भास्कर एक्सप्लेनर:भारत में मिलिट्री ट्रेनिंग लेने वाला ‘शेरू’ आज तालिबान के 7 सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल, उसके आगे बढ़ने में ISI का क्या रोल है?

5 महीने पहलेलेखक: जयदेव सिंह

सात चेहरे इस वक्त अफगानिस्तान पर राज कर रहे हैं। ये सात चेहरे तालिबान के सबसे ताकतवर चेहरे हैं। इनमें एक ऐसा चेहरा भी शामिल है जिसका भारत से सीधा कनेक्शन है। उस चेहरे का नाम है शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजाई।

वो जब भारत में रहता था तो उसके साथी उसे शेरू कहकर बुलाते थे। शेर मोहम्मद एक समय इंडियन मिलिट्री एकेडमी में ट्रेनिंग ले चुका है। उत्तराखंड के देहरादून में जब वो ट्रेनिंग ले रहा था तब उसकी उम्र महज 20 साल थी। उस वक्त उन 45 विदेशी कैडेट में शामिल था जो एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहे थे।

भारत में मिलिट्री ट्रेनिंग लेने वाला एक कैडेट कैसे तालिबान में शामिल हो गया? तालिबान के आम लड़ाके से उसके टॉप लीडर्स में कैसे शामिल हुआ शेर मोहम्मद? शेर मोहम्मद को आगे बढ़ाने में पाकिस्तान का क्या रोल रहा है? आइए जानते हैं...

IMA में कैसे ट्रेनिंग करने आया शेर मोहम्मद?
शेर मोहम्मद अफगानिस्तान के लोगार प्रोविंस के बराकी बरक जिले का है। 1963 में जन्मा शेर मोहम्मद तालिबान लड़ाकों की तरह ही पश्तून है। पॉलिटिकल साइंस से मास्टर्स करने के बाद उसने देहरादून की इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) में ट्रेनिंग ली। 1970 के दशक से ही इस एकेडमी में अफगान आर्मी के जवानों को भी ट्रेनिंग दी जाती है।

IMA में ट्रेनिंग के दौरान शेर मोहम्मद(लाल घेरे में)
IMA में ट्रेनिंग के दौरान शेर मोहम्मद(लाल घेरे में)

क्या शुरू से ही कट्टर सोच का था शेर मोहम्मद?
IMA में शेर मोहम्मद के बैचमेट रहे रिटायर्ड मेजर जनरल डीए चतुर्वेदी ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि वो एक मिलनसार लड़का था। एकेडमी के बाकी कैडेट के मुकाबले वो थोड़ा ज्यादा उम्र का लगता था। वो कहते हैं कि उस वक्त उसकी सोच कट्टर नहीं थी। वो यहां एक आम अफगान कैडेट की तरह ही रहा।

एक और बैचमेट रिटायर्ड कर्नल केसर सिंह शेखावत बताते हैं कि वो आम लड़कों जैसा ही था। वो कहते हैं कि हम लोग एक बार ऋषिकेश गए थे। वहां उसने भी गंगा में स्नान करने के साथ स्वीमिंग भी की थी।

शेर मोहम्मद(लाल घेरे में) के साथ ट्रेनिंग करने वालों का कहना है कि ट्रेनिंग के दौरान वो कट्टर विचारों वाला नहीं था।
शेर मोहम्मद(लाल घेरे में) के साथ ट्रेनिंग करने वालों का कहना है कि ट्रेनिंग के दौरान वो कट्टर विचारों वाला नहीं था।

अफगान सेना का सैनिक तालिबान से कैसे जुड़ गया?
भारत में अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद शेर मोहम्मद अफगान सेना में शामिल हुआ। सोवियत संघ-अफगानिस्तान युद्ध के दौरान वो अफगान आर्मी का हिस्सा था। 1996 में उसने अफगान सेना की नौकरी छोड़ दी। उस वक्त तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आ चुका था। नौकरी छोड़ने के बाद शेर मोहम्मद तालिबान से जुड़ गया। वहीं, कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद शेर मोहम्मद काबुल लौटने की जगह पाकिस्तान चला गया। यहीं वो तालिबान से जुड़ गया।

एक आम सैनिक से तालिबान के टॉप लीडर में कैसे शामिल हुआ शेर मोहम्मद?
शेर मोहम्मद के दोस्त ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि जब उसने तालिबान जॉइन किया तो वो इस संगठन में फिट नहीं था। वो अक्सर पाकिस्तान के क्वेटा के एक रेस्टोरेंट में अपनी पत्नी के साथ खाना खाने जाता था। ये तालिबान लड़ाकों के बीच गॉसिप का विषय था।

1996 में जब तालिबान सत्ता में आया तो शेर मोहम्मद को पहले विदेश उप-मंत्री और बाद में स्वास्थ्य उप-मंत्री बनाया गया था। 1996 में वो अमेरिका दौरे पर भी गया। जहां उसने तालिबान सरकार को डिप्लोमैटिक मान्यता देने के लिए क्लिंटन प्रशासन से बात की। हालांकि, वो इसमें सफल नहीं रहा।

पिछले कई सालों के दौरान शेर मोहम्मद तालिबान के सबसे अहम मध्यस्थों में शामिल है। अंग्रेजी बोल पाना और मिलिट्री बैकग्राउंड का होना इसकी सबसे अहम वजह है। पाकिस्तान में रहने के दौरान पाकिस्तानी सैन्य खुफिया एजेंसी ISI के साथ रिश्ते बेहतर करने का काम था। शेर मोहम्मद को जानने वाले कहते हैं कि इस दौरान किया गया काम ही उसके राजनीतिक करियर को ऊंचाई देने में सबसे अहम रहा।

ISI ने शेर मोहम्मद को आगे बढ़ाने में कैसे मदद की?
भारत के मिलिट्री स्कूल में पढ़ा एक कैडेट पाकिस्तानी खूफिया एजेंसी का हथियार बन गया। ISI से अपने रिश्तों की वजह से ही 1998 में उसके करियर में बहुत बड़ा बदलाव आया। दरअसल सत्ता के दुरुपयोग और शराब के चलते वो तालिबान लीडरशिप से दूर चला गया। उसे विदेश उप-मंत्री के पद से हटा दिया गया। यहां तक की उसे नजरबंद कर दिया गया। शेर मोहम्मद उस वक्त तालिबान नेता मुल्ला मोहम्मद उमर के निशाने पर था, लेकिन ISI के चलते उसके दिन बदले।

तालिबान को बढ़ाने में ISI का रोल किसी से छुपा नहीं है। इसी ISI से अपने संबंधों के चलते वो आरोपों के बाद भी लीडरशिप ग्रुप में लौट आया। वापसी करने के बाद उसे स्वास्थ्य उप-मंत्री बना दिया गया। 2012 में तालिबान ने दोहा में अपना पॉलिटिकल ऑफिस बनाया। जहां, उसके सीनियर लीडर रहते थे। यहां तालिबान की ओर से बातचीत की उसने अगुआई भी की। 2019 में अब्दुल गनी बरादर के आने तक शेर मोहम्मद ही इस ऑफिस का सर्वेसर्वा था।

अफगान सरकार के अधिकारियों से बातचीत के लिए तालिबान ने जो टीम बनाई थी। उसका डिप्टी चीफ शेर मोहम्मद था। आज शेर मोहम्मद तालिबान का सबसे अहम दूत है। उसने अमेरिका से सीधे बातचीत की, वहीं मॉस्को और बीजिंग गए तालिबानी वार्ताकारों के ग्रुप को भी उसने ही लीड किया था।

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