टीपू सुल्तान से क्यों चिढ़े हैं हिंदूवादी:टीपू ने अंग्रेजों को दो बार मारकर भगाया, कभी RSS ने कहा था- सच्चा देशभक्त

एक महीने पहलेलेखक: कुमार ऋत्विज

कर्नाटक में टीपू सुल्तान के नाम पर फिर घमासान मचा है। 15 अगस्त को शिवमोगा में वीर सावरकर और टीपू सुल्तान की पोस्टर रैली निकाली जा रही थी। इस दौरान दो गुटों के बीच झड़प हुई, जिसमें जबीउल्ला नाम के शख्स ने एक पुलिसकर्मी पर चाकू से हमला कर दिया। 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और इलाके में धारा 144 लगा दी गई है।

इस घटना ने टीपू सुल्तान के नाम पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे कि अंग्रेजों से लोहा लेने वाले टीपू सुल्तान से हिंदूवादी चिढ़ते क्यों हैं?

हिंदूवादी संगठन टीपू सुल्तान की इन 5 बातों पर आलोचना करते हैं…

  • हिंदू संगठन दावा करते हैं कि टीपू धर्मनिरपेक्ष नहीं, बल्कि एक असहिष्णु और निरंकुश शासक थे। 2015 में RSS के मुखपत्र पांचजन्य में भी टीपू सुल्तान की जयंती के विरोध में एक लेख छपा था, जिसमें टीपू को दक्षिण का औरंगजेब बताया गया था।
  • टीपू सुल्तान के संबंध में मशहूर लेखक चिदानंद मूर्ति कहते हैं, 'वे बेहद चालाक शासक थे। उन्होंने मैसूर में हिंदुओं पर कोई अत्याचार नहीं किया, लेकिन तटीय क्षेत्र जैसे मालाबार में हिंदुओं पर उन्होंने काफी अत्याचार किए।'
  • भाजपा के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने नवंबर 2018 में कहा कि ‘टीपू सुल्तान ने अपने शासन का प्रयोग हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए किया और यही उनका मिशन था। इसके साथ ही उन्होंने हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ा, हिंदू महिलाओं की इज्जत पर प्रहार किया और ईसाइयों के चर्चों पर हमले किए। इस वजह से हम ये मानते हैं कि राज्य सरकारें टीपू सुल्तान पर सेमिनार कर सकती हैं और उनके अच्छे बुरे कामों पर चर्चा कर सकती हैं, लेकिन उनकी जयंती पर समारोह आयोजित करने से युवाओं में गलत संदेश जाता है।’
  • 19वीं सदी में ब्रिटिश गवर्मेंट के अधिकारी और लेखक विलियम लोगान ने अपनी किताब 'मालाबार मैनुअल' में लिखा है कि टीपू सुल्तान ने अपने 30,000 सैनिकों के दल के साथ कालीकट में तबाही मचाई थी। टीपू सुल्तान ने पुरुषों और महिलाओं को सरेआम फांसी दी और इस दौरान उनके बच्चों को उन्हीं के गले में बांध कर लटकाया गया। इस किताब में विलियम ने टीपू सुल्तान पर मंदिर, चर्च तोड़ने और जबरन शादी जैसे कई आरोप भी लगाए हैं।
  • 1964 में प्रकाशित केट ब्रिटलबैंक की किताब 'लाइफ ऑफ टीपू सुल्तान' में कहा गया है कि सुल्तान ने मालाबार क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा हिंदुओं और 70,000 से ज्यादा ईसाइयों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया। जिन लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया, उन्हें मजबूरी में अपने-अपने बच्चों को शिक्षा भी इस्लाम के अनुसार देनी पड़ी। इनमें से कई लोगों को बाद में टीपू सुल्तान की सेना में शामिल किया गया।
  • एकेडमिक माइकल सोराक के मुताबिक इस वक्त टीपू की छवि कट्टर मुगल बादशाह के तौर पर पेश करने के लिए उन फैक्ट को आधार बनाया जा रहा है, जो 18वीं सदी में अंग्रेज अधिकारी टीपू सुल्तान के खिलाफ इस्तेमाल करते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त टीपू की बढ़ती ताकत और लोकप्रियता ने अंग्रेजों की बेचैनी बढ़ा दी थी।

सोराक के मुताबिक बीते कुछ दशक में हिंदू राइट विंग टीपू को कट्टर मुगल शासक बताने लगा है। देश में पॉलिटिकल स्टेक बदलने की वजह से टीपू को लेकर हिंदू राइट विंग की सोच में यह बदलाव देखा जा रहा है। राइट विंगर्स का सबसे बड़ा आरोप है कि टीपू ने कर्नाटक के कुर्ग में हजारों कोडवा समुदाय के लोगों की जान ले ली। साथ ही दबाव डालकर मंगलोर में कैथोलिक क्रिश्चियंस को मुसलमान बनाया।

19वीं सदी में कर्नाटक में हीरो के तौर पर फेमस थे टीपू सुल्तान
मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की मौत के बाद 19वीं सदी में कन्नड़ भाषा में उन पर कई लोक गीत और नाटक लिखे गए थे। इन लोक गीत और नाटकों में टीपू की छवि को एक योद्धा के तौर पर पेश किया गया, जो अंग्रेजों के खिलाफ जंग में लड़ते हुए शहीद गए थे। कर्नाटक में टीपू के अलावा किसी और राजा के लिए ऐसे लोक गीत प्रचलित नहीं थे।

हिस्ट्री की किताबों में और ‘अमर चित्र कथा’ कॉमिक्स में टीपू को महान योद्धा बताया गया, जिसने आखिरी सांस तक अंग्रेजों से लोहा लिया। कन्नड़ भाषा में लिखी 'भारत-भारती' नाम की सीरीज में RSS ने टीपू को सच्चा देशभक्त और हीरो बताया था। इसमें टीपू के बारे में किसी किस्म की नकारात्मक टिप्पणी नहीं की गई थी।

2014 गणतंत्र दिवस परेड के दौरान कर्नाटक की झांकी में टीपू सुल्तान की विरासत को प्रमुखता से दिखाया गया था।
2014 गणतंत्र दिवस परेड के दौरान कर्नाटक की झांकी में टीपू सुल्तान की विरासत को प्रमुखता से दिखाया गया था।

अंग्रेजों को धूल चटाने पर नाम पड़ा था शेर-ए-मैसूर
20 नवंबर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली में मैसूर के शासक हैदर अली खां के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। हैदर ने अपने बेटे का नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब रखा था। बाद में इसी बच्चे को टीपू सुल्तान के नाम से जाना गया।

विवादों में होने के बावजूद टीपू सुल्तान को न सिर्फ एक अच्छे शासक, बल्कि योद्धा के तौर पर भी जाना जाता है। 15 साल की उम्र में टीपू सुल्तान ने सन 1766 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी गई मैसूर की पहली लड़ाई में अपने पिता का साथ दिया था और अंग्रेजों को बुरी तरह परास्त किया था। उस युद्ध में टीपू के पराक्रम को देखते हुए पिता ने उन्हें शेर-ए-मैसूर कहा था। सन 1782 में टीपू मैसूर के शासक बने थे।

टीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में कौन-कौन से महत्वपूर्ण युद्ध लड़े?
1. टीपू सुल्तान की पहली लड़ाई द्वितीय अंग्रेज-मैसूर युद्ध था, जिसमें उन्होंने मंगलौर की संधि के साथ युद्ध को समाप्त किया और सफलता हासिल की। 15 साल की उम्र में अंग्रेजों को हराने के बाद सुल्तान के तौर पर भी पहली लड़ाई में टीपू ने जीत दर्ज की थी। यह युद्ध 1780-84 के बीच लड़ा गया था।

2. तृतीय अंग्रेज-मैसूर युद्ध टीपू सुल्तान की शासक के तौर पर दूसरी बड़ी लड़ाई थी। यह युद्ध श्रीरंगपट्टनम की संधि के साथ समाप्त हुआ। टीपू को अपने प्रदेशों का आधा हिस्सा हैदराबाद के निजाम एवं मराठा साम्राज्य के प्रतिनिधि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए छोड़ना पड़ा। यह युद्ध 1790 में लड़ा गया था।

3. चौथा अंग्रेज-मैसूर युद्ध 1799 में हुआ था। जब अंग्रेज मंगलौर संधि की शर्तों से मुकरे तो 1799 में दोनों के बीच आमने-सामने की लड़ाई हुई। इस लड़ाई में टीपू सुल्तान की सेना के बड़े अधिकारी मीर सादिक ने गद्दारी कर दी और वह अंग्रेजों से मिल गया। इसी वजह से करीब तीन महीने की लड़ाई के बाद युद्ध के मैदान में अंग्रेजों से लड़ते हुए टीपू सुल्तान शहीद हो गए। मेजर एलेक्जेंडर ऐलन ने बाद में इस युद्ध का जिक्र करते हुए किताब में लिखा था कि टीपू सुल्तान के मरने के बाद भी अंग्रेज सैनिक उनके शरीर को छूने से डर रहे थे।

टीपू ने करवाया था मंदिरों का पुनर्निमाण
मैसूर में हिंदू बहुमत में थे। इसलिए टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टनम, मैसूर समेत राज्य के कई स्थानों में मंदिर बनवाए। इतिहासकार टीसी गौड़ा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि टीपू ने श्रिंगेरी, मेल्कोटे नांजनगुंड, सिरीरंगापटनम, कोलूर जैसे मंदिरों के जवाहरातों को सुरक्षा मुहैया करवाई थी। 1759 में आदि शंकराचार्य के बनाए तिरुपति मंदिर पर मराठों ने हमला कर दिया था तो हिंदुओं की धार्मिक भावना को देखते हुए टीपू सुल्तान ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था।

टीपू सुल्तान को हिंदुओं का हत्यारा क्यों कहा जाता है?
1990 के दशक में बाबरी ढांचा और राम मंदिर को लेकर जब विवाद चरम पर पहुंचा तो टीपू सुल्तान के प्रति नजरिए में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। इसके पहले तक तमाम स्कूली किताबों में उन्हें महान शासक की उपाधि दी जाती थी। मंदिर-मस्जिद विवाद के बीच टीपू की छवि एक धर्मनिरपेक्ष शासक के बजाय मुस्लिम तानाशाह की बना दी गई।

टीपू सुल्तान पर लिखी गई किताब में चिदानंद मूर्ति कहते हैं कि टीपू सुल्तान ने 1783 में पालघाट किले पर हमला कर हजारों ब्राह्मणों का कत्लेआम किया था। इससे हिंदुओं के मन में टीपू सुल्तान के प्रति डर बैठ गया था। हालांकि एक इंटरव्यू में इतिहासकार प्रोफेसर बी शेख ने बताया है कि यह सब कुछ इतिहास से अधिक वर्तमान राजनीतिक माहौल से प्रभावित है।

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