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भास्कर एक्सप्लेनर:स्कूल में लड़के-लड़कियां पहनेंगे एक जैसी ड्रेस; कैसी होगी केरल की जेंडर न्यूट्र्ल यूनिफॉर्म

7 दिन पहले

“ये क्या लड़कों जैसे कपड़े पहन लिए?” अगर आप एक लड़की हैं, तो जींस-शर्ट पहनने पर ये शब्द आपने कभी न कभी जरूर सुने होंगे। अक्सर ‘लड़कियों जैसे’ कपड़े पहनने पर लड़कों को भी इस तरह के शब्द सुनने को मिलते हैं।

अब हालांकि, केरल के एक स्कूल के लड़कों और लड़कियों के लिए इन शब्दों का इस्तेमाल कोई नहीं कर पाएगा। इस स्कूल ने लड़के और लड़कियों, दोनों के लिए एक जैसी ड्रेस लागू कर दी है। स्कूल के इस फैसले को देशभर में सराहा जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस पहल से बच्चों में स्कूल के दौरान ही जेंडर इक्वालिटी, यानी सभी जेंडर को बराबर समझने की सोच विकसित होगी।

समझते हैं, पूरा मामला क्या है? स्कूल ने ये कदम क्यों उठाया है? आखिर जेंडर न्यूट्रल यूनिफॉर्म क्या होती है? और दुनियाभर के स्कूलों में जेंडर इक्वालिटी को बढ़ाने के लिए और क्या-क्या पहल हो रही है?...

सबसे पहले जानिए मामला क्या है?

केरल के एर्नाकुलम जिले के वलयंचिरंगरा में एक सरकारी स्कूल है। इस स्कूल ने अपने स्टूडेंट्स के लिए जेंडर न्यूट्रल यूनिफॉर्म इंट्रोड्यूस की है। जेंडर न्यूट्रल यूनिफॉर्म, यानी ऐसी यूनिफॉर्म जिसे लड़के और लड़कियां दोनों पहन सकें। स्कूल ने अपने सभी स्टूडेंट्स के लिए शर्ट और 3/4 शॉर्ट्स यूनिफॉर्म निर्धारित की है। यानी, लड़का हो या लड़कियां दोनों अब शर्ट और शॉर्ट्स पहनकर स्कूल जाएंगे।

इस कदम के पीछे की पूरी कहानी भी जान लीजिए

केरल के इस स्कूल ने 2018 में प्री-प्राइमरी के करीब 200 स्टूडेंट्स के लिए जेंडर न्यूट्रल ड्रेसकोड लागू किया था। अगले ही साल इस ड्रेस कोड को स्कूल के सभी स्टूडेंट्स के लिए लागू करने की योजना थी, लेकिन कोरोना की वजह से स्कूल बंद हुए और ये काम नहीं हो पाया। लॉकडाउन के बाद जैसे ही स्कूल दोबारा खुले ये ड्रेस कोड सभी स्टूडेंट्स के लिए लागू कर दिया गया।

फिलहाल स्कूल में कुल 746 स्टूडेंट्स हैं। इस फैसले को लेने से पहले स्टूडेंट्स और पेरेंट्स की सहमति ली गई। स्कूल प्रबंधन का कहना है कि फैसले से स्टूडेंट्स और पेरेंट्स दोनों बहुत खुश हैं।

हाल ही में केरल के एक कॉलेज ने एक महिला प्रोफेसर को साड़ी पहनकर कॉलेज आने को कहा था। प्रोफेसर ने ऐसा करने से मना कर दिया था। मामले के तूल पकड़ने के बाद केरल के उच्च शिक्षा विभाग ने सर्कुलर जारी कर कहा था कि महिलाओं को वर्कप्लेस पर अपनी पसंद की कपड़े पहनने की आजादी है।

अब समझते हैं, स्कूल ने ये फैसला क्यों लिया है?

दरअसल, ये जेंडर इक्वालिटी के तहत किए जा रहे प्रयासों का एक छोटा हिस्सा है। जेंडर इक्वालिटी यानी लैंगिक समानता। इस पहल के तहत महिला-पुरुषों के बीच लिंग के आधार पर हो रहे भेदभाव को खत्म करना है।

अभी स्कूलों में लड़के और लड़कियां अलग-अलग ड्रेसेस पहनते हैं। अलग-अलग ड्रेस पहनने के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं, बल्कि शारीरिक बनावट है।

लड़कियों के अलग ड्रेस कोड से उन्हें चलने, काम करने में परेशानी होती है। साथ ही ये लैंगिक असमानता का प्रतीक है। इसी वजह से लंबे समय से जेंडर न्यूट्रल ड्रेस कोड की मांग की जा रही थी। इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए स्कूल ने ये फैसला लिया है। फैसले की तारीफ करते हुए केरल के शिक्षामंत्री वी सिवाकुट्टी ने कहा है कि जेंडर इक्वालिटी के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें इस तरह के प्रयासों की और जरूरत है।

ये फोटो केरल के शिक्षामंत्री वी सिवाकुट्टी ने ट्वीट की है।
ये फोटो केरल के शिक्षामंत्री वी सिवाकुट्टी ने ट्वीट की है।

जेंडर इक्वालिटी प्रमोट करने के लिए स्कूल्स में और क्या-क्या पहल हो रही है?

विशेषज्ञों का मानना है कि जेंडर एक्वालिटी की सूझबूझ बच्चों में स्कूल से ही होनी चाहिए। इसलिए दुनियाभर के अलग-अलग स्कूलों में जेंडर इक्वालिटी को प्रमोट करने के लिए अलग-अलग इनीशिएटिव लिए जा रहे हैं।

जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स

दुनियाभर के स्कूल्स में जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स भी इंट्रोड्यूस किए जा रहे हैं। जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट्स, यानी ऐसे टॉयलेट्स जिसका इस्तेमाल तीनों जेंडर के बच्चें कर सकते हैं। स्कूल्स के अलावा पब्लिक प्लेसेस पर भी इस तरह के टॉयलेट्स इंस्टॉल किए जा रहे हैं।

जेंडर सेंसिटिव सिलेबस

कई देश अपने स्कूल और कॉलेज सिलेबस को मॉडिफाई कर उसे जेंडर सेंसिटिव बनाने पर काम कर रहे हैं। इसमें सिलेबस में बदलाव से लेकर टीचर्स की ट्रेनिंग तक के प्रोग्राम शामिल हैं। केरल के शिक्षामंत्री ने भी कहा है कि जेंडर इक्वालिटी के बारे में जागरूक करने के लिए सिलेबस में भी बदलाव किए जाएंगे।

पीरियड बॉक्स

भले ही इस इनीशिएटिव को भारत के चुनिंदा स्कूल्स ने ही फॉलो किया था, लेकिन इसे सफल इनीशिएटिव माना जाता है। इसके तहत स्कूलों में पीरियड बॉक्स लगाए गए। इन बॉक्स में पीरियड के वक्त इस्तेमाल की जाने वाले सैनेटरी पैड और नैपकिन रखे जाते थे। साथ ही पीरियड और इससे जुड़े सवालों पर स्कूल्स में क्वेश्चन-आंसर सेशन ऑर्गनाइज किए जाते थे।

कंसेंट क्लासेस

सबसे पहले केन्या में स्टूडेंट्स के लिए कंसेंट क्लासेस ऑर्गनाइज की गई थी। उसके बाद कई देशों ने इस पहल को आगे बढ़ाया। इस तरह की क्लासेस में फीमेल स्टूडेंट्स को कंसेंट का मतलब बताने के साथ ही सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग भी दी गई थी।