भास्कर एक्सप्लेनर:देश में बस्तर नक्सलियों का गढ़, यहां के कई इलाकों में सिर्फ इन्हीं का कब्जा; जानिए क्यों यहां मजबूत है नक्सलियों की पकड़?

2 वर्ष पहलेलेखक: आबिद खान
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3 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुए नक्सली हमले में 22 जवान शहीद हो गए। साल 2021 में ये अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला था। इसके साथ ही एक बार फिर नक्सलवाद और उसके खात्मे पर बहस छिड़ गई है। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि नक्सलियों से लड़ाई का ये निर्णायक समय है। छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका नक्सलगढ़ के नाम से जाना जाता है। आइए, समझते है बस्तर क्यों नक्सलियों का गढ़ है।

बॉर्डर और जंगल करते हैं नक्सलियों की मदद

बस्तर डिवीजन घने जंगलों में लगभग 39,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। जानकारों का कहना है कि इसमें से 20,000 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा का इलाका नक्सलियों का प्रभाव है। इस इलाके में पुलिस-प्रशासन की उपस्थिति न के बराबर है। नक्सलियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह होने के साथ-साथ ये इलाका अन्य राज्यों से लगा हुआ भी है। नक्सली यहां वारदात को अंजाम देकर कार्रवाई से बचने के लिए दूसरे राज्यों का रुख कर लेते हैं।

ज्यादातर लड़ाके आदिवासी

बस्तर में काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि नक्सली हमले के लिए गुरिल्ला प्रणाली अपनाते हैं और आदिवासी भी समूह में हमला करने में माहिर होते हैं। यही वजह है कि नक्सलियों को यहां ज्यादा और बेहतर लड़ाके आसानी से मिल जाते हैं। नक्सलियों ने अब तक हुई ज्यादातर वारदातों में गुरिल्ला युद्ध का तरीका ही अपनाया है। हाल ही में जवानों पर हुए हमले में भी नक्सलियों ने पूरे गांव को खाली कराकर जवानों को ट्रैप कर लिया था।

नक्सलियों का सहयोग ग्रामीणों की मजबूरी

दैनिक भास्कर के स्थानीय पत्रकार सत्यनारायण पाठक का कहना है कि आदिवासियों के बीच पैठ बनाने के लिए नक्सलियों ने भ्रष्टाचार को हथियार बनाया। उन्होंने जनअदालत लगाकर आदिवासियों को त्वरित न्याय दिया जिससे आदिवासियों के बीच नक्सलियों की अच्छी छवि बन गई। इसका फायदा नक्सलियों को मिलता है।

साथ ही नक्सलियों में बड़ी संख्या आदिवासियों की भी है। इस वजह से ग्रामीणों को मजबूरी में ही सही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से नक्सलियों का सहयोग करना पड़ता है। आए दिन नक्सली मुखबिरी के शक में ग्रामीणों की हत्या करते रहते हैं। इस वजह से ग्रामीणों के बीच भय का माहौल है और वे सुरक्षाबलों का सहयोग करने से डरते हैं।

पुलिस और सेंट्रल फोर्सेज के बीच तालमेल की कमी

किसी भी इलाके में तैनात की गई सेंट्रल फोर्स इलाके से उतनी अच्छी तरह से परिचित नहीं होती जितनी की स्थानीय पुलिस। स्थानीय जानकारों का मानना है कि कई बार सेंट्रल फोर्सेज स्थानीय पुलिस को साथ लिए बिना ऑपरेशन के लिए निकल पड़ती हैं और नक्सलियों के जाल में फंस जाती हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों में पुलिस और सेंट्रल फोर्सेज ने बेहतर तालमेल के साथ ऑपरेशन को अंजाम दिया है।

संचार और सड़क सुविधा नहीं

इस इलाके में घने जंगल हैं जिस वजह से यहां सड़क और संचार की सुविधा नहीं है। नक्सली यहां विकास कार्यों का विरोध करते रहे हैं। आए दिन सड़क निर्माण में लगी मशीनों को नक्सली आग के हवाले कर देते हैं और ठेकेदारों की हत्या कर देते हैं। साथ ही संचार की सुविधा भी नहीं है। इस वजह से नक्सली हमले की स्थिति में फोर्स को आपस में तालमेल बैठाने या बैकअप बुलाने में परेशानी आती है।

कभी केरल राज्य से बड़ा था बस्तर जिला

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 305 किलोमीटर दूर दक्षिण में बस्तर जिला है। 6000 से भी ज्यादा वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके में लगभग 2000 वर्ग किलोमीटर का इलाका नक्सलियों के कब्जे में है। एक समय ये जिला केरल से भी बड़ा था। बड़े इलाके में आने वाली प्रशासनिक परेशानियों को देखते हुए 1999 में इसमें से दो अलग जिले कांकेर और दंतेवाड़ा बनाए गए। ये जिले भी नक्सल प्रभावित हैं।

पिछले तीन साल में 473 नक्सली मारे गए

फरवरी 2021 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि 2018 से 2020 के दौरान पूरे देश में हुई नक्सली वारदातों में 162 जवानों और 463 आम लोगों की जान गई। इसी अवधि में सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई में 473 नक्सलियों को भी मार गिराया।

भारत में फिलहाल छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश और तेलंगाना को नक्सल प्रभावित राज्यों में गिना जाता है। केंद्र सरकार के आंकड़े कहते हैं कि हाल ही के वर्षों में सबसे ज्यादा नक्सली वारदातें छत्तीसगढ़ में हुई हैं। 2018 से 2020 तक छत्तीसगढ़ में 970 नक्सली वारदातें हुईं जिनमें 228 जवान शहीद हुए।

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