मिसाइल चलती तो दुनिया खत्म हो जाती:जब रूसी कर्नल ने मशीन के बजाय दिल पर किया भरोसा, वरना अमेरिका पर बरसते परमाणु बम

7 महीने पहलेलेखक: हिमांशु पारीक

हाल ही में भारत की एक मिसाइल टेक्निकल गलती से पाकिस्तान की सीमा में जा गिरी। इसके बाद भारत सरकार को माफी मांगनी पड़ी। गनीमत रही कि इस मिसाइल से कोई नुकसान नहीं हुआ और पाकिस्तान ने भी कोई एक्शन नहीं लिया। वरना दोनों देश आमने-सामने आ जाते।

ऐसी ही एक गलती कुछ दशक पहले भी हुई थी। तब सोवियत रूस और अमेरिका जंग के कगार पर पहुंच गए थे, लेकिन सोवियत आर्मी ऑफिसर स्टानिस्लाव पेट्रोव ने अपनी मशीनों पर भरोसा जताने के बजाय इंसानी सूझबूझ से उस परमाणु युद्ध के खतरे को टाल दिया था।

आइए जानते हैं कि 1983 में ऐसा क्या हुआ था , जिसकी वजह से अमेरिका और रूस बीच परमाणु युद्ध होने का खतरा मंडराने लगा था...

...तो सायरन की गलती से खत्म हो जाती दुनिया
बात उस समय की है जब सोवियत रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चल रहा था। सितंबर 1983 में सोवियत सेना ने एक यात्री विमान को अमेरिकी खुफिया विमान समझकर मार गिराया था। इसमें एक अमेरिकी नेता समेत सभी 269 लोग मारे गए थे। इस घटना से दोनों देशों के संबंधों में खटास आ गई थी।

सोवियत सेना को अमेरिका के किसी भी हमले का जवाब परमाणु हमले से देने की छूट थी। आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका के पास उस समय करीब 23,000 परमाणु बम थे। वहीं सोवियत रूस के पास 35,000 से ज्यादा परमाणु हथियारों का जखीरा था।

तब सोवियत रूस की एयर डिफेंस फोर्स में स्टानिस्लाव पेट्रोव बतौर कर्नल तैनात थे। उनके पास मॉस्को स्थित सीक्रेट कमांड सेंटर की जिम्मेदारी थी, जो अमेरिका पर नजर रखता था।

26 सितंबर, 1983 को कर्नल स्टानिस्लाव पेट्रोव की शिफ्ट समाप्त होने ही वाली थी कि एक सायरन बजने लगा। यह अमेरिका की तरफ से सोवियत रूस पर हमले की पूर्व चेतावनी देने वाला अलार्म था, जो बता रहा था कि अमेरिका ने सोवियत रूस पर 5 परमाणु से लैस बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला कर दिया है। ये देखकर पेट्रोव के होश उड़ गए।

अमेरिकी मिसाइलें सिर्फ 20 मिनट में ही मॉस्को तक पहुंच सकती थीं और सोवियत रूस के लिए ये खतरनाक लम्हा था। सायरन लगातार बज रहा था और स्क्रीन पर बड़े-बड़े लाल अक्षरों में लिखा “LAUNCH” अमेरिका पर परमाणु हमला करने का निर्देश दे रहा था।

प्रोटोकॉल के मुताबिक, पेट्रोव को इसकी सूचना तुरंत अपने कमांडर को देनी थी। इसके बाद सोवियत रूस भी एक के बाद एक अमेरिका पर परमाणु मिसाइलें लॉन्च करता और अमेरिका द्वारा जवाबी कार्रवाई करने पर दुनिया दो परमाणु शक्तियों के महायुद्ध में फंस कर समाप्त हो सकती थी।

मिसाइलों की गिनती देखकर हुआ गड़बड़ी का अंदेशा
पेट्रोव ने इस घटना के बाद अपने इंटरव्यू में बताया था कि उस वक्त एक्शन के लिए उनके पास कुछ ही पल थे। उन्हें फोन करके तुरंत अपने सीनियर्स को इस बारे में बताना था पर पेट्रोव को कुछ गड़बड़ लगी।

उन्होंने सोचा कि अगर अमेरिका सोवियत रूस पर कोई हमला करना चाहेगा तो वह सिर्फ 5 मिसाइलों का ही इस्तेमाल क्यों करेगा? जबकि उसकी क्षमता कई गुना अधिक है।

पेट्रोव को पता था कि हमले को डिटेक्ट करने के लिए लगाया गया सिस्टम नया था और पूरी तरह भरोसे के काबिल नहीं था। ऐसे में उन्होंने अलार्म की जानकारी अपने कमांडर की बजाय एक अन्य सीनियर अधिकारी को दी और कहा कि अलार्म में कोई टेक्निकल खराबी है। इसके बाद उन्होंने लगभग आधे घंटे तक इंतजार किया और जब किसी वास्तविक हमले की खबर नहीं आई तो राहत की सांस ली।

सूरज की रोशनी को डिटेक्टर ने समझा अमेरिकी मिसाइल
घटना की जांच में सामने आया कि मिसाइल डिटेक्ट करने वाले रडार ने बादलों से टकराकर आ रही सूरज की रोशनी को मिसाइल समझ लिया और स्क्रीन पर हमले का सायरन बजा दिया। पर पेट्रोव ने अपने कॉमन सेन्स से दुनिया को तबाही के मंजर से बचा लिया। इस घटना के बाद पेट्रोव से गहन पूछताछ की गई और उन्हें सरकार की तरफ से फटकार भी लगाई गई।

15 साल बाद किताब में हुआ घटना का खुलासा
1983 की इस घटना को दुनिया के सामने आते-आते 15 साल लग गए। सोवियत रूस के विघटन के बाद उस समय के कमांडर यूरी वोतिंस्तेव ने अपनी किताब में इसका जिक्र किया, जिसके बाद पेट्रोव हीरो बन गए। उन्हें UN समेत कई संस्थाओं ने सम्मानित किया। साल 2014 में उनके ऊपर एक फिल्म भी बनी, जो कि काफी हिट रही। अपने आखिरी दिनों में सरकारी पेंशन पर रह रहे पेट्रोव की 19 मई 2017 को मौत हो गई।

1962 में भी ऐसी ही सूझ-बूझ से टल गया था परमाणु युद्ध

पेट्रोव की तरह ही एक अन्य सोवियत कमांडर वसिली अर्खिपोव ने क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान समझदारी दिखाते हुए दुनिया को परमाणु युद्ध से बचा लिया था।

1962 के अक्टूबर महीने में क्यूबा में लगभग 13 दिनों तक अमेरिकी और सोवियत सेनाएं अपने-अपने परमाणु हथियारों के साथ आमने-सामने थीं। इस दौरान एक रूसी पनडुब्बी का मॉस्को से संपर्क टूट गया और उसे अमेरिकी नाविकों ने पूछताछ के लिए घेर लिया।

रूसी कमांडरों को छूट थी कि किसी भी तरह का खतरा महसूस होने पर वे तुरंत परमाणु मिसाइल से हमला कर सकते थे। इसके लिए पनडुब्बी पर सवार तीनों कमांडरों की सहमति जरूरी थी। अपने आपको घिरा पाकर रूसी कमांडरों को लगा कि युद्ध शुरू हो चुका है। तीन में से दो कमांडर परमाणु हमले के लिए तैयार हो गए, लेकिन तीसरे कमांडर वसिली अर्खिपोव ने अपनी सहमति नहीं दी और युद्ध टल गया।

जब कुत्ते की वजह से भिड़ गए दो देश...

  • सन् 1832 में मैक्सिकन विद्रोहियों ने एक फ्रेंच शेफ की दुकान लूट ली। मैक्सिकन सरकार ने शेफ की मुआवजे की मांग को ठुकरा दिया। इसके बाद शेफ ने फ्रांस सरकार से मदद मांगी। फ्रांस सरकार के अनुरोध पर भी जब मैक्सिकन सरकार नहीं मानी तो फ्रांस ने मैक्सिको को चारों ओर से घेरकर हमला बोल दिया। इसे पेस्ट्री वॉर के नाम से जाना जाता है। जिसमें 250 से अधिक सैनिक मारे गए। अंत में फ्रांसीसी सेना की जीत हुई।
  • 1925 में बुल्गारिया और ग्रीस के बीच एक कुत्ते को लेकर युद्ध लड़ा गया। हुआ यूं कि ग्रीस के एक सैनिक का कुत्ता डेमिरकेपिया की सीमा को पार कर गया। इस सीमा की सुरक्षा बुल्गारिया सेना के हाथ में थी। अपने कुत्ते को वापस लाने के चक्कर में ग्रीस का सैनिक भी सीमा में प्रवेश कर गया और उसे वहां तैनात बुल्गारिया के सैनिकों ने बिना सोचे-समझे मार गिराया। यह घटना पहले से तनाव में चल रहे ग्रीस और बुल्गारिया के बीच 5 दिन तक चले युद्ध का कारण बनी।
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