भास्कर इंटरव्यू:कोरोना की तीसरी लहर में बड़ों से ज्यादा बच्चे बीमार होंगे, इसका कोई साइंटिफिक आधार नहीं: डॉ. लहारिया

4 महीने पहलेलेखक: जयदेव सिंह

भारत में कोरोना की दूसरी लहर कमजोर हुई है, पर खत्म नहीं। दूसरी लहर का पीक पिछले साल सितंबर में आए पहले पीक से चार गुना बड़ा था। दूसरी लहर में मौतें भी पिछले के मुकाबले दोगुनी हुई। 150 दिन में 2.5 लाख से अधिक लोगों ने दम तोड़ा। इससे अभी निपटे भी नहीं कि सरकार से लेकर कई विशेषज्ञ कह रहे कि कोरोना की तीसरी लहर भी आ सकती है। और तो और, यह बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक होगी।

पर महामारी विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहारिया ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि इसे साबित करने का साइंटिफिक आधार नहीं है। तुलनात्मक रूप से बड़ों के मुकाबले बच्चों में कोई रिस्क नहीं है। हमारे देश में 40% आबादी 18 वर्ष से कम उम्र की है। उनमें से सिर्फ 10% अब तक इन्फेक्ट हुए हैं। मौतों की अंडर रिपोर्टिंग पर उनका कहना है कि ऐसा हर देश में हो रहा है। भारत में वास्तविक मौतों का आंकड़ा बताई गई मौतों से 2 से 6 गुना तक हो सकता है।

डॉ. लहारिया ने दिल्ली एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया और टॉप वैक्सीन साइंटिस्ट डॉ. गगनदीप कंग के साथ मिलकर कोरोना को लेकर भारत में किए गए उपायों पर किताब लिखी है। नाम है ‘टिल वी विन’। डॉ. लहारिया कोरोना से जुड़ी कई कमेटियों के सदस्य भी हैं। हमने उनसे कोरोना की मौजूदा स्थिति, बच्चों पर इसका खतरे, भविष्य में आने वाली लहरें, वैक्सीनेशन की रफ्तार जैसे जरूरी मसलों पर बात की। आप भी पढ़िए...

सवाल: कोरोना की इतनी बड़ी लहर का अनुमान लगाने में हम कहां चूके?
डॉ. लहारियाः
जब महामारी आती है तो लंबे समय की प्लानिंग जरूरी होती है। देश में कोराेना को रोकने को लेकर तीन बड़ी चूक हूई…1. हमारे यहां प्लानिंग मिसिंग थी। 2. टेस्टिंग और ट्रीटमेंट की सुविधा गांवों तक नहीं पहुंची। 3. हम महामारी में दूसरों की गलतियों और उनकी बेस्ट प्रैक्टिसेस से सीखते हैं। पर हम नहीं सीखे। वैक्सीनेशन की रफ्तार तेज की जा सकती थी, पर नहीं कर पाए।

अब मेंटल हेल्थ और पोस्ट-कोविड ट्रीटमेंट पर बहुत ध्यान देने की जरूरत है। आपको समझना होगा कि किसी महामारी में तीन स्तर पर लड़ना होता है...1. सरकारों को 2. स्वास्थ्य तंत्र को 3. जनता को। अगर इन तीनों में से कोई भी अपना काम ठीक से नहीं करेगा तो महामारी का स्तर बढ़ेगा और वह फैलती भी जाएगी।

सवाल: क्या तीसरी लहर सितंबर तक आ रही है और इसकी जद में बच्चे होंगे?
डॉ. लहारियाः
इस बात का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि तीसरी या कोई और लहर बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक होगी। पहली और दूसरी लहर को देखें तो बच्चों पर कम असर पड़ा है। 18 साल तक के लोगों का कोरोना के मॉडरेट टू सीवियर इलनेस 10% से 11% रही है। देश की 40% आबादी 18 साल से कम उम्र की है। 18+ की 60% आबादी में 89% लोग कोरोना से प्रभावित हुए हैं।

बच्चों को रिस्क कम होने का एक वैज्ञानिक आधार भी है। वायरस फेफड़ों में मौजूद एपीई-2 नाम के रिसेप्टर्स में जुड़ता है। बच्चों में ये रिसेप्टर्स अंडर-डेवलप होते हैं। इसी वजह से बच्चों में इन्फेक्शन होने के बाद भी गंभीर लक्षण नहीं होते। जिन देशों में तीसरी या चौथी लहर आई है, वहां भी बच्चे अधिक प्रभावित नहीं हुए हैं। नए वैरिएंट्स भी बच्चों को अधिक प्रभावित नहीं कर रहे। यानी तुलनात्मक रूप से देखें तो बच्चों को कोई रिस्क नहीं है।

सवाल: सरकार की वैक्सीनेशन प्लानिंग में कहां कमी रह गई?
डॉ. लहारियाः
सफल वैक्सीनेशन के लिए तीन स्तर पर काम करना होगा…1. पॉलिसी 2. सप्लाई 3. जमीनी स्तर पर डिलीवरी, अब इसे बारी-बारी से देखिए

पॉलिसी: गया।

सप्लाई: 16 जनवरी से टीकाकरण शुरू होना था और पहला ऑर्डर 11 जनवरी को दिया गया। यानी सिर्फ 5 दिन पहले। लोगों में भी वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट रही। इससे पहले वैक्सीन उपलब्ध थी पर लगवाने वाले नहीं थे। लोगों ने डिमांड बढ़ाई तो सप्लाई कम पड़ गई। क्योंकि समय रहते सप्लाई पर ध्यान नहीं दिया गया।

जमीनी स्तर पर डिलीवरी: हम पोलियो उन्मूलन कैंपेन से सबक लेते तो ज्यादा फायदा होता। हालांकि, AEFI (एडवर्स इवेंट्स फॉलोइंग इम्यूनाइजेशन) का बहुत अच्छे से इस्तेमाल हुआ। पिछले 15 साल में जो कोल्ड चेन का सिस्टम बना है, उसका भी अच्छे से इस्तेमाल हुआ। लेकिन सप्लाई पर ठीक से ध्यान दिया जाता तो हमारा वैक्सीनेशन प्रोग्राम आज काफी बेहतर स्थिति में होता।

सवाल: रिपोर्ट्स हैं कि जिन्हें इन्फेक्शन हो गया उन्हें वैक्सीन की जरूरत नहीं है, क्या ये सही है?
डॉ. लहारियाः
अब तक की स्टडीज के मुताबिक जो व्यक्ति इन्फेक्ट हो जाता है उसमें 6 से 9 महीने तक प्रोटेक्शन रहता है। इसी वजह से WHO भी कहता है कि जो लोग एक बार इन्फेक्ट हो चुके हैं। वो छह महीने तक वैक्सीन के लिए इंतजार कर सकते हैं।

24 मई को ही नेचर नाम के जर्नल में आई स्टडी कहती है कि जिन लोगों को माइल्ड इन्फेक्शन होता है, उनमें धीरे-धीरे एंटीबॉडी गिरने लगती है। करीब 11 महीने बाद ये खत्म हो जाते हैं। लेकिन, इनके बोनमैरो में मौजूद लांग लिव प्लाज्मा सेल की उपस्थिति की वजह से व्यक्ति लंबे समय तक प्रोटेक्टेड रह सकता है।

ये सब शुरुआती अंडरस्टैंडिंग है। इसके साथ ही कोरोना के नए वैरिएंट भी आ रहे हैं। ऐसे में वैक्सीन ही सबसे बेहतर विकल्प है।

सवाल: वैक्सीनेशन की रफ्तार बढ़ाने के लिए वैरिएंट्स का डर भी दिखाया जा रहा है, क्या वैक्सीनेशन में पिछड़ने से नए वैरिएंट्स या स्ट्रेन सामने आने का खतरा है?
डॉ. लहारियाः
पिछले कुछ दिनों में आईं स्टडीज के मुताबिक नए वैरिएंट के खिलाफ न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी की जरूरत ट्रेडिशनल वैरिएंट की तुलना में ज्यादा चाहिए होती है। हालांकि, कोरोना किसी व्यक्ति में एंटीबॉडी की मात्रा के आधार पर नहीं होता। अगर किसी व्यक्ति में एंटीबॉडी है तो वह प्रोटेक्टेड माना जाता है। भले ही एंटीबॉडी की मात्रा कितनी भी हो। यानी, नए वैरिएंट के खिलाफ भी वैक्सीन कारगर रहेगी।

इसे यूके में आई स्टडी से समझ सकते हैं। उसमें पाया गया कि वैक्सीन की सिंगल डोज के बाद डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ इफेक्टिवनेस 32% थी। जबकि अल्फा वैरिएंट के खिलाफ 52% थी। यानी, नए वैरिएंट के आने से ये जरूर हो सकता है कि वैक्सीन की इफेक्टिवनेस कुछ कम हो जाए, लेकिन वो पूरी तरह बेकार हो जाएगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

सवाल: पहले बच्चों को वैक्सीन लगाने की जल्दबाजी करनी चाहिए या बड़ों को कवर करना चाहिए?
डॉ. लहारियाः
वैक्सीन की असीमित मात्रा नहीं है। ऐसे में वैक्सीनेशन प्राथमिकताओं के आधार पर किया जाना चाहिए। दुनियाभर में इसी तरह से वैक्सीनेशन प्रोग्राम को चलाया गया है। भारत ऐसा पहला देश है, जिसने एक साथ इतने लोगों के लिए वैक्सीनेशन को ओपन कर दिया।

जहां तक बच्चों का सवाल है तो बच्चों को रिस्क बहुत कम है। ऐसे में उन्हें सबसे आखिरी में ही कवर किया जाएगा। मेरा अनुमान है कि भारत में इनका वैक्सीनेशन सितंबर या उसके बाद शुरू हो सकता है।

सवाल: कोवीशील्ड को कुछ देशों ने बैन कर दिया है, पर हमारे यहां तो उम्मीदें ही उस पर टिकी हैं... बैन को लेकर आप क्या सोचते हैं?
डॉ. लहारियाः
जो पाबंदियां लगाई गई हैं उसे बैन कहना ठीक नहीं। बल्कि उन देशों ने कुछ सर्टेन एज ग्रुप के लिए इसे अलाऊ नहीं किया है। इसकी मुख्य वजह है कोवीशील्ड से एक रेयर ब्लड क्लॉट होने की आशंका है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने माना है कि वैक्सीनेशन के बेनिफिट की तुलना में यह खतरा बहुत कम है।

ब्लड क्लॉटिंग का रिस्क उम्र कम होने के साथ बढ़ता है। यानी, 60 साल से ज्यादा वालों में सबसे कम होता है और 50 से 60 में थोड़ा बढ़ता है। उससे कम एज में यह और बढ़ जाता है। इसी वजह से कुछ देशों ने इसे सिर्फ अधिक एज वालों के लिए खोला है। ऐसा ज्यादातर उन देशों में है, जिनके पास वैक्सीन की च्वॉइस है।

सवाल: कोवैक्सिन लगाने के बाद भी विदेश में वैक्सीनेटेड नहीं माना जा रहा, ऐसा क्यों और चौथे फेज के ट्रायल्स की बात हो रही है, क्या इसकी जरूरत है?
डॉ. लहारियाः
भारत में कोवैक्सिन को इमरजेंसी यूज के लिए अप्रूवल मिला था। इस वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल मार्च में पूरा हुआ और उसके नतीजे मई में आए। WHO से अप्रूवल के लिए ट्रायल पूरा होना चाहिए। सारा डेटा मौजूद होना चाहिए। प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, इस वजह से उसे इंटरनेशनल लेवल पर अप्रूवल नहीं मिला है।

मुझे लगता है कि प्रॉसेस पूरी होते ही कोवैक्सिन को अप्रूवल मिल जाएगा। इसके बाद WHO से जल्द मंजूरी मिलने की उम्मीद की जा सकती है। फिर ये समस्या खत्म मानिए।

सवाल: मिक्स और मैच वैक्सीन क्या सही है, अब तक की रिसर्च क्या कहती है?
डॉ. लहारियाः
इस पर स्पेन में पहली स्टडी हुई। वहां, पहली डोज ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनिका की दी गई। उसके बाद दूसरी डोज mRNA बेस्ड फाइजर बायोटेक दी गई। इसमें पाया गया कि मिक्स वैक्सीनेशन के साइड इफेक्ट्स थोड़े ज्यादा हैं, लेकिन एंटीबॉडी का लेवल एक वैक्सीन की दोनों डोज की तुलना में मिक्स डोज में कहीं ज्यादा बनता है।

यानी दोनों ही स्थिति में वैक्सीन प्रोटेक्ट करती है। यूके में भी इस तरह की स्टडीज चल रही हैं। वहां भी इसी तरह के नतीजे देखे जा रहे हैं। आने वाले समय में कई वैक्सीन होगी। अगर आगे की स्टडीज में ये पाया जाता है कि मिक्स एंड मैच से प्रोटेक्शन ज्यादा लंबा होता है तो उससे इसको ज्यादा फायदा होगा।

सवाल: हाल ही में बिहार ने कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े रिस्ट्रक्टर किए, आपको आंकड़ों में इस अंतर का क्या कारण लगता है?
डॉ. लहारियाः
सारी दुनिया में इस तरह की महामारी में डेथ की अंडर रिपोर्टिंग होती है। हर देश में अलग-अलग स्तर पर अंडर रिपोर्टिंग हो रही है। WHO की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में हुई कुल मौतों की दो से ढाई गुना ज्यादा मौतें हुई होंगी। अगर भारत की बात करें तो भारत में वास्तविक मौतों की संख्या दो से छह गुना तक हो सकती है।

हालांकि मौतों के इस सच को दबाया नहीं जा सकता। आने वाली जनगणना में ये सामने आ जाएगा। दूसरा- जब एक साल बाद देश के 2020-21 के डेथ स्टैटिक्स आएंगे तब भी कुल मौतों का सच सामने आ जाएगा। महाराष्ट्र और बिहार ने जो रिव्यू के बाद नई डेथ दिखाई, वो इस बात को दर्शाता है कि कुछ मौतें निश्चित रूप से अंडर रिपोर्ट हुई हैं।

खबरें और भी हैं...