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भास्कर एक्सप्लेनर:गुजरात में चुनाव से पहले भाजपा मुख्यमंत्री को क्यों बदल देती है? जानें रुपाणी को हटाए जाने के 5 कारण

10 दिन पहलेलेखक: जयदेव सिंह

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। रुपाणी ने शनिवार को राज्यपाल आचार्य देवव्रत से मिलकर अपने इस्तीफे की पेशकश की, जिसे स्वीकार कर लिया गया है। इस्तीफा देने के बाद रुपाणी ने कहा कि यह 'भाजपा की परंपरा' है और पार्टी सभी कार्यकर्ताओं को बराबरी से मौके देने पर भरोसा करती है।

65 वर्षीय रुपाणी अगस्त 2016 में मुख्यमंत्री बनाए गए थे, जब आनंदी बेन पटेल ने 75 वर्ष के होने पर अपनी उम्र को आधार बनाकर इस्तीफा दिया था। रुपाणी के नेतृत्व में ही भाजपा ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन के बावजूद 2017 विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी। गुजरात में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में सिर्फ एक साल पहले मुख्यमंत्री के पद छोड़ने को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

क्या गुजरात में ऐसा पहली बार हो रहा है?
अगले साल नवंबर-दिसंबर में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में इस बदलाव को एंटी-इंकम्बेंसी कम करने की कवायद माना जा रहा है। 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से साल भर पहले आनंदी बेन पटेल को हटाकर विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया था।

आनंदी बेन मई 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस पद पर आई थीं। खुद मोदी भी इसी तरह के बदलाव के बाद पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। अक्टूबर 2001 में जब नरेंद्र मोदी को पहली बार मुख्यमंत्री बनाया गया, उस वक्त भाजपा के केशुभाई पटेल अपना चार साल का कार्यकाल पूरा कर चुके थे।

इस तरह के बदलाव की वजह क्या होती है?
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियां मुख्यमंत्री बदलकर चार साल में पैदा हुई एंटी-इंकम्बेंसी को खत्म करने की कोशिश करती हैं। वहीं दूसरी ओर पार्टी में जो विरोधी गुट होते हैं उन्हें चुनाव से पहले साधने की कोशिश की जाती है।

भाजपा में इस तरह के बदलाव का एक कारण जमीन से RSS को मिला फीडबैक भी बताया जाता है। RSS को ग्राउंड से मुख्यमंत्री के खिलाफ पैदा हुई नाराजगी का पता चलता है तो वो इस तरह के परिवर्तन के लिए कहती है। दो हफ्ते पहले ही संघ प्रमुख मोहन भागवत गुजरात दौरे पर गए थे। यहां उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटील समेत कई नेताओं के साथ बैठक की थी। भागवत के दौरे के बीच जन्माष्टमी के दिन सुरेश सोनी ने गुजरात में अमित शाह से मुलाकात की थी। इसके बाद से ही गुजरात में मुख्यमंत्री को बदलने की चर्चा चल रही थी।

जन्माष्टमी के दिन अहमदाबाद के इस्कॉन टैम्पल में अमित शाह और सुरेश सोनी।
जन्माष्टमी के दिन अहमदाबाद के इस्कॉन टैम्पल में अमित शाह और सुरेश सोनी।

रुपाणी को हटाए जाने की वजह क्या है?

रुपाणी को हटाने की ये हो सकती हैं वजहें-

1. केंद्रीय नेतृत्व नहीं था खुश: रुपाणी के इस्तीफे की मुख्य वजह उनके नॉन-परफॉर्मेंस से जोड़ी जा रही है। सूत्र इसे "कोर्स करेक्शन' कह रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व रुपाणी के परफॉर्मेंस से संतुष्ट नहीं था। स्ट्रैटजी सिम्पल है- अगर राज्य में नेतृत्व के खिलाफ कोई विरोध है तो उसे अभी ही खत्म किया जाए। चुनावों का इंतजार न किया जाए। उत्तराखंड और कर्नाटक में हम ऐसा देख चुके हैं।

2. संघ का फीडबैक: संघ का जमीनी सर्वे मुख्यमंत्री के खिलाफ पैदा हुई नाराजगी दिखाता है। सूत्र बताते हैं कि संघ के फीडबैक के आधार पर पार्टी अगले चुनावों में कम से कम 50 विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवारों के चेहरे बदल सकती है। कई विधायकों के टिकट कटना भी तय बताया जा रहा है।

3. कोविड-19 क्राइसिस से निपटने में नाकामी: गुजरात में कोविड-19 को लेकर मिस-मैनेजमेंट देखने को मिला। पिछले साल खबरें आई थीं कि खुद मोदी और शाह भी रुपाणी से नाराज थे।

4. पाटीदार आंदोलन को दबाने में नाकामी: भाजपा ने रुपाणी को विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले हटाया है। पार्टी ने 2017 में भले ही रुपाणी के नेतृत्व में सरकार बनाई थी, उसकी सीटें दो अंकों में रह गई थीं। रुपाणी से पाटीदार आंदोलन का गढ़ रहे सौराष्ट्र में अपना दबदबा बढ़ाने की उम्मीद की गई थी। रुपाणी को जब अगस्त 2016 में अमित शाह ने मुख्यमंंत्री के तौर पर चुना तो लग रहा था कि वे पाटीदार आंदोलन को दबा देंगे, पर ऐसा हुआ नहीं।

5. सभी समुदायों को नहीं साध सके रुपाणी: रुपाणी जैन-बनिया कम्युनिटी से ताल्लुक रखते हैं, जिसकी गुजरात की आबादी में हिस्सेदारी 5% है। 2016 में रुपाणी को न्यूट्रल कैंडिडेट के तौर पर आगे बढ़ाया गया था। उम्मीद की जा रही थी कि वे बाकी समुदायों के साथ सामंजस्य बिठा लेंगे, पर वे ऐसा नहीं कर सके। रुपाणी के खिलाफ कुछ समुदायों के नेता लामबंद भी हो रहे थे। गुजरात भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटील लगातार रुपाणी के खिलाफ लॉबिंग कर रहे थे।

तो क्या हर चुनाव से पहले भाजपा गुजरात में मुख्यमंत्री बदल देती है?
गुजरात में भाजपा 1995 में पहली बार सत्ता में आई थी। उस वक्त केशुभाई पटेल राज्य के मुख्यमंत्री बने। महज 221 दिन बाद ही उनकी जगह सुरेश मेहता मुख्यमंत्री बनाए गए। दरअसल, शंकर सिंह वाघेला और दिलीप पारिख का ग्रुप वाघेला को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहा था। उनके विद्रोह को दबाने के लिए केशुभाई की जगह मेहता को मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा का ये फैसला भी ज्यादा काम नहीं आया। एक साल बीतते-बीतते वाघेला बगावत करके अलग हो गए और भाजपा सरकार गिर गई। वाघेला मुख्यमंत्री बने लेकिन वो भी कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।

1998 में मध्यावधि चुनाव हुए और भाजपा 182 में से 117 सीट जीतकर फिर से सत्ता में आई। इस बार केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री बने। केशुभाई इस बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। 2002 में होने वाले चुनाव से एक साल पहले भाजपा हाईकमान ने उनकी जगह नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया।

मोदी के नेतृत्व में भाजपा को 2002 के चुनाव में जीत मिली। मोदी पहले भाजपाई मुख्यमंत्री रहे जिसने एक नहीं बल्कि दो-दो कार्यकाल पूरे किए। 2014 में प्रधानमंत्री बनने तक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन मोदी के केंद्र की राजनीति में जाने के बाद भाजपा फिर उसी पैटर्न पर लौट आई है, जिसमें चुनाव से करीब एक साल पहले मुख्यमंत्री बदल दिया जाता है।

तो क्या ऐसा सिर्फ गुजरात में होता है?
ऐसा नहीं है। इसे हाल के कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। जैसे उत्तराखंड में मार्च 2022 में चुनाव है। उससे करीब एक साल पहले भाजपा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बना दिया। तीरथ रावत को महज 114 दिन में ही बदल दिया गया। उनकी जगह पुष्कर धामी मुख्यमंत्री बना दिए गए। कर्नाटक में भी हाल ही में बीएस येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया है। कर्नाटक में भी मई 2023 में चुनाव होने हैं।

क्या ये भाजपा की स्टाइल ऑफ वर्किंग है या दूसरी पार्टियों में भी इस तरह का चलन है?
गुजरात की बात करें तो 1957 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव के बाद से एक विधानसभा कार्यकाल में एक से ज्यादा मुख्यमंत्री बनने का चलन शुरू हो गया था। दूसरी विधानसभा के दौरान कांग्रेस के तीन मुख्यमंत्री बने। चौथी विधानसभा में भी कांग्रेस ने चुनाव से ऐन पहले मुख्यमंत्री बदल दिया था। पांचवीं विधानसभा में तीन मुख्यमंत्री बने। हालांकि, हर बार अलग पार्टी का नेता CM बना।

1980 से 1985 के दौरान सोलंकी CM रहे। सोलंकी के नाम सबसे कम समय के लिए CM रहने का भी रिकॉर्ड है। 1989 में वो महज 83 दिन के CM बने थे। सोलंकी के बाद नरेंद्र मोदी गुजरात के ऐसे तीसरे नेता थे जिन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। मोदी ने ये करिश्मा दो बार किया।

ऐसा भी नहीं है कि ये चलन सिर्फ गुजरात या भाजपा में है। देश के बाकी राज्यों और कांग्रेस में भी इस तरह के कई उदाहरण हैं जिसमें चुनाव से पहले मुख्यमंत्री को बदल दिया गया।

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