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भास्कर एक्सप्लेनर:मानसून सत्र के दौरान सांसदों को कोरोना से बचाने के लिए लगेंगे अल्ट्रावॉयलेट डिसइंफेक्टेंट; जानिए ये कैसे काम करते हैं

3 महीने पहलेलेखक: आबिद खान

संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है। कोरोना को देखते हुए इस बार संसद में कुछ खास इंतजाम होंगे। जिससे सांसदों को कोरोना से बचाया जा सके। लोकसभा चैंबर, कमेटी रूम नंबर 62, 63 और सेंट्रल हॉल में इसके लिए एक खास टेक्नोलॉजी को इंस्टॉल किया जाएगा। इस सिस्टम को सेंट्रल साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट ऑर्गेनाइजेशन (CSIO) ने बनाया है। इस टेक्नोलॉजी का नाम है- अल्ट्रावॉयलेट डिसइंफेक्शन या UV डिसइंफेक्ट सिस्टम।

आखिर ये ये टेक्नोलॉजी होती क्या है? ये कैसे काम करती है? कोरोना वायरस पर कितनी असरदार है?और इसका इस्तेमाल कितना सुरक्षित है? आइए समझते हैं...

सबसे पहले समझिए, ये पूरा सिस्टम क्या है?

ये पूरा सिस्टम अल्ट्रावॉयलेट लाइट के जरिए हवा में मौजूद वायरस को मारने के लिए बनाया गया है। इस सिस्टम को ऑडिटोरियम, कॉन्फ्रेंस रूम, क्लासरूम, AC बस और मॉल जैसी जगहों पर आसानी से फिट किया जा सकता है। इसे बनाने वाले CSIO का दावा है कि ये हवा में मौजूद वायरस, बैक्टीरिया, फंगस और बायो-एयरोसोल को मार कर उनके फैलने के खतरे को कम करता है।

इस सिस्टम को लेकर केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह कहते हैं कि ये सिस्टम कोरोना को हवा में फैलने से रोकेगा। हालांकि इसके बाद भी संसद सदस्यों को कोविड प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करना होगा।

ये सिस्टम काम कैसे करता है?

  • सूरज की किरणों में मौजूद 100 से 400 नैनोमीटर वेवलेंथ की किरणों को अल्ट्रावॉयलेट किरणें कहा जाता है। इन्हीं अल्ट्रा वॉयलेट किरणों को वेवलेंथ के हिसाब से 3 कैटेगरी में बांटा गया है - UV-C (100-280 नैनोमीटर), UV-B (280-315 नैनोमीटर) और UV-A (315-400 नैनोमीटर)।
  • इन तीनों में से सबसे ज्यादा एनर्जी UV-C लाइट में पाई जाती है, जिसे धरती की ओजोन लेयर हम तक पहुंचने से पहले ही रोक देती है। यही UV-C लाइट वायरस, बैक्टीरिया के न्यूक्लिक एसिड और स्पाइक प्रोटीन को डैमेज कर देती है। इस वजह से वायरस जिंदा नहीं रह पाता है।
  • CSIO द्वारा बनाए गए सिस्टम में इसी UV-C लाइट को प्रोड्यूस किया जाता है। इस पूरे सिस्टम को AC डक्ट में फिट कर दिया जाता है। इसके बाद AC से होकर जाने वाली हवा में मौजूद वायरस और बैक्टीरिया मर जाते हैं।

क्या UV-C कोरोना वायरस को मारने में कारगर है?

दरअसल सालों से UV किरणों का इस्तेमाल अस्पतालों, लैबोरेटरीज और पानी को शुद्ध करने के लिए होता आ रहा है। अलग-अलग रिसर्च में ये बात सामने आई है कि UV किरणें कोरोना को फैलने से रोकने में कारगर हैं।

  • रिसर्च जर्नल साइंस डायरेक्ट में पब्लिश एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना वायरस UV रेडिएशन के प्रति बेहद सेंसिटिव है और वायरस के हाई वायरल लोड को 9 मिनट के भीतर ही UV रेडिएशन के जरिए खत्म किया जा सकता है।
  • जून 2020 में पब्लिश इसी तरह की एक साइंटिफिक रिपोर्ट में भी वैज्ञानिकों ने पता लगाया था कि UV-C रेडिएशन कोरोना के अल्फा और बीटा वैरिएंट की प्रोटीन कोटिंग को नष्ट कर देता है।
  • सितंबर 2020 में अमेरिकन जर्नल ऑफ इंफेक्शन कंट्रोल में छपी एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक, 222 नैनोमीटर की UV किरणों को 0.1 मिलीवॉट/स्क्वैयर सेंटीमीटर की इंटेसिटी से 30 सेकेंड तक अगर किसी बंद जगह में छोड़ा जाता है तो ये 99.7% कोरोना वायरस को खत्म कर देती है।
  • इसके अलावा अलग-अलग स्टडी में भी ये दावा किया गया है कि अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन कोरोना वायरस के रेप्लिकेशन को रोकने में कारगर है। रेप्लिकेशन यानी वायरस की फोटोकॉपी।

अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन तो हमारे लिए खतरनाक होता है, तो क्या ये टेक्नोलॉजी सेफ है?

अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन का नुकसान दो बातों पर निर्भर करता है। पहला इंटेंसिटी और दूसरा ड्यूरेशन। यानी कितनी इंटेंसिटी की UV लाइट में आप कितनी देर तक रहे। अगर ज्यादा इंटेंसिटी की लाइट में आप ज्यादा देर तक एक्सपोज हो गए तो ये आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है।

हालांकि इस टेक्नोलॉजी में इस्तेमाल हो रही 254 नैनोमीटर की UV-C लाइट को इंसानों पर कम खतरनाक माना जाता है।

UV-C लाइट का ही एक और प्रकार होता है जिसे Far UV-C (207-222 नैनोमीटर) कहा जाता है। ये वायरस और बैक्टीरिया के लिए तो घातक होती है, लेकिन इंसानों पर इसका ज्यादा असर नहीं होता। ज्यादातर डिसइंफेक्टेंट सिस्टम में इसी लाइट का इस्तेमाल होता है।

CSIO ने कहा है कि इस टेक्नोलॉजी को सभी तरह के सेफ्टी स्टैंडर्ड पर खरा उतरने के बाद ही इंस्टाल किया जा रहा है। साथ ही ये पूरा सिस्टम AC डक्ट में इंस्टॉल किया जाएगा ताकि कोई भी किसी भी तरह इसके संपर्क में न आ सके।

क्या पहले भी अल्ट्रावॉयलेट किरणों का इस्तेमाल वायरस को मारने के लिए हुआ है?

1801 में अल्ट्रावॉयलेट लाइट की खोज के बाद से ही इसका इस्तेमाल अलग-अलग कामों के लिए होता आ रहा है।

1877 में पहली बार सरफेस को डिसइंफेक्ट करने के लिए अल्ट्रावॉयलेट किरणों का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद पानी और हवा में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस को मारने के लिए भी अल्ट्रावॉयलेट किरणों का इस्तेमाल होने लगा। कई देशों ने टीबी के वायरस को फैलने से रोकने के लिए भी इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया था।

क्या आप अपने घर में भी इस तरह के प्रोडक्ट लगा सकते हैं?

बिल्कुल। मार्केट में UV लैम्प से लेकर रोबोट तक मौजूद हैं, जो अलग-अलग सरफेस को डिसइंफेक्ट करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। हालांकि इनका इस्तेमाल करने से पहले आप ये जरूर पता कर लें कि ये प्रोडक्ट CSIR द्वारा सर्टिफाइड हैं या नहीं।

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