भास्कर एक्सप्लेनर:223 KM का रूसी इलाका, जिससे घबराते हैं NATO देश; यहां न्यूक्लियर हमले की प्रैक्टिस से पुतिन ने मचाई खलबली

9 दिन पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय

यूक्रेन के साथ युद्ध के बीच हाल ही में रूस ने कालिनिनग्राद में परमाणु हमला करने में सक्षम इस्कंदर मिसाइल से हमले का अभ्यास करते हुए पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है। ये परमाणु अभ्यास रूस ने बाल्टिक सागर के पास स्थित कालिनिनग्राद में रूस के अहम सैन्य ठिकाने से किया। कालिनिनग्राद रूस के लिए सैन्य रणनीति के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है और माना जा रहा है कि वहां परमाणु अभ्यास करके उसने अमेरिकी वर्चस्व वाले NATO देशों और पश्चिमी देशों को एक तरह से यूक्रेन की मदद से दूर रहने की चेतावनी जारी की है।

ऐसे में चलिए जानते हैं कि आखिर क्या है कालिनिनग्राद, क्यों ये रूस के लिए जरूरी है? कैसे कालिनिग्राद के जरिए रूस यूरोप और अमेरिका को कड़ा संदेश दे रहा है? यह सब जानने से पहले पोल में हिस्सा लेकर अपनी राय दीजिए...

रूस के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्यों है कालिनिनग्राद?
कालिनिनग्राद में रूसी नेवी के बाल्टिक सागर बेड़े का हेडक्वॉर्टर है। कालिनिनग्राद NATO के दो सदस्य देशों पौलेंड और लिथुआनिया के बीच में स्थित है, जिसके एक तरफ बाल्टिक सागर है। कालिनिनग्राद इसी नाम वाले रूस के 46 प्रशासित क्षेत्रों में से एक कालिनिनग्राद ओब्लास्ट का सबसे बड़ा शहर है। केवल कालिनिनग्राद ओब्लास्ट ही रूस का एकमात्र ऐसा इलाका है, जिसका रूस से सीधा जमीनी संपर्क नहीं है। 223 वर्ग किलोमीटर में फैले कालिनिनग्राद की आबादी करीब 5 लाख है।

कालिनिनग्राद की भौगोलिक स्थिति ही इसे सैन्य रूप से रूस के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। रूस पहले भी कालिनिनग्राद में सैन्य अभ्यास करता रहा है। 2021 की सर्दियों में रूस ने कलिनिनग्राद में ही जापद-21 नाम से बड़ा सैन्य अभ्यास किया था।

सोवियत संघ के जमाने से ही कालिनिनग्राद का सैन्यीकरण किया गया था। इस इलाके के आसपास NATO की एंट्री से पिछले दो दशक के दौरान कालिनिनग्राद रूस की जियोपॉलिटिकल स्ट्रैटजी के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण बन गया है।

रूस ने कैसे और क्यों बढ़ाई कालिनिनग्राद में अपनी ताकत?
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही अमेरिकी वर्चस्व वाले सैन्य गठबंधन NATO ने सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके देशों और पूर्वी यूरोप में तेजी से अपना विस्तार किया। ऐसा करके NATO का मकसद रूस को चारों ओर से घेरना था।

1999 में पोलैंड NATO का सदस्य बना। वहीं 2004 में सोवियत संघ का हिस्सा रहे तीन बाल्टिक देश- लातविया, एस्तोनिया और लिथुआनिया भी NATO से जुड़ गए। उसी साल ये तीनों देश यूरोपियन यूनियन से भी जुड़ गए। इन देशों के NATO और यूरोपियन यूनियन से जुड़ने से रूस का कालिनिनग्राद इलाका चारों ओर से NATO और यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों से घिर गया।

फिर अमेरिका के यूरोप में NATO के जरिए एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस तैनात करने के बाद रूस ने कालिनिनग्राद में अपनी सैन्य क्षमता तेजी से बढ़ाई। कालिनिनग्राद में रूस के दो बड़े सैन्य बेस-बाल्टिस्क और चकालोव्सक हैं। बाल्टिस्क में रूस का नेवल बेस है, जबकि चकालोव्सक में उसका नेवल एयर बेस है। बाल्टिस्क में रूस के कम से कम छह बड़े जहाज तैनात हैं। वहीं चकालोव्सक में उसने बड़ी संख्या में हेलिकॉप्टर तैनात कर रखे हैं।

बाल्टिस्क रूस का एकमात्र बाल्टिक पोर्ट है, जो कि साल भर बर्फ से मुक्त रहता है, इसी वजह से ये रूसी नेवी के ऑपरेशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

Globalsecurity.org के मुताबिक रूस ने कालिनिनग्राद में करीब 1 से 2 लाख सैनिक तैनात कर रखे हैं। रूस ने सबसे पहले 2016 में यहां न्यूक्लियर क्षमता से लैस इस्कंदर बैलिस्टिक मिसाइल तैनात की थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस कालिनिनग्राद में कम से कम 24 इस्कंदर मिसाइलें तैनात कर चुका है। 500 किलोमीटर की रेंज वाली इस्कंदर मिसाइल की कालिनिनग्राद में तैनाती से पोलैंड, जर्मनी, यूक्रेन समेत पूरा मध्य और उत्तरी यूरोप इस रूसी मिसाइल की जद में आ गया है।

कैसे कालिननग्राद से NATO और पश्चिमी देशों पर भारी पड़ेगा रूस?
डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि कालिननग्राद ऐसी जगह है, जिसके जरिए रूसी सेना युद्ध की स्थिति में NATO और यूरोपीय देशों पर भारी पड़ सकता है। कालिनिनग्राद के जरिए रूस बाल्टिक सागर में यूरोपीय और NATO देशों की आवाजाही पर पूरी तरह लगाम लगा सकता है। माना जाता है कि भविष्य में NATO के साथ युद्ध होने पर कलिनिनग्राद रूसी अभियानों के लिए एक महत्वपूर्ण लॉन्चपैड होगा।

दरअसल, कालिनिनग्राद सुवाल्की गैप के पास स्थित होने की वजह से भी महत्वपूर्ण है। सुवाल्की गैप एक 65 किलोमीटर लंबा जमीन का टुकड़ा है, जो कि कालिनिनग्राद को बेलारूस से जोड़ता है, लेकिन सुवाल्की गैप NATO सदस्य देशों पोलैंड और लिथुआनिया के बीच में पड़ता है। अगर रूस सुवाल्की गैप पर कब्जा कर ले तो वह पोलैंड और तीनों बाल्टिक देशों-लिथुआनिया, एस्तोनिया और लातविया का NATO के बाकी देशों से संपर्क काट सकता है।

यही वजह है कि अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पहले अमेरिका बाल्टिक देशों को बचा सके, रूस इन देशों पर कब्जा करने में सक्षम है। कालिनिनग्राद में रूसी सेना की भारी संख्या में मौजूदगी और बेलारूस का समर्थन मिलाकर रूस बाल्टिक इलाके में NATO पर भारी पड़ सकता है।

साथ ही रूस के पास कालिनिनग्राद में साल भर बर्फ से मुक्त रहने वाले नेवल बेस बाल्टिस्क है। इस बेस के जरिए वह युद्ध की स्थिति में भूमध्यसागरीय, बाल्टिक, एड्रियाटिक समेत आसपास के समुद्रों में साल भर सक्रिय रहने वाली अमेरिकी नेवी को जोरदार जवाब दे सकता है।

अमेरिका ने यूक्रेन को युद्ध शुरू होने से पहले जनवरी में ही NATO देशों-एस्तोनिया, लिथुआनिया और लातविया के जरिए हथियारों की सप्लाई करवाई थी। युद्ध शुरू होने के बाद भी वह पोलैंड की मदद से यूक्रेन को हथियार पहुंचाता रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि कालिनिनग्राद में रूस ने परमाणु अभ्यास करके यूक्रेन की मदद कर रहे अमेरिका समेत सभी पश्चिमी देशों को ऐसा न करने का एक कड़ा संदेश दे दिया है।

सैन्य ही नहीं आर्थिक रूस से भी कालिनिनग्राद महत्वपूर्ण
हाल के वर्षों में कालिनिनग्राद न केवल सैन्य बल्कि आर्थिक रूप से भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है। चीन और यूरोप के बीच ट्रेड रूट के लिए भी कालिनिनग्राद बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह है। साथ ही हाल ही में चीन और यूरोप के बीच सामान ढुलाई के लिए शुरू हुई ब्लॉक ट्रेन सेवा के लिए भी कालिनिनग्राद जरूरी स्थान बनकर उभरा है।

उदाहरण के लिए हाल ही में नॉर्वे से चीन तक गुजरने वाली ब्लॉक ट्रेनों की शुरुआत हुई। ये ट्रेनें नॉर्वे से चलकर कालिनिनग्राद और बाल्टिक देशों और रूस से होकर चीन तक जाती हैं। नॉर्वे से चीन तक जाने में इस ट्रेन को 16 दिन लगते हैं, जबकि समुद्री रास्ते से जाने पर 40-45 दिन लगते हैं।

क्या है कालिनिनग्राद का इतिहास
कालिनिनग्राद करीब 7 सदी तक जर्मनी का हिस्सा रहा। कालिनिनग्राद को पहले कोएनिग्सबर्ग के रूप में जाना जाता था। कालिनिनग्राद का इतिहास करीब 800 साल पुराना है और इसकी स्थापना 1255 में ट्यूटनिक नाइट्स ने की थी। इस पर लंबे समय तक जर्मन सेनाओं का नियंत्रण रहा।

1945 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इस पर सोवियत संघ ने कब्जा कर लिया था और यहां रहने वाली ज्यादातर जर्मन आबादी को यहां से खदेड़ दिया गया था। अब यहां की करीब 5 लाख की आबादी में से 87% से ज्यादा रूसी मूल की है।

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