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  • Supreme Court Banned In 2013, Yet Why Are You Finding Out Whether Rape Has Happened Or Not With Two Finger Test In Airforce

भास्कर एक्सप्लेनर:सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में बैन किया, फिर भी एयरफोर्स में टू फिंगर टेस्ट से क्यों पता कर रहे हैं कि रेप हुआ है या नहीं

18 दिन पहले

कोयंबटूर में एयरफोर्स की महिला अधिकारी से रेप हुआ या नहीं, यह जानने के लिए डॉक्टरों ने टू-फिंगर टेस्ट किया। इस पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। आयोग का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट इस टेस्ट पर प्रतिबंध लगा चुका है तो यह क्यों हुआ? लेटर सीधे-सीधे एयर चीफ मार्शल को भेजा गया है।

दरअसल, मामला एयरफोर्स एडमिनिस्ट्रेटिव कॉलेज के परिसर में कथित रेप का है। पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है। पीड़िता ने FIR में बताया है कि मेरे लिए टू-फिंगर टेस्ट से गुजरना बेहद पीड़ादायक था। आरोपी फ्लाइट लेफ्टिनेंट को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आयोग ने इस घटना पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि एयरफोर्स के ही डॉक्टरों की ओर से टू-फिंगर टेस्ट किया जाना महिला अधिकारी की गरिमा और निजता का हनन है।

यह सब तो ठीक है। रेप हुआ, FIR दर्ज हुई और आरोपी गिरफ्तार हो गया। अब यह टू-फिंगर टेस्ट क्या है, जिसे लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग को आवाज उठानी पड़ी? सुप्रीम कोर्ट ने इसे क्यों बैन किया था?

क्या है रेप की पुष्टि के लिए होने वाला टू-फिंगर टेस्ट?

  • यह एक मैन्युअल प्रक्रिया है। इसके तहत डॉक्टर पीड़िता के प्राइवेट पार्ट में एक या दो उंगली डालकर टेस्ट करते हैं कि वह वर्जिन है या नहीं। यदि उंगलियां आसानी से चली जाती हैं तो माना जाता है कि वह सेक्सुअली एक्टिव थी।
  • इससे वहां उपस्थित हाइमन का पता भी लगाया जाता है। इस प्रक्रिया की तीखी आलोचना होती रही है। यह किसी पीड़िता की गरिमा के खिलाफ है। इसके अलावा यह अवैज्ञानिक भी है और जानकार मानते हैं कि इससे यह पता लगा पाना मुश्किल होता है कि रेप हुआ है या नहीं। टू-फिंगर टेस्ट की आलोचना करने वाले इसे एक बार फिर से रेप जैसी दर्दनाक चीज से गुजरने वाला बताते रहे हैं।

क्या था इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

  • लिलु राजेश बनाम हरियाणा राज्‍य के मामले (2013) में सुप्रीम कोर्ट ने टू-फिंगर टेस्‍ट को असंवैधानिक करार दिया था। कोर्ट ने इसे रेप पीड़‍िता की निजता और उसके सम्‍मान का हनन करने वाला करार दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह शारीरिक और मानसिक चोट पहुंचाने वाला टेस्‍ट है। यह टेस्‍ट पॉजिटिव भी आ जाए तो नहीं माना जा सकता है कि संबंध सहमति से बने हैं।
  • 16 दिसंबर 2012 के गैंगरेप के बाद जस्टिस वर्मा कमेटी बनाई गई थी। इसने अपनी 657 पेज की रिपोर्ट में कहा था- टू फिंगर टेस्ट में वजाइना की मांसपेशियों का लचीलापन देखा जाता है। इससे यह पता चलता है कि महिला सेक्सुअली एक्टिव थी या नहीं। यह समझ नहीं आता कि उसकी रजामंदी के विपरीत जाकर संबंध बनाए गए। इस वजह से यह बंद होना चाहिए।
  • हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के बैन के बाद भी शर्मिंदा करने वाला यह टू-फिंगर टेस्‍ट होता रहा है। 2019 में ही करीब 1500 रेप सर्वाइवर्स और उनके परिजनों ने कोर्ट में शिकायत की थी। इसमें कहा गया था कि सर्वोच्‍च न्यायालय के आदेश के बावजूद यह टेस्‍ट हो रहा है। याचिका में टेस्‍ट को करने वाले डॉक्‍टरों का लाइसेंस कैंसिल करने की मांग की गई थी। संयुक्‍त राष्‍ट्र भी इस टेस्‍ट को मान्‍यता नहीं देता है।

क्या टू-फिंगर टेस्ट राइट टू प्राइवेसी का उल्लंघन है?

  • हां। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के बाद कई मामलों में टू-फिंगर टेस्ट को गैरजरूरी बताया है। यह टेस्ट जिस लड़की या महिला पर किया जाता है, उसकी निजता, सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन है। सेक्स के लिए दी गई रजामंदी को टू-फिंगर टेस्ट के आधार पर साबित नहीं किया जा सकता।
  • सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि रेप के मामले में महिला या लड़की की सेक्सुअल हिस्ट्री कोई मायने नहीं रखती है। यहां बात सिर्फ रजामंदी की है और वह रजामंदी किस स्तर पर और किस हालत में दी गई, यह देखना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने टू-फिंगर टेस्ट पर आधारित नतीजों को काल्पनिक और निजी राय करार दिया है।

क्या कहती है सरकार इस टेस्ट पर?

  • केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस टेस्‍ट को अवैज्ञानिक बताया था। मार्च 2014 में रेप पीड़‍ितों के लिए नई गाइडलाइन बनी थी। इसमें सभी अस्‍पतालों से फॉरेंसिक और मेडिकल टेस्ट के लिए खास कक्ष बनाने को कहा गया था। टू-फिंगर टेस्‍ट न करने पर सख्ती से निर्देश जारी किए थे।
  • गाइडलाइन में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि हिस्ट्री रिकॉर्ड पर ली जाए। पीड़िता की शारीरिक के साथ-साथ मानसिक जांच का परामर्श भी दिया गया है। हाल ही में महाराष्‍ट्र यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्‍थ साइंसेज ने 'फॉरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्‍सिकोलॉजी' विषय के लिए कोर्स में बदलाव किया था। इसमें 'साइन्‍स ऑफ वर्जिनिटी' टॉपिक हटा दिया गया है।
  • चिकित्सकीय सबूत रेप के मामले में नतीजों तक पहुंचने में अहम होते हैं। हालांकि, रेप के मामलों में फॉरेंसिक सबूतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कई बार दो लोगों के बीच संबंध आपसी रजामंदी से हो सकते हैं, जो अपराध नहीं है। इस वजह से सिर्फ नाबालिगों के मामले में यह ठोस सबूत के तौर पर देखा जाता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानून क्या कहते हैं?

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही टू-फिंगर टेस्ट को अनैतिक बता चुका है। WHO ने कहा था कि रेप के केस में अकेले हाइमन की जांच से सब कुछ पता नहीं चलता है। टू-फिंगर टेस्ट मानवाधिकार उल्लंघन के साथ ही पीड़िता के लिए दर्द का कारण बन सकता है। ये यौन हिंसा जैसा है, जिसे पीड़िता दोबारा अनुभव करती है। भारत समेत ज्यादातर देशों में टू-फिंगर टेस्ट प्रतिबंधित है।
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