अयोध्या केस की सुनवाई से पीछे हटे थे जस्टिस ललित:कल्याण सिंह के वकील रहे थे, 'तीन तलाक’ और ‘पॉक्सो एक्ट’ जैसे अहम फैसले दिए

14 दिन पहलेलेखक: प्रज्ञा भारती/ सिद्धार्थ शर्मा

जस्टिस उदय उमेश ललित का अगला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, यानी CJI बनना लगभग तय है। मौजूदा CJI एनवी रमना ने उनके नाम की सिफारिश की है।

CJI ने केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू को जस्टिस ललित के नाम का सिफारिशी पत्र सौंप दिया है। कानून मंत्री के जरिए यह सिफारिश भारत सरकार तक जाएगी। अगर यह मान ली जाती है तो जस्टिस ललित भारत के 49वें चीफ जस्टिस बनेंगे।

27 अगस्त को CJI रमना का 65वां जन्मदिन है। जाहिर है कि वे 26 अगस्त को रिटायर हो जाएंगे। परंपरा के मुताबिक, रिटायरमेंट से पहले CJI को अगले चीफ जस्टिस के नाम की सिफारिश करनी होती है।

आज के एक्सप्लेनर में जस्टिस यूयू ललित के पांच ऐतिहासिक फैसलों को जानते हैं। ये देश के कानूनी और राजनीतिक इतिहास में मील के पत्थर साबित हुए...

जस्टिस यू यू ललित केवल 3 महीनों के लिए भारत के चीफ जस्टिस बनेंगे। यह दूसरी बार है कि भारत में 3 महीने के अंदर ही 3 चीफ जस्टिस होंगे।
जस्टिस यू यू ललित केवल 3 महीनों के लिए भारत के चीफ जस्टिस बनेंगे। यह दूसरी बार है कि भारत में 3 महीने के अंदर ही 3 चीफ जस्टिस होंगे।

पहला फैसला: तीन तलाक को बराबरी के हक के खिलाफ बताया था

फरवरी 2016 में उत्तराखंड की रहने वाली सायरा बानो ने तीन बार तलाक बोलकर तलाक दिए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सायरा को उनके पति ने अक्टूबर 2015 में तीन बार तलाक बोलकर छोड़ दिया था।

सायरा बानो ने तीन-तलाक पर अपनी याचिका के जरिए इसे भारत के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में इस बात को माना और तीन तलाक को असंवैधानिक बताया।
सायरा बानो ने तीन-तलाक पर अपनी याचिका के जरिए इसे भारत के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में इस बात को माना और तीन तलाक को असंवैधानिक बताया।

सायरा ने तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत, बहुविवाह और निकाह हलाला की संवैधानिकता पर सवाल खड़े किए थे। उनका कहना था कि ये प्रथाएं समानता, आजीविका के अधिकार, भेदभाव को रोकने वाले मूल अधिकारों के खिलाफ हैं। वहीं, यह प्रथा धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में नहीं आता।

पांच जजों की संविधान पीठ ने मामले पर 11 मई 2017 से 19 मई 2017 तक लगातार 8 दिनों तक सुनवाई की थी। 22 अगस्त 2017 को सुनाए गए फैसले में 5 में से 3 जजों ने तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक बताया था। तब के CJI जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने तलाक-ए-बिद्दत को धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा माना था। वहीं जस्टिस नरीमन और जस्टिस ललित ने अपने फैसले में लिखा, 'यह साफ है कि तलाक का यह तरीका मनमाना है। इसमें एक मुस्लिम पुरुष सुलह की कोशिश किए बिना ही शादी को खत्म कर सकता है। ऐसे में यह तलाक बराबरी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।'

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम महिलाओं ने परिसर के बाहर ही जश्न मनाना शुरू कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम महिलाओं ने परिसर के बाहर ही जश्न मनाना शुरू कर दिया था।

दूसरा फैसला: बच्चों को कपड़े के ऊपर से छूने पर भी लगेगा पॉक्सो एक्ट

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2021 में फैसला सुनाया था। अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक जजमेंट को बदलते हुए कहा था कि स्किन टु स्किन कॉन्टेक्ट के बिना भी पॉक्सो एक्ट लागू होता है। दरअसल, इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के बाद कहा था कि इसमें स्किन-टु-स्किन संपर्क नहीं हुआ है, इसलिए यह आरोप सही नहीं है। यही नहीं बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था।

पॉक्सो एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच के सामने सुनवाई हुई थी। जस्टिस यूयू ललित की अगुआई वाली इस बेंच में जस्टिस एस. रविंद्र भट्ट और बेला एम. त्रिवेदी शामिल थीं। सुनवाई के बाद पूरी बेंच ने कहा था, 'सेक्सुअल इरादे से किसी बच्चे के यौन अंग को छूना कोई मामूली बात नहीं है। इसे पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 7 से बाहर नहीं किया जा सकता। भले ही आरोपी गलत इरादे से कपड़े के ऊपर से ही क्यों न छू रहा हो।'

बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के बाद इसे लेकर बहुत बवाल मचा था। आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बदला और सेक्सुअल इंटेंट से किए गए किसी भी व्यवहार को पॉक्सो एक्ट के तहत माना।
बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के बाद इसे लेकर बहुत बवाल मचा था। आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बदला और सेक्सुअल इंटेंट से किए गए किसी भी व्यवहार को पॉक्सो एक्ट के तहत माना।

तीसरा फैसला: SC-ST एक्ट का गलत इस्तेमाल कर रहे लोग, पूरे देश में मचा था बवाल

यह केस मार्च 2018 का काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार के बीच था। इस मामले में सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटी) एक्ट के दुरुपयोग होने की बात कही थी। कोर्ट का मानना था कि लोग अपनी निजी दुश्मनी के लिए SC/ST एक्ट का फायदा उठा रहे हैं। दो जजों जस्टिस यूयू ललित और गोयल की बेंच ने यह फैसला दिया। उन्होंने अपने फैसले में इन तीन उपायों का जिक्र किया था -

1. FIR से पहले प्रारंभिक जांच करना होगा।

2. जांच अधिकारी को गिरफ्तारी से पहले सीनियर अधिकारियों की मंजूरी लेनी होगी।

3. SC-ST एक्ट में अग्रिम जमानत दी जाए।

इस फैसले का देशभर में दलित और जनजातीय समुदाय के लोगों ने भारी विरोध किया। आखिर सरकार ने अगस्त 2018 में संसद में SC-ST (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटी) एक्ट में बदलाव करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था।

पूरे देश में इस फैसले के बाद आंदोलन होने शुरू हो गए थे। इनका दबाव इतना ज्यादा था कि सरकार SC/ST एक्ट में बदलाव करना पड़ा।
पूरे देश में इस फैसले के बाद आंदोलन होने शुरू हो गए थे। इनका दबाव इतना ज्यादा था कि सरकार SC/ST एक्ट में बदलाव करना पड़ा।

चौथा फैसला: तलाक लेने पर 6 महीने का मिनिमम वेटिंग पीरियड जरूरी नहीं

यह 2017 का मामला है। अमरदीप सिंह और हरवीन कौर ने इस केस में आपसी सहमति से तलाक लेने पर 6 महीने के मिनिमम वेटिंग पीरियड को खत्म करने की मांग की थी। अमरदीप सिंह और हरवीन कौर 8 साल से ज्यादा समय से अलग रह रहे थे।

इस मामले में सुनवाई के बाद अपने जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि, 'हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 13बी (2) के तहत मिलने वाला 6 महीने का वेटिंग पीरियड जरूरी नहीं है। आपसी सहमति से तलाक लेने पर इस समय सीमा को खत्म करने या नहीं मानने का फैसला अदालत दे सकती है। बशर्ते कि दोनों पार्टियों के साथ आने की कोई संभावना न हो।' आपको बता दें कि इस ऐतिहासिक फैसले को सुनाने वाले दो जजों की पीठ में भी जस्टिस यूयू ललित भी शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, आपसी सहमति से तलाक लेने पर 6 महीने के मिनिमम वेटिंग पीरियड को अदालत चाहे तो खत्म कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, आपसी सहमति से तलाक लेने पर 6 महीने के मिनिमम वेटिंग पीरियड को अदालत चाहे तो खत्म कर सकती है।

पांचवा फैसला: पद्मनाभस्वामी मंदिर का मैनेजमेंट त्रावणकोर राजपरिवार को सौंपा

सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई 2020 को केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में देख-रेख की जिम्मेदारी त्रावणकोर के पूर्व शाही परिवार को दे दी थी। यह फैसला सुनाने वाली दो जजों की पीठ की अगुआई जस्टिस यूयू ललित कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान केरल हाईकोर्ट के 2011 के फैसले को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि मंदिर प्रबंधन और संपत्ति की जिम्मेदारी के लिए एक ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'मंदिर में दी जाने वाली सेवा राजपरिवार की विरासत है।'

अयोध्या मामले की सुनवाई से खुद को हटाया

जस्टिस यूयू ललित अयोध्या रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद केस की सुनवाई करने वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ में शामिल थे। पीठ में CJI रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, एनवी रमना और डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे। मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश एडवोकेट राजीव धवन ने पीठ से कहा कि जस्टिस यूयू ललित 1997 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन CM कल्याण सिंह की ओर से बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के मामले में पेश हुए थे। धवन की इस टिप्पणी के बाद जस्टिस ललित ने 10 जनवरी 2019 को खुद को अयोध्या मामले की सुनवाई से अलग कर लिया था।

बार से सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज और CJI बनने वाले दूसरे जज

जस्टिस यूयू ललित 2014 में बार से सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त किए गए थे। जस्टिस एसएम सीकरी के बाद जस्टिस ललित इस तरह नियुक्त होने वाले दूसरे जज होंगे, जो CJI बनेंगे। उनसे पहले जस्टिस सीकरी मार्च 1964 में इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए गए थे। वह जनवरी 1971 में भारत के 13वें चीफ जस्टिस बने थे।

जस्टिस ललित का कार्यकाल केवल 74 दिन का होगा। वे 8 नवंबर 2022 को रिटायर हो जाएंगे।

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