15 देशों की महारानी थीं एलिजाबेथ-II:सीक्रेट मीटिंग में हर बुधवार मिलते थे ब्रिटेन के PM; सरकार को हटाने का भी अधिकार

3 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी

सबसे लंबे वक्त तक शासन करने वाली ब्रिटिश महारानी क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय नहीं रहीं। वो सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं, 14 अन्य आजाद देशों की भी महारानी थीं। ये सभी देश कभी न कभी ब्रिटिश हुकूमत के अधीन रहे थे।

भास्कर एक्सप्लेनर में हम जानेंगे कि क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय सिर्फ दिखावे की महारानी क्यों थीं? ब्रिटेन और बाहर के देशों में उनके पास क्या-क्या शक्तियां थीं?

सवाल : एलिजाबेथ द्वितीय महारानी थीं, लेकिन प्रतीकात्मक; ऐसा क्यों?

जवाब : ब्रिटिश रानी एलिजाबेथ द्वितीय एक संवैधानिक रानी थीं। वे यूनाइटेड किंगडम की हेड ऑफ स्टेट यानी राज्य प्रमुख थीं। अब उनकी जगह लेने वाले चार्ल्स भी इसी तरह प्रतीकात्मक राजा होंगे। ठीक भारत के राष्ट्रपति की तरह, लेकिन दोनों के बीच एक बड़ा अंतर है। भारत के राष्ट्रपति को देश के लोगों के चुने प्रतिनिधि यानी सांसद और विधायक चुनते हैं।

वहीं, राजशाही होने की वजह से ब्रिटेन के राजा या रानी शाही वंश से ही बनते हैं। आमतौर पर राजा या रानी की सबसे बड़ी संतान ही उनके बाद शाही गद्दी पर बैठती है। यही वजह है कि लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भारत एक गणतंत्र है और ब्रिटेन एक राजशाही।

भारत के राज्य प्रमुख यानी राष्ट्रपति और ब्रिटेन के राजा या रानी में एक बड़ी समानता है। दोनों के पद और रुतबा प्रतीकात्मक हैं, जो परंपरा और रीति-रिवाज पर आधारित हैं। ब्रिटेन के राजा हो या भारत के राष्ट्रपति, दोनों ही कुछ अपवादों को छोड़कर सभी फैसले या काम प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट की सलाह पर ही करते हैं। ज्यादातर मामलों में यह सलाह बाध्यकारी होती है। यानी राजा-रानी या राष्ट्रपति को उन्हें इसके मुताबिक ही फैसले करने होते हैं।

ब्रिटेन के नए राजा को अब किंग चार्ल्स तृतीय के नाम से जाना जाएगा। नए राजा के रूप में उन्हें क्या कहा जाएगा, यही नए राजा चार्ल्स तृतीय का पहला फैसला है। परंपरा के मुताबिक वे अपने लिए चार में से किसी एक नाम को चुन सकते थे- चार्ल्स, फिलिप, आर्थर, जॉर्ज।

सवाल : ब्रिटेन की महारानी के पास क्या-क्या काम थे, अब ये काम कौन करेगा?

जवाब : यूनाइटेड किंगडम की हेड ऑफ स्टेट यानी राज्य प्रमुख होने के नाते सरकार रोज एक लाल चमड़े के बक्से में रानी या राजा के पास जरूरी दस्तावेज भेजती है। इन दस्तावेजों में सभी प्रमुख राजनीतिक हालात, जरूरी बैठकों के वो सभी कागजात होते हैं, जिनमें उनके हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।

प्रधानमंत्री आमतौर पर बुधवार को बकिंघम पैलेस में रानी से मिलते थे, ताकि उन्हें सरकारी मामलों के बारे में औपचारिक रूप से जानकारी दी जा सके। यह बैठक पूरी तरह गोपनीय होती है और इस दौरान क्या कहा गया, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं होता। उनके पास ये 5 प्रमुख काम थे…

  1. सरकार की नियुक्तिः आम चुनाव जीतने वाली पार्टी के नेता को आमतौर पर बकिंघम पैलेस बुलाया जाता है, जहां उन्हें सरकार बनाने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया जाता है। ठीक ऐसे ही आम चुनाव से पहले रानी औपचारिक रूप से सरकार को भंग कर देती हैं।
  2. संसद में भाषणः रानी संसदीय वर्ष की शुरुआत राज्य उद्घाटन समारोह के साथ करती हैं। इस दौरान हाउस ऑफ लॉर्ड्स में सिंहासन से रानी भाषण देती हैं। इसमें वह सरकार की नीति और योजनाओं के बारे में बताती हैं। यह भारत में राष्ट्रपति के अभिभाषण की तरह होता है। 2022 में क्वीन एलिजाबेथ की तरफ से प्रिंस चार्ल्स ने संसद में भाषण दिया था।
  3. शाही स्वीकृतिः संसद में पारित किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिए उस पर रानी का औपचारिक अनुमोदन यानी हस्ताक्षर जरूरी है। भारत में भी किसी विधेयक को संसद से पारित होने के बाद कानून बनने के लिए उस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर जरूरी हैं। आखिरी बार 1708 में एक कानून को राजा ने सहमति देने से इनकार कर दिया था।
  4. मेहमानों की मेजबानीः रानी दूसरे देशों के मेहमान राष्ट्राध्यक्षों की मेजबानी करती हैं। रानी ही यूनाइटेड किंगडम में तैनात विदेशी सरकारों के राजदूतों और उच्चायुक्तों से मिलती हैं।
  5. संवैधानिक प्रमुखः रानी 600 से ज्यादा चैरिटी, मिलिट्री एसोसिएशंस, प्रोफेशनल संस्थानों और पब्लिक सर्विस ऑर्गेनाइजेशंस की भी प्रमुख थीं। रानी कॉमनवेल्थ में शामिल 14 देशों की राज्य प्रमुख थीं। इनमें ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश भी शामिल हैं।

रानी एलिजाबेथ पिछले 70 सालों से ये सभी काम करती आ रही थीं। अब इन सभी कामों का जिम्मा नए राजा चार्ल्स के पास होगा।

सवाल : ब्रिटेन के बाहर किन देशों की महारानी थीं एलिजाबेथ?

जवाब : महारानी एलिजाबेथ ब्रिटेन के अलावा 14 कॉमनवेल्थ देशों की भी महारानी थीं। अब किंग चार्ल्स इन देशों के राजा होंगे।

कॉमनवेल्थ में होने के बावजूद 2021 में बारबाडोस ने भी भारत की तरह खुद को गणतंत्र घोषित कर दिया। इसके बाद से एंटीगुआ और बरमूडा, बहामास, जमैका और सेंट किट्स-नेविस भी गणतंत्र बनने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं।

इन देशों में महारानी या राजा की शक्तियां काफी हद तक प्रतीकात्मक होती हैं। ज्यादातर देशों में राजनीतिक फैसले एक चुनी हुई संसद द्वारा लिए जाते हैं और प्रधानमंत्री इन्हें लागू करता है। यानी महारानी देश की मुखिया तो होती हैं, लेकिन सरकार की मुखिया नहीं।

रानी के पास कुछ संवैधानिक कर्तव्य हैं, जिनमें सबसे जरूरी नई सरकारों का अप्रूवल है। अलग-अलग देशों में ये कर्तव्य बदलते रहते हैं। जैसे- कानून की औपचारिक मंजूरी देना, कुछ अधिकारियों की नियुक्ति करना और राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करना।

सवाल : क्या ब्रिटिश क्राउन अपनी अधीन आने वाली 14 सरकारों के सभी फैसले मानने को बाध्य है?

जवाब : संवैधानिक राजशाही होने की वजह से ब्रिटेन की रानी या राजा को अपने अधीन आने वाली चुनी हुई सरकारों के सभी फैसले मानने होते हैं, लेकिन कुछ बेहद असाधारण हालात में क्राउन के पास सरकार को ओवरराइड करने का भी अधिकार होता है।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक ही बार ऐसा हुआ है। साल 1975 में ऑस्ट्रेलिया में एक संवैधानिक संकट पैदा हुआ था, जिसमें महारानी के नियुक्त किए गवर्नर जनरल ने उस वक्त के प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दिया था।

हर साल करीब 800 करोड़ रुपए खर्च

ब्रिटिश राजशाही भले ही प्रतीकात्मक है, लेकिन शाही परिवार का खर्च भारी भरकम है। साल 2020-21 में ब्रिटेन के सरकारी खजाने से रानी, यानी शाही परिवार को 86.3 मिलियन पाउंड यानी करीब 790 करोड़ रुपए दिए गए। इसमें उनकी सुरक्षा का खर्च शामिल नहीं है। हालांकि, ये पैसा शाही परिवार के प्रॉपर्टी बिजनेस से ही आता है। ये सरकारी संपत्ति ही है, जो शाही परिवार के नाम है। यानी वो इसे बेच नहीं सकते।

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