भास्कर एक्सप्लेनर:तालिबान से भारत के साथ-साथ चीन, रूस, पाकिस्तान और ईरान को भी खतरा है, इसी वजह से यह देश चाहते हैं उससे डील, जानिए उनकी स्ट्रैटजी

9 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी

अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी ने पड़ोसी देशों को हिला दिया है। चीन, पाकिस्तान, रूस और ईरान भले ही तालिबान शासन को मान्यता देने की तैयारी में दिख रहे हो, पर समस्या उनकी भी कम नहीं होने वाली। बल्कि ये आगे और बढ़ेगी ही। सच तो ये है कि अफगानिस्तान में कट्टरपंथी इस्लामिक सरकार का डर ही उन्हें तालिबान के करीब ला रहा है।

अमेरिकी फौजों की वापसी शुरू होते ही तालिबान पूरी ताकत के साथ आगे बढ़ा। अफगान मिलिट्री से कम लड़ाके होने के बाद भी इस संगठन ने प्रमुख शहरों और प्रांतीय राजधानियों पर कब्जा किया और 15 अगस्त को काबुल पर कब्जे के साथ अपना अभियान खत्म भी कर दिया। यहां तक कि अफगानिस्तान के प्रेसिडेंशियल पैलेस पर भी इसने कब्जा कर लिया।

अब अफगानिस्तान के हालात को देखते हुए भारत समेत पड़ोसी देशों के सामने क्या चुनौतियां हैं? उनका क्या रुख है? उन्हें क्या डर सता रहा है? इन सभी सवालों के जवाब आपको यहां मिलेंगे-

सबसे पहले बात भारत की...

मौजूदा हालातः अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं की जीत के साथ ही भारत वहां सक्रिय हो गया था। पिछले 20 साल में भारत ने 500 छोटी-बड़ी योजनाओं पर पैसा खर्च किया है। स्कूल, अस्पताल, बच्चों के हॉस्टल, पुल और संसद भवन तक बनवाए।

डरः तालिबान से भारत को दोहरा नुकसान है। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे भारत विरोधी टेरर ग्रुप्स की एक्टिविटी का केंद्र अफगानिस्तान रहा है। तालिबान के शासन में हुए कंधार हाईजैक का जिक्र तो हर बार होता ही है। दूसरा नुकसान अफगानिस्तान में चीन और पाकिस्तान जैसे भारत-विरोधी देशों की सक्रियता है। ये दोनों ही देश अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव कम करने और अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में जुट गए हैं। इसकी कोशिशें तेज हो गई हैं। चीन की ओर से अफगानिस्तान में तालिबान शासन को मान्यता देना इस दिशा में पहला बड़ा कदम है।

स्ट्रैटजीः भारत ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। भारत इस समय UN सिक्योरिटी काउंसिल की दो बैठकों की अध्यक्षता कर चुका है। अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास को खाली करा लिया है। राजनयिकों को देश से छोड़ने को कहा जा चुका है।

भारत ने तालिबान से संपर्क साधने की कोशिश की थी। एक स्तर की बातचीत भी हुई थी। डील क्या हुई, यह साफ नहीं हो पाया है। 1996-2001 के बीच तालिबान का जब अफगानिस्तान में शासन था तब भारत ने उसे मान्यता नहीं दी थी. और तो और, तालिबान विरोधी सरकार का ऑल वेदर फ्रेंड बनकर सामने आया था। अमेरिका के साथ कदमताल की और अब ऐसी स्थिति में है, जहां वेट एंड वॉच ही एक रास्ता बचा है।

पाकिस्तान को फायदा कम, नुकसान ज्यादा

मौजूदा हालातः तालिबान का पूरी दुनिया में कोई करीबी दोस्त है तो वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI है। 1996-2001 के तालिबान शासन को संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब के अलावा पाकिस्तान ने ही मान्यता दी थी। फरवरी 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते के बाद फौजों की वापसी का कार्यक्रम तय हुआ। तब तालिबान नेताओं ने ISI की मदद से खुद को रीग्रुप किया।

डरः इस्लामाबाद में दो तरह की बातें हो रही हैं। अफगानिस्तान में भारत के घटते प्रभाव को देखकर पाक नेता राहत की सांस ले रहे हैं, पर तालिबान शासन से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के ताकतवर होने का डर भी है। यह पाकिस्तान के वजीरिस्तान और आसपास के इलाकों में कट्टरपंथी गतिविधियों के साथ बड़ी चुनौती बनेगा।

TTP ने इस साल के शुरुआती दो महीनों में 38 हमले किए हैं। TTP के निशाने पर सिर्फ पाकिस्तानी सेना ही नहीं रही, बल्कि चीन के प्रोजेक्ट भी रहे हैं। पाकिस्तान तो अक्सर भारत को इन हमलों के लिए दोषी ठहराता रहा है।

2020 में अमेरिका के साथ डील के बाद तालिबान नेताओं से TTP नेताओं के मिलने के वीडियो सामने आए थे। TTP ने अफगान तालिबान के मौजूदा मिशन में लॉजिस्टिक से लेकर अन्य मदद की है। ऐसी नजदीकी पाक सरकार की परेशानी बनी रहेगी।

स्ट्रैटजीः पाकिस्तान तालिबान के साथ खड़ा होकर कई निशाने साध रहा है। अपने ऑल वेदर फ्रेंड चीन के साथ तालिबान की दोस्ती मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। चीन और पाकिस्तान अगर तालिबान से दोस्ती बढ़ाते हैं तो यह भारत के हितों को नुकसान पहुंचाएगा। दोनों का एक टारगेट यह भी रहेगा।

पाकिस्तान की पूरी कोशिश है कि TTP अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल न करे। वह तालिबान को मदद तो करेगा, पर TTP को खत्म करने की शर्त पर। यह डील तालिबान शासन को इंटरनेशनल लेवल पर मान्यता देने के बदले भी हो सकती है।

चीनः उइगर टेरर ग्रुप्स और बिजनेस बढ़ाने पर फोकस

मौजूदा हालातः अमेरिका, UK और भारत जैसे देश अफगानिस्तान से राजनयिकों और नागरिकों को निकालने के लिए दौड़ रहे हैं, पर चीन ने काबुल में दूतावास खुला रखा है। साथ ही चीनी नागरिकों को घरों के अंदर रहने की सलाह दी गई है।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने तालिबान शासन के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई थी। यानी, इस बार उसने सबसे पहले तालिबान को कूटनीतिक मान्यता दे दी है। चीन को उम्मीद है कि ट्रांसफर ऑफ पॉवर शांति के साथ होगी। अपराध और आतंकवाद पर भी काबू पा लिया जाएगा। पिछले महीने के आखिर में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने मुल्ला बरादर समेत तालिबान के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात भी की थी।

डरः चीन को दो डर हैं। शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिम टेरर ग्रुप्स का बढ़ता प्रभाव और पाकिस्तान में चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की सुरक्षा। इसके लिए वह तालिबान की ओर उम्मीद से देख रहा है। चीन का एक और टारगेट है- इस इलाके में भारत के प्रभाव को कमजोर कर खुद के प्रभाव को बढ़ाना। इससे पहले भी चीन भारत के ईरान में चाबहार प्रोजेक्ट को लेकर अड़ंगे डाल चुका है।

बीजिंग पर शिनजियांग के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में 'री-एजुकेशन कैम्प' में 10 लाख से अधिक उइगर मुस्लिमों को हिरासत में लेने, बंधुआ मजदूरी कराने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप हैं। चीन कई बार इन आरोपों का खंडन कर चुका है, पर तालिबान से पींगे बढ़ाने का एक बड़ा कारण उइगर मुस्लिमों के टेरर ग्रुप्स पर कंट्रोल करना भी है, जो अफगानिस्तान में बेस बनाकर चीन को परेशान करते रहे हैं।

स्ट्रैटजीः चीन ने सबसे पहले तालिबान शासन को मान्यता दी। अपना दूतावास भी बंद नहीं किया है। यह बताता है कि चीन को तालिबान शासन से बहुत उम्मीदें हैं। अमेरिका और भारत के प्रभाव को कम करने के साथ ही उसकी स्ट्रैटजी अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल चीन-विरोधी गतिविधियों को रोकना है।

चीन का रुख साफ है। वह तालिबान के साथ खड़ा रहेगा। कोशिश करेगा कि ट्रांसफर ऑफ पॉवर शांति के साथ हो जाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा देशों का समर्थन इस शासन को मिल सके।

रूस को चाहिए इस्लामिक स्टेट का जवाब

मौजूदा स्थितिः एनालिस्ट कहते हैं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने ही रूस को काबू करने के लिए अफगानिस्तान में मुस्लिम आतंकवाद को बढ़ावा दिया था। ऐसे में अमेरिका का घटता प्रभाव रूस के लिए विन-विन सिचुएशन बना रहा है। वह तालिबान शासन के साथ दोस्ती चाहता है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने मंगलवार को कहा कि रूस को अफगानिस्तान में तालिबान को मान्यता देने की जल्दी नहीं है। वह एक इन्क्लूसिव सरकार चाहता है।

डरः चीन को उइगर मुस्लिम टेरर ग्रुप्स की चिंता है तो रूस की सबसे बड़ी चिंता इस्लामिक स्टेट है। यह कहीं न कहीं तालिबान का भी दुश्मन है। सेंट्रल एशियाई स्टेट्स में आतंकी और चरमपंथी गतिविधियों को काबू करने के लिए बेहद जरूरी है कि तालिबान का रूस को साथ मिलता रहे। रूस का प्राइमरी फोकस अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा पर सेंट्रल एशियाई स्टेट्स में ऑर्गेनाइज्ड टेरर ग्रुप्स के आंदोलन को कमजोर करना है।

स्ट्रैटजीः चीन की तरह रूस ने भी काबुल में अपना दूतावास खुला रखा है। हालांकि बताया जा रहा है कि वह जल्द ही अपने कुछ कर्मचारियों को वहां से निकाल लेगा। इसकी प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। रूस की स्ट्रैटजी चीन जैसी ही है, जहां वह अमेरिका का प्रभाव कम कर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। इसके लिए वह चीन के साथ मिलकर काम करने को भी तैयार है। यह बात उसके बयानों से भी सामने आती रही है।

रूस को अपने इलाके में शांति चाहिए और यह तभी हो सकता है जब पड़ोस में विरोधी ग्रुप्स को सपोर्ट न मिले। इसकी ही कोशिश रूस कर रहा है। इसके साथ ही रूस की कोशिश यह भी है कि इस्लामिक स्टेट और तालिबान की दुश्मनी का फायदा उठाया जाए ताकि मुस्लिम चरमपंथी ग्रुप्स के खिलाफ उसकी लड़ाई में मजबूती आ सके।

ईरान की सबसे बड़ी चिंता है शरणार्थियों की घुसपैठ

मौजूदा स्थितिः अफगानिस्तान में बदलते हालात को लेकर ईरान की नीति कोई बहुत अलग नहीं है। वह रूस, पाकिस्तान और चीन के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। वह तो इसी बात से खुश है कि अमेरिका का इलाके पर प्रभाव कम हो जाएगा। ईरान और अमेरिका की आपस की लड़ाई को देखते हुए तालिबान शासन के साथ खड़ा होना उसकी मजबूरी भी है।

डरः तालिबान शासन का मतलब है कि ईरान में शरणार्थियों और नशीली दवाओं की बाढ़। अफगानिस्तान में सुन्नी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और तालिबान के पिछले शासन में उन्होंने शिया मुस्लिमों के लिए परेशानी कम नहीं की, बल्कि बढ़ाई ही है। अफगानिस्तान में 9% आबादी हजारा कम्युनिटी से आती है, जो शिया मुस्लिम हैं। तालिबान के शासन में आते ही शिया आबादी में डर बैठ गया है और बड़ी आबादी शिया बहुल ईरान की शरण लेने की कोशिश करेगी। यही कारण है कि ईरान ने अफगानिस्तान की सीमा पर सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है।

स्ट्रैटजीः इंटरनेशनल लेवल पर ईरान तालिबान के साथ खड़ा दिख रहा है। लग रहा है कि इस बार वह तालिबान को मान्यता देने में देर नहीं करेगा। इसके बदले में वह शिया मुस्लिमों के लिए डील कर सकता है। शरणार्थियों का संकट कम करने के लिए यह एक अच्छी स्ट्रैटजी होगी। साथ ही वह सीमा पार से नशीली दवाओं की स्मगलिंग रोकने के लिए भी तालिबान शासन से डील कर सकता है।

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