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भास्कर डेटा स्टोरी:कोहरे से हर साल 10 हजार मौतें, मरने वालों में सबसे ज्यादा यूपी-बिहार के; जानें विजिबिलिटी कम होने का असर

3 दिन पहले

दिल्ली के पालम में सोमवार को जीरो-मीटर विजिबिलिटी दर्ज की गई। यानी कोहरा इतना घना था कि पास खड़े व्यक्ति का चेहरा भी ठीक से नहीं दिख पाए। वहीं, सफदरजंग में 200 मीटर की विजिबिलिटी दर्ज हुई। मतलब, 200 मीटर तक ही साफ दिखाई दे रहा था। जबकि, 10 किमी की विजिबिलिटी को अच्छा माना जाता है। आमतौर पर प्रदूषण और सर्दियों के मौसम में कम विजिबिलिटी होती है।

लेकिन ये कम विजिबिलिटी होती क्या है? इसे कैसे मापा जाता है? ये कितनी खतरनाक होती है? आइए समझते हैं...

सबसे पहले बात ये विजिबिलिटी होती क्या है?
विजिबिलिटी को आसान शब्दों में कहें तो ये बस उतना ही है कि आप कितनी दूर तक देख पा रहे हैं। लेकिन इसकी वैज्ञानिक भाषा भी है, जो मौसम विभाग ने तय कर रखी है। मौसम विभाग के मुताबिक विजिबिलिटी का मतलब है कि दिन के समय कोई व्यक्ति खुली आंखों से कितनी दूर तक डार्क ऑब्जेक्ट को देख पा रहा है। इसी तरह, रात के समय कोई व्यक्ति खुली आंखों से कितनी दूर तक कितने लाइट ऑब्जेक्ट को देख पा रहा है।

विजिबिलिटी मापने का तरीका भी है गजब ​​​​​​
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि विजिबिलिटी कितनी है, इसको मापने के लिए एक खास तरह का इंस्ट्रूमेंट होता है। मौसम विभाग दृष्टि नाम की डिवाइस का इस्तेमाल करता है। इसे एयरपोर्ट पर लगाया जाता है। इसके जरिए होरिजेंटल विजिबिलिटी मापी जाती है, यानी सामने की तरफ। इससे पता लगाया जाता है कि सामने की तरफ कितनी दूर तक देख पा रहे हैं।

अब ये विजिबिलिटी डायरेक्शन के हिसाब से भी अलग-अलग हो सकती है। यानी, हो सकता है कि आप पूर्व की तरफ तो लंबी दूरी तक देख पा रहे हों, लेकिन पश्चिम की तरफ विजिबिलिटी ज्यादा दूर तक न हो।

अब बात कितनी खतरनाक है कम विजिबिलिटी?
उत्तर प्रदेश के संभल में घने कोहरे की वजह से दिसंबर में एक रोडवेज बस और गैस टैंकर में टक्कर हो गई। इस टक्कर में 12 लोगों की मौत हो गई। वहीं, 1 जनवरी को पश्चिमी यूपी के बागपत में ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे पर 20 से ज्यादा गाड़ियां टकरा गईं। राहत की बात थी इसमें किसी की जान नहीं गई।

ये उन हादसों के उदाहरण हैं, जो घने कोहरे या कम विजिबिलिटी की वजह से हुए। हमारे देश में हर साल ऐसे हजारों हादसे होते हैं, जिनमें हजारों लोग मारे जाते हैं। डराने वाली बात तो ये है कि ये आंकड़ा हर साल बढ़ता ही जा रहा है।

सड़क परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, 2019 में कम विजिबिलिटी की वजह से देश में 33 हजार 602 सड़क हादसे हुए थे, जिसमें 13 हजार 405 मौतें हुई थीं। जबकि 2018 में 28 हजार 26 हादसों में 11 हजार 841 जानें गई थीं। मतलब, एक साल में सड़क हादसों में 20% और मौतों में 14% की बढ़ोतरी दर्ज हुई।

सबसे ज्यादा मौतें यूपी में, बिहार दूसरे नंबर पर
उत्तर भारत में हर साल दिसंबर और जनवरी के महीने में घने कोहरे की समस्या रहती है। यही वजह है कि हर साल कोहरे की वजह से होने वाले सड़क हादसे और मौतें भी इन्हीं इलाकों में दर्ज होती हैं।

2019 में सबसे ज्यादा 8 हजार 31 सड़क हादसे उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए थे, जिनमें 4 हजार 177 लोगों की जान गई थी। दूसरे नंबर पर बिहार था। जहां 2 हजार 781 हादसों में 1 हजार 884 लोगों की मौत हुई थी।

हर साल कई ट्रेन डिले होती हैं
हमारे देश में ट्रेन का डिले होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन डिले होने की एक वजह कोहरा भी है। 20 नवंबर 2019 को लोकसभा में कोहरे के कारण ट्रेनों में होने वाली देरी को लेकर एक सवाल किया गया था। इसका जवाब दिया था रेल मंत्री पीयूष गोयल ने।

इस जवाब में रेल मंत्री ने माना था कि हर साल देश के उत्तरी इलाकों में सर्दी के महीनों में कोहरे के मौसम के दौरान बड़ी संख्या में गाड़ियां प्रभावित होती हैं। हालांकि, अब कोहरे की वजह से ट्रेन के डिले होने में काफी कमी आई है।

2018-19 में 5% से ज्यादा ट्रेनें कोहरे की वजह से डिले हुई थीं। जबकि इससे पहले 2017-18 में 15% से ज्यादा ट्रेनें डिले हुई थीं। कमी आने का भी एक कारण है। दरअसल, अब कोहरे का असर ट्रेनों पर न पड़े, इसके लिए लोको पायलटों को फॉग पास डिवाइस दी गई है।

ये डिवाइस GPS पर आधारित एक हैंड हैल्ड पोर्टेबल डिवाइस है। कोहरे की स्थिति में जब कोई लैंडमार्क आता है, तो ये डिवाइस अलार्म के जरिए क्रू की मदद करता है। नवंबर 2019 तक ट्रेनों पर 12 हजार 205 फॉग पास डिवाइस मुहैया कराए जा चुके हैं।

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