैया और सीआर मुकुंद का नाम दावेदारों के तौर पर लिया जा रहा है। प्रक्रिया के तौर पर यह अनिवार्य नहीं होता क्योंकि 2009 में जब जोशी सरकार्यवाह चुने गए थे, तब वे अखिल भारतीय सेवा प्रमुख थे, सह-सरकार्यवाह नहीं।

खबरें और भी हैं...