भास्कर एक्सप्लेनर:क्या प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के किसी फैसले पर सवाल उठाना राजद्रोह है? आखिर गोरों के बनाए कानून को केंद्र सरकार खत्म क्यों नहीं करना चाहती?

6 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी

सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन पीनल कोड (IPC) के सेक्शन 124-A को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा है। यह कानून राजद्रोह के मामले में सजा तय करता है। सुप्रीम कोर्ट 27 जुलाई को इसकी वैधानिकता पर सुनवाई करने वाला है।

मई में मणिपुर के 41 वर्षीय किशोरचंद्र वांगखेमचा और छत्तीसगढ़ के 53 वर्षीय कन्हैया लाल शुक्ला ने याचिका दाखिल की थी। दोनों पत्रकार हैं। दोनों के खिलाफ इस सेक्शन के तहत केस दर्ज हुआ है और दोनों को जेल में भी रहना पड़ा है। पत्रकारों का आरोप है कि सरकारें आलोचना भी सुनने को तैयार नहीं हैं। अगर कोई आलोचना करता है तो सेक्शन 124-A के तहत उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है।

देशद्रोह के कानून को रद्द करने पर पहली बार बहस नहीं छिड़ी है। पहले भी इस पर खूब बहस हुई है। पिछले महीने पत्रकार विनोद दुआ के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को कड़ी फटकार लगाई थी। समझते हैं कि यह कानून क्या है? कब लागू हुआ? सरकारें किस तरह इसका दुरुपयोग करती हैं?

IPC की धारा 124-A आखिर है क्या? इस पर इतना बवाल क्यों?

  • भारतीय दंड संहिता या इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 124-A में राजद्रोह की सजा का उल्लेख है। पर यह कैसे पता चलेगा कि किसी व्यक्ति ने राजद्रोह किया है या नहीं। इस पर कानून में राजद्रोह के चार स्रोत बताए गए हैंः बोले गए शब्द, लिखे गए शब्द, संकेत या कार्टून, पोस्टर या किसी और तरह से प्रस्तुति। अगर दोष साबित हो गया तो तीन साल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। अधिकतम सजा उम्रकैद की है।
  • इस सेक्शन के साथ तीन स्पष्टीकरण भी दिए गए हैं। असंतोष में देशद्रोही और दुश्मनी की सभी भावनाएं शामिल हैं। दूसरा और तीसरा स्पष्टीकरण कहता है कि कोई भी व्यक्ति सरकार के फैसलों या उपायों पर टिप्पणी कर सकता है, पर उसमें उसका अपमान या नफरत नहीं होनी चाहिए। अगर आपने कहा कि यह सरकार अच्छी है, पर वैक्सीन पॉलिसी खराब है तो यह राजद्रोह नहीं है। पर अगर आपने सिर्फ इतना लिखा या कहा कि सरकार की वैक्सीन पॉलिसी खराब है तो यह राजद्रोह बन सकता है। हालिया उदाहरण तो कुछ इसी तरह के निकले हैं।

इस कानून को किसने और क्यों बनाया था?

  • 1870 में IPC बना और लागू हुआ। इस कानून को जेम्स स्टीफन ने लिखा था। राजद्रोह से जुड़े कानून पर जेम्स का कहना था कि सरकार की आलोचना बर्दाश्त नहीं होगी। उसने तो यह फैसला भी पुलिस पर छोड़ दिया था कि किस हरकत को देशद्रोह माना जा सकता है और किसे नहीं। साफ है कि गोरे भारत की आजादी के आंदोलन को दबाना चाहते थे और इसके लिए कानून लाया गया था। ताकि आंदोलनकारियों को दबाया जा सके।
  • इस कानून को लेकर 1891 के बांगोबासी केस, 1897 और 1908 में बाल गंगाधर तिलक के केस और 1922 में महात्मा गांधी के केस में अदालतों ने कहा कि जरूरी नहीं कि हिंसा भड़कनी चाहिए। अगर अधिकारियों को लगता है कि किसी बयान से सरकार के खिलाफ असंतोष भड़क सकता है तो राजद्रोह के तहत गिरफ्तार कर सजा सुनाई जा सकती है। तिलक के केस में तो जस्टिस आर्थर स्ट्राची ने कहा था कि असंतोष भड़काने की कोशिश करना भी राजद्रोह है।

क्या मोदी के केंद्र में सरकार बनाने के बाद केस बढ़े?

  • हां। आर्टिकल-14 डॉट कॉम ने 2020 में एक रिसर्च में यह दावा किया है। रिसर्च पोर्टल का दावा है कि 2010 से 2020 के बीच करीब 11 हजार लोगों के खिलाफ देशद्रोह के 816 केस दर्ज हुए। इसमें 65% लोगों को मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आरोपी बनाया गया। इनमें विपक्ष के नेता, छात्र, पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद शामिल हैं।
  • 405 भारतीयों के खिलाफ नेताओं और सरकारों की आलोचना करने पर राजद्रोह के आरोप लगे। इनमें 96% केस 2014 के बाद रजिस्टर हुए। इसमें भी 149 पर मोदी के खिलाफ गंभीर और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप है। 144 केस उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आलोचना करने के हैं।
  • मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार की तुलना में 2014 से 2020 के बीच हर साल राजद्रोह के केस में 28% की बढ़ोतरी हुई है। ज्यादातर केस सरकार के खिलाफ हुए आंदोलनों को लेकर दाखिल हुए। इनमें ज्यादातर केस नागरिकता कानून में संशोधन और हाथरस में दलित किशोरी के दुष्कर्म के विरोध में हुए आंदोलनों को लेकर दर्ज हुए।

क्या है केदारनाथ सिंह बनाम बिहार सरकार केस, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है?

  • आज सुप्रीम कोर्ट के सामने जो प्रश्न है, वह छह दशक पहले भी था। 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के खिलाफ दाखिल केदारनाथ सिंह की याचिका पर राजद्रोह के कानून यानी सेक्शन 124-A को कायम रखा था। उसके बाद से हर केस में इस फैसले का जिक्र आता है।
  • 1953 में केदारनाथ सिंह बिहार में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे। बेगुसराय की एक रैली में उन्होंने सत्ताधारी कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने कहा था कि आज सीबीआई के कुत्ते बेगुसराय के आसपास घूम रहे हैं। कई ऑफिशियल कुत्ते इस रैली में भी हैं। भारत के लोगों ने जिस तरह अंग्रेजों को देश से बाहर निकाला और कांग्रेसी गुंडों को गद्दी पर बिठा दिया। जिस तरह हमने गोरों को भगाया, वैसे ही हम कांग्रेसियों को भी भगाएंगे।
  • केदारनाथ के ऐसे तीखे भाषण के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ। फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट ने केदारनाथ को राजद्रोह का दोषी माना और सजा सुना दी। पटना हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील को खारिज कर दिया। तब 1962 में सुप्रीम कोर्ट में केदारनाथ सिंह ने सेक्शन 124-A की संवैधानिक वैधता को खत्म करने की मांग की थी। उनका कहना था कि संविधान के आर्टिकल 19 में उन्हें बोलने की आजादी मिली है और यह कानून उन्हें अधिकार से वंचित कर रहा है।
  • तब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान बेंच ने इस कानून की वैधता को तो कायम रखा, पर इसका इस्तेमाल कब और कैसे किया जा सकता है, इसके लिए नियम तय कर दिए। तय हुआ कि सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं है। अगर लिखे या कहे गए शब्द सरकार के खिलाफ हिंसा भड़काने या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए हैं तो ही राजद्रोह का दोष बनेगा, अन्यथा नहीं।
मामला फरवरी 2020 का है। कर्नाटक के बिदार में स्कूली बच्चों ने 21 जनवरी 2020 को एक नाटक प्रस्तुत किया था। इसकी कुछ लाइनें नागरिकता कानून के खिलाफ थीं। केस दर्ज हुआ तो पुलिस ने चार बार कक्षा 6, 7 और 8 के बच्चों के साथ पूछताछ की।
मामला फरवरी 2020 का है। कर्नाटक के बिदार में स्कूली बच्चों ने 21 जनवरी 2020 को एक नाटक प्रस्तुत किया था। इसकी कुछ लाइनें नागरिकता कानून के खिलाफ थीं। केस दर्ज हुआ तो पुलिस ने चार बार कक्षा 6, 7 और 8 के बच्चों के साथ पूछताछ की।

पर क्या केदारनाथ सिंह केस के बाद दुरुपयोग थम गया?

  • नहीं। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी का कहना है कि केदारनाथ सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी ने हिंसा या बगावत के लिए नहीं उकसाया है तो यह राजद्रोह नहीं है। पर इसके बाद भी कानून के दुरुपयोग के रास्ते बंद नहीं हुए हैं। किसी पुलिस वाले को लगता है कि कोई कार्टून कानून-व्यवस्था को खराब कर सकता है तो वह कार्टूनिस्ट को गिरफ्तार कर लेगा।
  • अचारी के मुताबिक उस पुलिस वाले की व्यक्तिगत राय महत्वपूर्ण हो जाती है। केदारनाथ जजमेंट ने लॉ एनफोर्समेंट मशीनरी को नागरिकों के अधिकार छीनने का रास्ता साफ कर दिया है। लोकतंत्र में लोगों को सरकार को बदलने का अधिकार है। अगर सरकार नाकाम रहती है तो उन्हें असंतोष दिखाने का अधिकार मिलना चाहिए। सरकार से नफरत करने पर दंडित करने वाले राजद्रोह के कानून से अधिकारों का हनन होता है। बड़ी बेंच को अब केदारनाथ जजमेंट का रिव्यू करना बेहद जरूरी हो गया है।
विनोद दुआ ने पिछले साल सरकार की लॉकडाउन पॉलिसी पर सवाल उठाए थे। खासकर बड़े शहरों से पलायन करने वाले मजदूरों से जुड़े मुद्दे उठाए थे। इस पर उनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज हुआ। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने दुआ को राहत प्रदान की।
विनोद दुआ ने पिछले साल सरकार की लॉकडाउन पॉलिसी पर सवाल उठाए थे। खासकर बड़े शहरों से पलायन करने वाले मजदूरों से जुड़े मुद्दे उठाए थे। इस पर उनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज हुआ। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने दुआ को राहत प्रदान की।

दुनियाभर में राजद्रोह कानूनों की क्या स्थिति है?

दुनिया को राजद्रोह से जुड़े कानून देने वाले यूके में यह 2009 में खत्म हो गया है। इसी तरह ज्यादातर देश या तो इसे खत्म कर चुके हैं या दुरुपयोग रोकने के लिए शब्दों में बदलाव कर चुके हैं। आइए जानते हैं कि कहां क्या स्थिति है-

  • यूनाइटेड किंगडमः 2009 में राजद्रोह कानून रद्द हो गया। यह बदलाव 12 जनवरी 2010 से लागू हुआ। पर ऐसे व्यक्ति के खिलाफ राजद्रोह का केस चल सकता है जो यूके का नागरिक नहीं है।
  • न्यूजीलैंडः संसद ने 2007 में राजद्रोह से जुड़े कानून को रद्द कर दिया। यह बदलाव 1 जनवरी 2008 से लागू हुआ।
  • स्कॉटलैंडः क्रिमिनल जस्टिस एंड लाइसेंसिंग एक्ट 2010 के सेक्शन 51 के हवाले से 28 मार्च 2011 से राजद्रोह के तहत सभी प्रावधानों को हटा दिया गया।
  • इंडोनेशियाः 2007 में इंडोनेशिया ने राजद्रोह कानून को असंवैधानिक करार दिया।
  • घानाः संसद ने क्रिमिनल लिबेल एंड सिडेशियस लॉ को रद्द किया। इससे राजद्रोह का कानून खत्म हो गया।
  • ऑस्ट्रेलियाः क्राइम एक्ट 1920 में राजद्रोह अपराध था। 1984 और 1991 में इसकी समीक्षा हुई। 2010 में राजद्रोह शब्द की जगह ‘हिंसक अपराधों के लिए उकसावा’ लिखा गया।
  • अमेरिकाः कानून में इतने बदलाव हो चुके हैं कि यह अब डेड लॉ है। कानून में ‘यूज ऑफ फोर्स’ और ‘कानून का उल्लंघन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल राजद्रोह को परिभाषित करने के लिए किया गया है।
  • भारत में क्या है स्थितिः लॉ कमीशन की 2018 की रिपोर्ट में सेक्शन 124-A पर विस्तार से चर्चा की गई थी। इसमें सुझाया गया कि सेक्शन 124-A का इस्तेमाल उन्हीं मामलों में होना चाहिए जहां कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने या सरकार को हिंसक या अवैध तरीके से हटाने की मंशा दिखाई दे। सिविल राइट एक्टिविस्ट, वकील और कई एकेडेमिशियन भी इसकी मांग कर रहे हैं।