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  • The Supreme Leader Will Be The Most Powerful In The Talibani Government, The Share Of Women Will Be Negligible, Know How The New Taliban Government Will Be?

भास्कर एक्सप्लेनर:तालिबानी सरकार में सुप्रीम लीडर होगा सबसे पावरफुल, महिलाओं की हिस्सेदारी न के बराबर होगी, जानें कैसी होगी अफगानिस्तान की नई सरकार?

एक महीने पहलेलेखक: आबिद खान

तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा तो कर लिया है, लेकिन अब बड़ा सवाल सरकार बनाने का है। दुनियाभर के देश कह चुके हैं कि तालिबानी सरकार को तभी मान्यता दी जाएगी जब वो समावेशी सरकार बनाएगा। ऐसे में तालिबान के लिए सरकार बनाना बड़ी चुनौती है। तालिबान 4 सितंबर को अपनी नई सरकार का ऐलान करने वाला था, लेकिन पंजशीर में हो रही लड़ाई की वजह से फैसला टाल दिया गया।

दुनियाभर की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि तालिबान किस तरह से अपनी सरकार बनाता है। हालांकि, अभी तक इस बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि तालिबान में शासन व्यवस्था ईरान की तरह हो सकती है।

समझते हैं, नई तालिबान सरकार कैसी हो सकती है? ईरान में किस तरह की सरकार है? न्यायपालिका किस तरह की हो सकती है? और क्या सरकार में महिलाओं को मिलेगी कोई जिम्मेदारी?

कैसा हो सकता है तालिबान की नई सरकार का स्ट्रक्चर?

  • माना जा रहा है कि तालिबान की सरकार में 25 मंत्रालय हो सकते हैं। इन मंत्रालयों को गाइड करने के लिए एक सलाहकार परिषद हो सकती है, जिसे शूरा कहा जाता है। शूरा में मुस्लिम विद्वानों को जगह दी जाएगी, जो देश को शरिया कानून के मुताबिक चलाने में मदद करेंगे।
  • CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान की नई सरकार इस्लामिक रिपब्लिक होगी। ईरान में भी इसी तरह की सरकार है। सरकार में एक सुप्रीम लीडर होगा और सरकार के मुखिया के तौर पर प्रधानमंत्री होगा, जिसके अंडर कैबिनेट होगी।
  • सुप्रीम लीडर सुप्रीम काउंसिल का मुखिया होगा, जिसके अंदर 11 से लेकर 72 सदस्य तक हो सकते हैं।
  • तालिबान अपनी सरकार को ज्यादा समावेशी बनाने के लिए अलग-अलग गुटों से संपर्क में है। तालिबान ने इसके लिए को-ऑर्डिनेशन काउंसिल भी बनाई है, जिसका काम अलग-अलग धड़ों के बीच समन्वय बनाना है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि तालिबान अपनी नई सरकार को ईरान की सरकार की तरह बना सकता है। ईरान में इस्लामिक रिपब्लिक सरकार है। समझते हैं, ईरान की सरकार किस तरह काम करती है?

सुप्रीम लीडर

सरकार की सबसे ताकतवर और टॉप पोजिशन। सुप्रीम लीडर आर्म्ड फोर्सेस का भी कमांडर-इन-चीफ होता है। घरेलू और विदेशी नीति निर्धारण का काम भी सुप्रीम लीडर के पास ही होता है। पूरी सरकार और सरकार के सभी तत्वों पर सुप्रीम लीडर का सीधा-सीधा दखल होता है।

प्रेसीडेंट

सुप्रीम लीडर के बाद दूसरे नंबर पर प्रेसीडेंट होता है। आमतौर पर प्रेसीडेंट का चुनाव होता है। देश के सभी नीतिगत मामलों पर प्रेसीडेंट का भी मत होता है, लेकिन आखिरी फैसला सुप्रीम लीडर ही करता है। प्रेसीडेंट कार्यपालिका के हेड के तौर पर काम करता है। माना जा रहा है कि तालिबान की सरकार में प्रेसीडेंट की जगह प्राइम मिनिस्टर का पद होगा।

संसद

ईरान में 290 सदस्यों की एक संसद है, जिसे मजलिस कहा जाता है। हर 4 साल में संसद सदस्यों के लिए चुनाव होता है। बजट और कानून पर चर्चा संसद में की जाती है, लेकिन जरूरी नहीं कि संसद में पास हर अधिनियम कानून बन ही जाएगा। अधिनियम को कानून का रूप देने के लिए एक गार्जियन काउंसिल होती है।

गार्जियन काउंसिल

गार्जियन काउंसिल के पास संसद के बनाए कानूनों को पारित करने का अधिकार होता है। काउंसिल की अनुमति के बिना कोई भी कानून लागू नहीं हो सकता। काउंसिल के सदस्यों को सुप्रीम लीडर और न्यायपालिका अपॉइंट करती है। काउंसिल का काम ये चेक करना होता है कि संसद द्वारा बनाए जा रहे कानून शरिया के मुताबिक हैं या नहीं।

असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स

असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ही सुप्रीम लीडर की नियुक्ति करती है और उसके कामकाज का लेखा-जोखा रखती है। असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के पास सुप्रीम लीडर को हटाने की शक्ति होती है। असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सदस्य भी डायरेक्ट इलेक्शन से चुने जाते हैं।

किस तरह हो सकती है न्यायपालिका?

माना जा रहा है कि न्यायपालिका सीधे सुप्रीम लीडर के अंडर काम करेगी। सुप्रीम लीडर ही चीफ जस्टिस को नियुक्त करेगा और चीफ जस्टिस सीधा सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करेगा। ईरान में चीफ जस्टिस के पास गार्जियन काउंसिल के सदस्यों को भी नियुक्त करने का अधिकार होता है। ऐसी ही व्यवस्था तालिबान अपना सकता है।

इससे पहले तालिबान जब शासन में था, तब उसने अलग-अलग जगहों पर अपनी कोर्ट बना रखी थी। इन कोर्ट में दीवानी मामलों में फैसले के लिए स्थानीय इस्लामिक विद्वानों की राय ली जाती थी। तालिबान की कोर्ट विवादों की तत्काल सुनवाई और फैसलों के लिए लोगों के बीच चर्चा में थी।

दो तरह की हो सकती है कोर्ट

तालिबान की नई सरकार में दो तरह की कोर्ट हो सकती है। एक पब्लिक और दूसरी शरिया। मुस्लिमों से जुड़े मामलों की सुनवाई शरिया कोर्ट में हो सकती है और दूसरे धर्मों के लिए पब्लिक कोर्ट में न्याय के लिए जा सकते हैं।

शरिया कोर्ट न्याय के लिए पूरी तरह शरिया कानूनों का सहारा लेगी।

तालिबानी शासन में कैसा होगा सेना का रोल?

सेना पर सीधा-सीधा कंट्रोल सुप्रीम लीडर का होता है। ईरान में जिस तरह इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स हैं, उसी तरह तालिबान में भी सेना की एक विशेष कमांड हो सकती है।

तालिबानी प्रवक्ता ने रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि तालिबान एक नई नेशनल फोर्स की स्थापना करने की प्लानिंग कर रहा है। इस फोर्स में तालिबानियों के साथ-साथ अफगानिस्तानी सेना के सैनिक भी होंगे। तालिबान ने अफगानी सेना में रहे पायलट और सैनिकों से कहा है कि वे दोबारा सेना जॉइन करें।

क्या सरकार में महिलाओं की भागीदारी होगी?

तालिबान के प्रवक्ता ने BBC के एक पत्रकार से बातचीत करते हुए कहा था कि नई सरकार में महिलाओं को काम करने का अधिकार होगा, लेकिन सरकार में ‘शायद’ उनका कोई रोल नहीं हो। यानी ये स्पष्ट है कि तालिबानी सरकार में महिलाओं का प्रतिनिधित्व न के बराबर ही होगा।

1996-2001 में तालिबान के शासन के दौरान महिलाओं की हालत बेहद खराब थी। उन्हें घर से बाहर निकलने पर पाबंदी थी, बुर्का पहनना जरूरी था, पढ़ाई और काम करने की अनुमति नहीं थी। आशंका है कि तालिबान के दूसरे शासन में भी महिलाओं की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं होने वाला है।

तालिबान 1.0 में किस तरह थी तालिबानी सरकार?

तालिबान ने 1996-2001 के दौरान अफगानिस्तान पर शासन किया था। उस दौरान तालिबानी सरकार खुद को इस्लामिक एमीरेट कहती थी। हालांकि उस समय तालिबान की सरकार को चंद देशों ने ही मान्यता दी थी, लेकिन करीब 90% अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन था।

उस समय तालिबान ने बहुत सख्त शरिया कानून अफगानिस्तान पर लागू किया था। देश में सुप्रीम लीडर मुल्ला उमर का शासन था। सुप्रीम लीडर के अंडर ही शूरा काम करती थी।

जनता का क्या रोल हो सकता है?

  • जनता को वोटिंग करने का अधिकार मिल सकता है। ईरान में जनता हर 4 साल में राष्ट्रपति चुनती है। अगर तालिबान ईरान की तरह व्यवस्था अपनाता है, तो जनता को वोटिंग करने का अधिकार मिल सकता है। हालांकि, सबसे ज्यादा पावरफुल पद सुप्रीम लीडर का ही होगा इस लिहाज से जनता को वोटिंग के जरिए ज्यादा अधिकार नहीं मिलेंगे।
  • 4 सितंबर को स्थानीय न्यूज चैनल को दिए एक बयान में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने कहा है कि अफगानिस्तान में चुनाव होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि ईरान हमेशा से अफगानिस्तान में शांति चाहता है। हम अफगान लोगों द्वारा चुनी गई सरकार का समर्थन करते हैं। अफगानी लोगों को जल्द से जल्द अपनी सरकार चुनने के लिए वोटिंग अधिकार मिलना चाहिए।
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