भास्कर एक्सप्लेनर:अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में रिकॉर्ड स्तर पर महंगाई, भारत पर इसका क्या होगा असर? जानें सब कुछ

14 दिन पहले

भारत समेत दुनिया में कीमतें बढ़ रही हैं। कई देशों में डिमांड के मुताबिक समान नहीं मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियां और ट्रेड एसोसिएशन ने आशंका जताई है कि ऐसी स्थिति लंबे समय तक रह सकती है। हालात सुधरने में सालों लग सकते हैं।

बीते हफ्ते अमेरिका के लेबर डिपार्टमेंट की रिपोर्ट में कहा गया कि अक्टूबर में देश में महंगाई दर बढ़कर 6.2% हो गई। वहीं, भारत के नेशनल स्टैटिकल ऑफिस के मुताबिक हमारे देश में भी महंगाई दर बढ़कर 4.5% हो गई।

महंगाई दर होती क्या है? अमेरिका में बढ़ती महंगाई का भारत पर क्या असर पड़ेगा? अमेरिका में महंगाई क्यों बढ़ रही है? क्या सिर्फ अमेरिका में ऐसा हो रहा है या दूसरे देशों में भी? कब तक इस तरह के हालात रहने की आशंका है? आइये जानते हैं...

महंगाई दर क्या होती है?

ये वो दर है जिसमें एक तय समय के दौरान चीजों का दाम बढ़ने या घटने का पता चलता है। जैसे भारत में महंगाई की गणना सालाना आधार पर होती है। यानी, अगर किसी महीने महंगाई दर 10% रहती है तो इसका मतलब ये हुआ कि पिछले साल उसी महीने के मुकाबले इस साल चीजों के दाम 10% बढ़ गए हैं। आसान भाषा में अगर किसी चीज का दाम पिछले साल 100 रुपए था तो 10% महंगाई दर का मतलब उसका दाम इस साल 110 रुपए हो गया। महंगाई दर बढ़ने पर लोगों की क्रय शक्ति घटती है।

अमेरिका में बढ़ती महंगाई चिंता का कारण क्यों?

भारत में महंगाई दर 6.2% होने पर भले दाम बहुत ज्यादा नहीं बढ़ते हों, लेकिन अमेरिका में पिछले तीन दशक में ये महंगाई दर का सबसे बड़ा आंकड़ा है। एक और बात अमेरिका के फेडरल रिजर्व, US सेंट्रल बैंक ने महज 2% की महंगाई दर का लक्ष्य रखा था। इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका में बढ़ी कीमतें कितनी अप्रत्याशित हैं।

मई 2020 के बाद अमेरिका में हर महीने महंगाई दर तेजी से बढ़ रही है। अमेरिकी अर्थशास्त्री और पॉलिसीमेकर कोरोना की वजह से लंबी मंदी से बचने की कोशिशों पर काम कर रहे थे। इसके बीच बढ़ती महंगाई ने इन सभी को चौंका दिया है।

बढ़ती महंगाई की वजह क्या है?

आमतौर पर महंगाई तब बढ़ती है जब या तो डिमांड बढ़े या फिर सप्लाई कम हो जाए। अमेरिका में बढ़ती महंगाई के पीछे दोनों वजहें हैं। कोरोना के खिलाफ तेजी से वैक्सीनेशन होने की वजह से अमेरिका की इकोनॉमी तेजी से सुधरी है।

उम्मीद से तेजी से हुए इस सुधार की वजह से डिमांड में तेजी आई है। इसके साथ ही सरकार के पैकेज से की वजह से उपभोक्ताओं को राहत मिली। कोरोना में जिन लोगों की नौकरी गई उन्हें भी इस पैकेज ने काफी मदद की। इन सभी ने डिमांड को बढ़ाया।

डिमांड में इस रिकवरी के लिहाज से सप्लाई नहीं बढ़ सकी। डिमांड सप्लाई का ये गैप महंगाई बढ़ने की वजह बन गया। कुछ एक्सपर्ट्स का सोचना है कि कोरोना के दौर में की गई सरकारी मदद ने महंगाई की स्थिति को बिगाड़ने का काम किया है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि उत्पादन के लिए जरूरी चीजों की कमी है। इस वजह से नया सामान बाजार में आ ही नहीं रहा। सामान की कमी के चलते कीमतें बढ़ रही हैं।

कोरोना महामारी की वजह से 2020 में अमेरिका समेत पूरी दुनिया में लॉकडाउन जैसी स्थितियां बनीं। दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं। कई कंपनियों ने कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। प्रोडक्शन में काफी कटौती कर दी।

इसकी वजह से दुनियाभर में फैली इन कंपनियों की सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा। आम समय में भी सप्लाई चेन को बहाल करने में समय लगता है। कोरोना की वजह से लंबे समय तक प्रभावित रही सप्लाई चेन के नॉर्मल होने में समय लग रहा है। कोरोना से प्रभावित हुई इकोनॉमी जिस तेजी से रिकवर हुई उस तेजी से सप्लाई चेन रिकवर नहीं हो सकी। डिमांड और सप्लाई में बढ़ते अंतर ने महंगाई को बढ़ा दिया।

क्या सिर्फ अमेरिका बढ़ रही है महंगाई?

नहीं, ऐसा नहीं है। दुनियाभर की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ती महंगाई ने चौंकाया है। चाहे जर्मनी हो या चीन या फिर जापान ये सभी देश इस वक्त महंगाई से परेशान हैं। जैसे जापान में प्रोडक्शन प्राइज इडेक्शन 40 साल के उच्चतम स्तर पर है।

क्या सिर्फ कोरोना ही इस महंगाई की वजह है?

ऐसा नहीं कह सकते हैं। डिमांड सप्लाई में आए इस गैप की एक वजह ग्लोबल वॉर्मिंग भी है। बीते कुछ समय से धरती के बढ़ते तापमान की वजह से मौसम में काफी बदलाव आया है। इस वजह से दुनिया के कई हिस्सों में फसलें बर्बाद हुई हैं। कहीं भारी बारिश तो कहीं सूखे ने काफी नुकसान पहुंचाया है। जैसे- भारत में ही बारिश और तूफान ने सब्जियों को नुकसाना पहुंचाया, तो अमेरिका में भी इस वजह से कपास की खेती खराब हो गई। ब्राजील में बर्फबारी और सूखे की वजह से कॉफी की फसल बर्बाद हो गई।

वहीं, सामान पहुंचाने के लिए समुद्र पर निर्भरता भी इस डिमांड-सप्लाई गैप का एक और कारण है। बीते कुछ समय में दक्षिणी चीन और अमेरिका में कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं। इस वजह से डॉक तक पहुंचने वाले जहाज से सामान उतारने में काफी समय लगता है। जो कंटेनर पहले दो महीने में चीन से अमेरिका जाकर लौटते थे, वो अब तीन महीने में लौट रहे हैं। इसके साथ ही ब्रिटेन, यूरोप समेत कई जगह लेबर की कमी, ट्रक ड्राइवरों और गोदाम कर्मचारियों की कमी के कारण सप्लाई चेन भी बुरी तरह प्रभावित हुई है।

क्या भारत में भी महंगाई बढ़ रही है?

महामारी के दौर में दुनिया के ज्यादातर देश जहां बढ़ती महंगाई से परेशान हैं, वहीं, भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिन्होंने महंगाई बढ़ने का अनुमान लगाया था। कोरोना ने यहां भी स्थिति को खराब किया है। भारत में डिमांड अभी भी प्री-कोरोना के लेवल पर नहीं पहुंची है। इसके बाद भी महंगाई बढ़ी है।

ये भी काफी रोचक है कि सिंतबर 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था के तकनीकी तौर पर मंदी में प्रवेश करने के बाद भी RBI ने मई 2020 में के बाद व्याज दरों में बदलाव नहीं किया है। इसकी वजह ये है कि भारत में महंगाई दर अभी चिंताजनक स्तर के करीब या उससे ऊपर है। हालांकि, राहत की बात ये है कि पिछले कुछ महीनों में इसमें कमी आई है और महंगाई दर 5% से नीचे पहुंची है।

तो क्या अब भारत में महंगाई की चिंता खत्म हो रही है?

ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। भारत में महंगाई दर अभी भी ज्या्दा है, जबकि डिमांड अभी पुराने स्तर पर नहीं पहुंची है। ऐसे में डिमांड बढ़ने पर इसके और बढ़ने का खतरा है। हालांकि, ओवरॉल महंगाई दर अभी भी नियंत्रण में दिखती है। इसके बाद भी मूल मुद्रास्फीति चिंता का कारण है। मूल मुद्रास्फीति दर वो महंगाई दर होती जिसमें हम खाने की चीजों और ईंधन के दाम को नजरअंदाज कर देते हैं। आमतौर पर खाने-पीने की चीजों और ईंधन के दाम बहुत तेजी से बढ़ते-घटते हैं। भारत में इस वक्त मूल मुद्रस्फीति की दर 6% से ज्यादा है। दुनियाभर में बढ़ती महंगाई के कारण भारत में हालात और बिगड़ने की आशंका है।

दूसरे देश में चीजों के दाम बढ़ने-घटने का भारत पर कैसे असर हो सकता है?

जब दुनियाभर में दाम बढ़ते हैं तो इम्पोर्ट इन्फ्लेशन बढ़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो विदेशों से आने वाली हर चीज महंगी हो जाती है। इसके साथ ही अमेरिका जैसे देशों में महंगाई बढ़ने पर वहां का सेंट्रल बैंक मौद्रिक नीति पर पुनर्विचार कर सकता है। इससे इंटरेस्ट रेट बढ़ सकते हैं। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दो बड़े असर होंगे। पहला- वो भारतीय कंपनियां जो विदेशों से फंड रेज करती हैं उन्हें ये महंगा पड़ेगा। दूसरा- इसके बाद RBI भी इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है।

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