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आज की पॉजिटिव खबर:10वीं पास महिला तीन एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती से सालाना 2 लाख रु. कमा रही मुनाफा, एक हजार महिलाओं को रोजगार से भी जोड़ा

नई दिल्ली2 वर्ष पहलेलेखक: रोहित चावडा

गुजरात के नर्मदा जिले की रहने वाली ऊषाबेन वसावा महज 10वीं तक पढ़ी हैं और बेहद सामान्य परिवार से ताल्लुक रखती हैं। तीन साल पहले उन्होंने अकेले ही 3 एकड़ जमीन से ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की थी। आज वे दर्जनभर से ज्यादा सब्जियां और अनाज उगा रही हैं। साथ ही इसकी प्रोसेसिंग से कई प्रोडक्ट भी तैयार कर रही हैं। इससे वे हर साल दो लाख रुपए मुनाफा कमा रही हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद की तरह कई महिलाओं को ट्रेनिंग भी दी है जो आज खुद के बल पर अपने परिवार की जीविका चला रही हैं।

पहले ट्रेनिंग ली, काम सीखा, फिर शुरुआत की

ऊषाबेन कहती हैं कि घर परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। खेती से उतनी उपज नहीं होती कि घर का खर्च निकाला जा सके। इसी बीच वे नवजीवन आदिवासी महिला विकास मंच से जुड़ गईं। यहां महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही थी। ऊषा भी उसमें शामिल हो गईं और उन्होंने ऑर्गेनिक खेती के बारे में जानकारी लेना शुरू कर दिया। वे कहती हैं कि ट्रेनिंग के दौरान मुझे समझ आया कि गाय के गोबर, गो मूत्र और देसी खाद की मदद से मुनाफे वाली खेती की जा सकती है। इसमें खर्च भी बचेगा और अपनी जमीन भी खराब नहीं होगी।

ऊषाबेन पहले नवजीवन आदिवासी महिला विकास मंच से जुड़ीं, खेती की ट्रेनिंग ली और फिर खुद खेती करना शुरू किया।
ऊषाबेन पहले नवजीवन आदिवासी महिला विकास मंच से जुड़ीं, खेती की ट्रेनिंग ली और फिर खुद खेती करना शुरू किया।

यहां से ट्रेनिंग के बाद ऊषाबेन ने खेती करना शुरू किया। पहले से कोई अनुभव था नहीं, न ही बाजार की जानकारी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले साल ही उन्हें घाटा हुआ। न फसल की उपज अच्छी हो सकी और न ही वो बाजार में बेचने में कामयाब रहीं। हालांकि ऊषा को खुद की ट्रेनिंग पर भरोसा था। उन्होंने हार नहीं मानी और अगले साल सीजन के हिसाब से सब्जियों की खेती की। इस बार प्रोडक्शन भरपूर हुआ। उन्होंने लोकल मार्केट में अपनी सब्जियों की सप्लाई भी शुरू कर दी। इससे उन्हें जल्द ही आमदनी में बढ़ोतरी होने लगी।

ट्रेनिंग देकर दूसरी महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ा

इसके बाद ऊषाबेन का कारवां बढ़ता गया। वे नए-नए प्रयोग करती गईं। उन्होंने अपने गांव और आसपास के इलाके की महिलाओं को भी ऑर्गेनिक खेती की ट्रेनिंग देनी शुरू की। ये महिलाएं भी गरीब परिवार से थीं। अब तक वे एक हजार से ज्यादा महिलाओं को ट्रेंड कर चुकी हैं। ये महिलाएं खेती और फूड प्रोसेसिंग की मदद से अपनी जीविका चला रही हैं। एक महिला बताती है कि हर साल वो एक लाख रुपए की बचत कर लेती है।

ऊषाबेन कहती हैं कि हम लोग पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से खाद तैयार करते हैं। इसलिए हमारी लागत कम हो जाती है।
ऊषाबेन कहती हैं कि हम लोग पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से खाद तैयार करते हैं। इसलिए हमारी लागत कम हो जाती है।

ऊषाबेन कहती हैं कि हम लोग इस हिसाब से प्लानिंग करते हैं कि पूरे साल हमारे खेत से कुछ न कुछ निकलता रहे। इसलिए हम हर सीजन के हिसाब से फल और सब्जियां लगाते हैं। साथ ही अनाज की भी खेती करते हैं। हमारे साथ जो महिलाएं जुड़ी हैं, वो भी अपने खेतों में फसल उगाती हैं। इसके बाद हम कुछ प्रोडक्ट सीधे मार्केट और मंडियों में भेज देते हैं। उसके बाद अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाकर हम अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करते हैं। साथ ही कृषि मेलों में भी हम अपने प्रोडक्ट को बेचते हैं।

नेचुरल तरीके से खेती में लागत कम, बचत ज्यादा

आर्गेनिक खेती के फायदे को लेकर ऊषाबेन कहती हैं कि इससे लोगों को शुद्ध खाने को तो मिलता ही है, साथ ही हमें भी कई लेवल पर मुनाफा होता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि जमीन खराब नहीं होती है। हर साल जमीन की उर्वरकता (फर्टिलिटी) बढ़ती जाती है। दूसरा फायदा ये है कि हम ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं, गोबर और गाय के मूत्र का प्रयोग कीटनाशक के रूप में करते हैं। इससे केमिकल खाद पर होने वाले खर्च से छुटकारा मिल जाता है। साथ ही जो लोग जागरूक हैं, वे ऑर्गेनिक तरीके से उगाए जा रहे प्रोडक्ट को खरीदने में अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं। ताकि गंभीर बीमारियों से बचा जा सके।

ऊषाबेन इलाके की दूसरी महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ रही हैं। उन्होंने एक हजार से ज्यादा महिलाओं को ट्रेंड किया है।
ऊषाबेन इलाके की दूसरी महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ रही हैं। उन्होंने एक हजार से ज्यादा महिलाओं को ट्रेंड किया है।

इसके साथ ही हमें बीज की खरीद के लिए मार्केट जाने की जरूरत नहीं होती है। हम लोग हर साल अपनी उपज से ही कुछ बीज बचा लेते हैं। अगर किसी के पास कोई बीज नहीं है, तो हमारे नेटवर्क में जो लोग शामिल हैं, वे एक-दूसरे की मदद कर देते हैं। इससे बीज का अतिरिक्त खर्च भी बच जाता है।

लोगों से देसी तौर-तरीकों इस्तेमाल करने की अपील

ऊषाबेन कहती हैं कि हम दवा में गोमूत्र का उपयोग कर पंप की मदद से खेतों में उसका छिड़काव करते हैं। इससे कीट मर जाते हैं। गो-मूत्र का असर लंबे समय तक रहता है और फसल कीटों से बची रहती है। इससे प्रोडक्शन भी ज्यादा होता है। साथ ही जमीन को भी नुकसान से बचाया जा सकता है। वे कहती हैं कि देश के बाकी किसानों को भी केमिकल के इस्तेमाल से बचना चाहिए। जल्द से जल्द मुनाफा कमाने की मंशा ठीक नहीं है। धीरे-धीरे काम बढ़ाना और स्थाई काम करना ही फायदेमंद होता है।

अभी ऊषाबेन तीन एकड़ जमीन पर धान, गेहूं और सब्जियों की खेती कर रही हैं। वे सीजन के हिसाब से फसलों का चयन करती हैं।
अभी ऊषाबेन तीन एकड़ जमीन पर धान, गेहूं और सब्जियों की खेती कर रही हैं। वे सीजन के हिसाब से फसलों का चयन करती हैं।

कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं ऊषाबेन

हजारों महिलाओं को प्रेरित करने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के चलते ऊषाबेन को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की तरफ से पंडित दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय कृषि पुरस्कार-2018 से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा, सीआईआई फाउंडेशन फॉर ऑर्गेनिक फार्मिंग एंड वुमन एम्पावरमेंट ने भी उन्हें अवॉर्ड दिया है। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर हाल ही में नर्मदा जिला कलेक्टर ने उन्हें सम्मानित किया था।

गाय के गोबर और मूत्र का उपयोग खेती के लिए कैसे करें?

खाद के लिए गोबर का इस्तेमाल किया जा सकता है। एक एकड़ जमीन के लिए खाद तैयार करने के लिए 20 किलो गोबर, 5 लीटर गौ-मूत्र, एक किलो बेसन, 1 किलो गुड़, 5 किलो मिट्टी की जरूरत होती है। इन सभी को मिलाने के बाद कुछ देर तक इसे सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। फिर इन्हें खेत में मिलाया जाता है।

इसी तरह पेस्टिसाइड्स तैयार करने के लिए 200 लीटर पानी, 5 लीटर गौ-मूत्र, 10 किलो नीम की पत्ती, 2 किलो गोबर की जरूरत होती है। इन सभी को मिलाकर मिश्रण बनाए और छान लें। इस पानी का छिड़काव करने से फसल के रोग व कीट खत्म हो जाते हैं।

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