शुक्रवार को VRS, शनिवार को अपॉइंटमेंट और सोमवार को जॉइनिंग:सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- ऐसी भी क्या जल्दी थी

2 महीने पहलेलेखक: नीरज सिंह

‘चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की फाइल बिजली की रफ्तार से क्लियर की गई। जिस दिन एप्लिकेशन आती है, उसी दिन क्लियरेंस दे दी जाती है और प्रधानमंत्री भी नाम को मंजूरी दे देते हैं। ऐसी अर्जेंसी क्या थी, जो सारा काम 1 दिन में ही करके नियुक्ति दे दी गई। हमें भी पता है कि कुछ काम बिजली की रफ्तार से करने पड़ते हैं, लेकिन यहां तो वैकेंसी 15 मई से थी।’

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर ये टिप्पणी की है। चुनाव आयुक्त यानी EC अरुण गोयल की नियुक्ति की ओरिजिनल फाइल सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को सौंपी थी। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की।

भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर विवाद क्या है? सुप्रीम कोर्ट में क्या बहस हुई और चुनाव आयुक्त को चुनने का पूरा सिस्टम कैसे काम करता है?

सवाल-1 : सवाल चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर क्या विवाद है?

जवाब : साल 2018 में चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता को लेकर कई याचिकाएं दायर हुईं थीं। इनमें मांग की गई थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC और चुनाव आयुक्त यानी EC की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसा सिस्टम बने। सुप्रीम कोर्ट ने इन सब याचिकाओं को क्लब करते हुए इसे 5 जजों की संविधान पीठ को भेज दिया था। सुप्रीम कोर्ट इसी मामले की सुनवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार शामिल हैं। जस्टिस केएम जोसेफ इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं में इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील अनूप बरनवाल, सुप्रीम कोर्ट के वकील और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR है।

याचिकाकर्ताओं के तर्क- प्रक्रिया पारदर्शी नहीं

चुनाव आयुक्त के लिए फिलहाल अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। चूंकि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं। ऐसे में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह से सरकार का फैसला होता है। यह सत्ता में बैठी पार्टियों को मौका देता है कि वह अपने वफादार को इस पद पर नियुक्त करे सकें।

दुर्भाग्य से यह धारणा बन रही है कि चुनाव आयोग सत्ता में मौजूद सरकार के प्रति उदार है। आयोग चुनाव प्रचार के दौरान सत्ताधारी सरकार के सदस्यों के खिलाफ आई शिकायतों के प्रति उतनी सख्ती नहीं दिखाती जितनी विपक्ष के खिलाफ दिखाती है यानी यहां पर उसके नियम बदल जाते हैं।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक न्यूट्रल बॉडी यानी स्वतंत्र निकाय करे। 1975 से शुरू हुई कई समितियां भी यह सुझाव दे चुकी हैं। भारत के 255वें लॉ कमीशन की रिपोर्ट में भी सिफारिश की गई थी कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कॉलेजियम जैसे सिस्टम से होनी चाहिए। इसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस शामिल हों।

सवाल-2 : चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की प्रक्रिया क्या है?

जवाब : सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने चुनाव आयुक्त से जुड़ी नियुक्ति के मामले की सुनवाई शुरू की। 19 नवंबर 2022 को अरुण गोयल चुनाव आयुक्त बनते हैं। दरअसल गोयल 18 नवंबर को वॉलंटरी रिटायरमेंट लेते हैं और अगले ही दिन चुनाव आयुक्त बना दिए जाते हैं। यानी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई शुरू करने के दूसरे ही दिन यानी 19 नवंबर को।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जब इस मामले की सुनवाई चल रही हो ऐसे में नियुक्ति नहीं होनी चाहिए थी। खासकर तब जब पद 15 मई से खाली है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इसीलिए गोयल की नियुक्ति से जुड़े डॉक्युमेंट की जांच करना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी से कहा कि हम जानना चाहते हैं कि नियुक्ति के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई।

23 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस की हाईलाइट्स पढ़िए…

अटॉर्नी जनरल : चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैबिनेट करती है। 1991 में बने कानून के तहत यह नियुक्ति होती है।

जस्टिस जोसेफ : यह कानून सेवा शर्तों से जुड़ा है। इसमें नियुक्ति का जिक्र नहीं है।

अटॉर्नी जनरल : यदि संसद का जिक्र नहीं है तो इस पर बहस की जरूरत नहीं है।

जस्टिस जोसेफ : कोई भी सरकार ‘यस मैन’ को नियुक्त करती है और ऐसे व्यक्ति की सोच भी सरकार जैसी होती है। यह चुनाव आयोग है। यहां स्वतंत्रता होनी चाहिए। क्या कभी किसी प्रधानमंत्री पर आरोप लगे तो क्या आयोग ने उनके खिलाफ ऐक्शन लिया है? हमें एक CEC की आवश्यकता है जो PM के खिलाफ भी एक्शन ले सके।

अटॉर्नी जनरल : 1991 के बाद कोई ट्रिगर प्वाइंट नहीं मिला कि नियुक्ति प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। इसके बिना सुनवाई नहीं कि जाए।

सुप्रीम कोर्ट : आप 2017 का केस देख सकते हैं। एक चुनाव आयुक्त ने इस्तीफा दे दिया था। हालांकि कोर्ट ने इस दौरान किसी का नाम नहीं लिया।

अटॉर्नी जनरल : नियुक्ति के समय केंद्र और राज्य के सभी अधिकारियों को ध्यान में रखा जाता है। परंपरा का कड़ाई से पालन होता है।

जस्टिस जोसेफ : नौकरशाह का ही ध्यान रखा जाता है, अन्य का नहीं। यदि कदम नहीं उठाया तो क्या सिस्टम बिखर नहीं जाएगा?

अटॉर्नी जनरल : यदि न्यायपालिका ने इसमें दखल दिया तो लोकतंत्र के लिए खतरा होगा।

जस्टिस जोसेफ : सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एक बार CBI निदेशक की नियुक्ति में शामिल हुए थे। क्या लोकतंत्र इससे खतरे में पड़ गया था?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता : यहां सवाल यह है कि व्यवस्था में बदलाव की जिम्मेदारी किसकी है?

जस्टिस रस्तोगी : हम अपनी संतुष्टि के लिए कह रहे हैं कि दो दिन पहले जो नियुक्ति की है उसकी प्रक्रिया बताएं।

अटॉर्नी जनरल : यह चुनने का सिस्टम नहीं, बल्कि परंपरागत प्रक्रिया है।

सॉलिसिटर जनरल : यदि न्यायपालिका दखल देती है तो यह संविधान को फिर से लिखने जैसा होगा।

जस्टिस जोसेफ : यह बेहद गंभीर मसला है। हमें इस पर विचार करते हुए सतर्क रहना होगा।

आइए अब 24 नवंबर को हुई बहस की हाइलाइट्स पढ़ते हैं…

जस्टिस जोसेफ : हम आपके इस ढांचे और प्रक्रिया को लेकर चिंतित हैं। किसी के नाम के चयन का आधार क्या होता है?

जस्टिस रस्तोगी : आप हमें बताएं कि यह लिस्ट कैसे बनाई? कोई दिसंबर में रिटायर होने वाला था। जिन 4 नामों की सिफारिश की गई थी, उसमें से चयनित व्यक्ति उनमें सबसे कम उम्र का है। आपने यह चयन कैसे किया? हमें यह जानना है।

अटॉर्नी जनरल : यह इत्तेफाक है कि वे पंजाब कैडर के अधिकारी हैं।

जस्टिस अनिरुद्ध बोस : देखा जाए तो अमूमन ऐसा इत्तेफाक देखने को नहीं मिलता है।

अटॉर्नी जनरल : यह सामान्य है। वह रिटायर होने ही वाले थे।

जस्टिस रस्तोगी : आपका चयन करने का आधार क्या है?

अटॉर्नी जनरल : यह एक प्रक्रिया है, कन्वेंशन है और एक मेथड है।

जस्टिस रस्तोगी : यही तो जानना है, वह है क्या? आप कैसे डाटाबेस तैयार करते हैं?

अटॉर्नी जनरल : यह पब्लिक डोमेन में है। इस डेटाबेस को कोई भी देख सकता है। इसे DOPT ने तैयार किया है।

जस्टिस जोसेफ : लिस्ट में से 4 नाम फिर किस आधार पर छांटे?

अटॉर्नी जनरल : कुछ आधार हैं, जिन पर गौर किया जाता है। कार्यकाल कितना रहेगा, देखते हैं।

जस्टिस जोसेफ : आपने सारा काम सिर्फ एक दिन में किया है।

अटॉर्नी जनरल : हमने प्रक्रियाओं का पालन किया है। यदि हम हर नियुक्ति पर संदेह करने लगेंगे, तो चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा पर असर पड़ेगा।

जस्टिस जोसेफ : सिर्फ एक दिन में।

अटॉर्नी जनरल : किसी भी व्यक्ति को चुनाव आयुक्त बनाए जाने पर उसे उसकी पूर्व की सेवा से रिटायर माना जाता है।

जस्टिस जोसेफ : तो यह सब पेंशन पाने के मकसद से किया जाता है?

अटॉर्नी जनरल : नहीं, ऐसा नहीं है, VRS को गलत रूप में दिखाया जाता है।

जस्टिस रॉय : हमने बुधवार को आपसे फाइल मांगी और गुरुवार को आपने दे दी। अब आप इसे सही ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। आप एक ही श्रेणी के 40 नामों में से 4 पर कैसे आ सकते हैं? हम उस प्रक्रिया को टेस्ट कर रहे हैं कि आखिर 36 नाम बाहर कैसे हो गए?

याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण : अदालत अपना फैसला देते वक्त हाल में हुए चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को भी इसके दायरे में रखे। क्योंकि इस संदर्भ में कोर्ट में एक अर्जी दायर की गई है।

अटॉर्नी जनरल : चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के पास कोई ट्रिगर प्वाइंट नहीं है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

इसके बाद लंबी चली बहस के बाद 5 जजों की संवैधानिक पीठ मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया।

सवाल-3 : नए चुनाव आयुक्त को नियुक्त करने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?

जवाब : केंद्र सरकार ने गुरुवार को चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति संबंधी ओरिजिनल फाइल सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपती है। फाइल देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि 24 घंटे के अंदर की एप्लिकेशन आती है। क्लियरेंस भी मिल जाता है। प्रधानमंत्री भी नाम को मंजूरी दे देते हैं। ऐसी अर्जेंसी क्या थी कि बिजली सी तेजी दिखाई गई? कुछ कामों के लिए बिजली की रफ्तार से काम करना पड़ता है। लेकिन यहां तो वैकेंसी 15 मई से लंबित थी।

सवाल-4 : चुनाव आयोग में कितने चुनाव आयुक्त हो सकते हैं?

जवाब : चुनाव आयुक्त कितने हो सकते हैं, इसे लेकर संविधान में कोई संख्या फिक्स नहीं की गई है। संविधान का अनुच्छेद 324 (2) कहता है कि चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं। यह राष्ट्रपति पर निर्भर करता है कि इसकी संख्या कितनी होगी। आजादी के बाद देश में चुनाव आयोग में सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त होते थे।

16 अक्टूबर 1989 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की। इससे चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय बन गया। ये नियुक्तियां 9वें आम चुनाव से पहली की गईं थी। उस वक्त कहा गया कि यह मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री के पर कतरने के ली की गईं थी।

2 जनवरी 1990 को वीपी सिंह सरकार ने नियमों में संशोधन किया और चुनाव आयोग को फिर से एक सदस्यीय निकाय बना दिया। 1 अक्टूबर 1993 को पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने फिर अध्यादेश के जरिए दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को मंजूरी दी। तब से चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो चुनाव आयुक्त होते हैं।

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