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हिटलर से लड़ने वाले भारतीय बेटों की कहानी:जंग के बीच घर लौटने से किया मना और मिली शहादत; फिर आज ही के दिन नाजी सेना ने किया था सरेंडर

5 महीने पहलेलेखक: अनुराग आनंद

आज 8 मई यानी रविवार का दिन है। 1945 में आज ही के दिन जर्मनी की सेना ने ऐलाइड पॉवर के आगे हथियार डाल दिए थे। इसी वजह से हर साल इस दिन ऐलाइड पॉवर यानी अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस अपनी पीठ थपथपा कर खुद को नाजियों को हराने की शाबाशी देते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा कि उस युद्ध में अगर भारत और तमाम गुलाम देश इनका साथ न देते तो लड़ाई का क्या अंजाम रहता?

एनवाईटी रिपोर्ट के मुताबिक सेकेंड वर्ल्ड वॉर के नाम पर करीब 6 साल तक चले खून-खराबे में भारत के करीब 25 लाख जवानों ने हिस्सा लिया था। जिनमें से 90 हजार सैनिक शहीद हो गए थे।

आज के भास्कर इंडेप्थ में हम भारत के उन चुनिंदा वीर जवानों के साहस की कहानी बताएंगे जिन्होंने हिटलर और उसके साथ देने वाले देशों की सेना को धूल चटाई थी।

सेकेंड वर्ल्ड वॉर में ऐसे हुई थी भारत की एंट्री
बात 1 सितंबर 1939 की है जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया था। हिटलर के इस दुस्साहस को देखते हुए ब्रिटेन ने भी 3 सितंबर को युद्ध के मैदान में उतरने की घोषणा कर दी। जिसका सीधा असर भारत पर पड़ा। उसी दिन ब्रिटेन से मीलों दूर बसे भारतीयों के लिए गवर्नर जनरल लिनलिथगो ने भारत के जंग में शामिल होने का फरमान जारी कर दिया।

भारतीयों से पूछा नहीं गया बल्कि बता दिया गया कि भारत भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध लड़ेगा। इस आदेश के तुरंत बाद कांग्रेस ने इसकी निंदा की और भारत के समर्थन के बदले आजादी मांगी। सुभाष चंद्र बोस ने घोषणा की अंग्रेजों की ये मुसीबत भारतीयों के लिए आजादी पाने का अवसर है।

ब्रिटेन के सर्वोच्च सेना अवार्ड ‘विक्टोरिया क्रास’ से सम्मानित हुए 17 भारतीय
सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान भारत समेत दुनिया भर के जो बहादूर सैनिक एडोल्फ हिटलर और उनकी सेना के लिए बेचैनी की वजह बन गए थे। जिन्होंने नाजी सेना के रात की नींद चुरा ली थी। उन सैनिकों को इंग्लैंड सरकार ‘विक्टोरिया क्रास’ देकर सम्मानित करती थी।

भारत के एक दो नहीं बल्कि 17 ऐसे वीर जवान थे, जिन्हें इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत और नेपाल की सेना ने कुल ‘विक्टोरिया क्रास’ अवॉर्ड का 15% हिस्सा अपने नाम किया था। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर यास्मीन खान का कहना है कि पूरे यूरोप में भारतीय वीर जवानों के बलिदान और बहादुरी की कहानी बिखरी हुई है।

आज 5 ऐसे ही बहादुर भारतीय जवानों के किस्से को जानते हैं…

घर लौटने से मना कर मिशिलेट माधवन ने बम से उड़ाए थे दो नाजी अफसर
पुडुचेरी के रहने वाले मिशिलेट माधवन महज 28 साल के थे, जब वो नाजी सेना की क्रूरता के शिकार हो गए। दरअसल, पेरिस के सरबोन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करते हुए मिशिलेट की दोस्ती जिन लड़कों से हुई वो फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। इसकी वजह से मिशिलेट भी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए। जब जंग की शुरुआत हुई और जर्मनी की सेना ने हमला किया तो मिशिलेट के पास घर लौटने का मौका था। लेकिन, मिशिलेट ने नाजी सेना के आतंक के खिलाफ लड़ने की ठानी।

मिशिलेट माधवन ने घर लौटने के बजाय हिटलर और उनके सहयोगी सेना के खिलाफ जंग में कूदने का फैसला किया था।
मिशिलेट माधवन ने घर लौटने के बजाय हिटलर और उनके सहयोगी सेना के खिलाफ जंग में कूदने का फैसला किया था।

इसके बाद वह फ्रेंच रेजिस्टेंस मूवमेंट का हिस्सा बने और हिटलर और उनके सहयोगी सेना के खिलाफ हो रही जंग में कूद गए। उन पर एक थियेटर में हुए बम धमाका करने और अंडरग्राउंड रहकर जर्मनी के खिलाफ काम करने के आरोप लगे थे। माना जाता है कि जिस बम धमाके के पीछे मिशिलेट थे उस में दो नाजी अफसर मारे गए थे। जिसके चलते नाजी सेना ने 9 मार्च 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।

गिरफ्तारी के बाद मिशिलेट को पेरिस में बने एक कंसंट्रेशन कैंप में काफी समय तक टॉर्चर किया गया और बाद में हत्या कर दी गई। इस तरह मिशिलेट भले ही क्रूर नाजी सैनिकों के हाथों मारे गए हों, लेकिन वह हमेशा के लिए अमर हो गए।

न सिर्फ नाजियों के खिलाफ बल्कि माधवन फ्रांस में रहते हुए भारत की आजादी के लिए भी तरह-तरह से लड़ाई लड़ रहे थे। काफी समय से भारत के इस शहीद को पहचान दिलाने और उनके नाम पर स्मारक बनवाने की मांग उठ रही है।

कमांडिंग अधिकारी को घायल देश शेर की तरह टूट पड़े प्रकाश सिंह चिब
1945 में प्रकाश सिंह चिब करीब 32 साल के थे। बर्मा में उनकी तैनाती ब्रिटिश सेना के 14वीं बटालियन में की गई थी। जंग के दौरान उनके घुटने पर गोली लगी। गोली लगने के बाद वह खड़े नहीं हो पा रहे थे। उनकी इस हालत के चलते उन्हें सुरक्षित जगह पर ले जाया गया। तभी उनकी बटालियन का नेतृत्व कर रहे कमांडिंग अधिकारी को गोली लगी और वह जमीन पर गिर गए।

कमांडिंग अधिकारी को घायल देश शेर की तरह टूट पड़े प्रकाश सिंह चिब
कमांडिंग अधिकारी को घायल देश शेर की तरह टूट पड़े प्रकाश सिंह चिब

अपने कमांडिंग अधिकारी को घायल देख घायल प्रकाश सिंह चिब घायल हालत में भी गुस्से में उठ खड़े हुए। उन्होंने एक बार फिर से अपनी पोजिशन संभाली, घंटों तक चिब दीवार की तरह जापानी सेना के आगे खड़े रहे थे। चिब को देख बटालियन के जवानों में हौसला लौट आया। लेकिन, आखिर में चिब शहीद हो गए।

फजल दिन ने शरीर में धंसे तलवार को निकालकर दुश्मन के शरीर में घोंप दिया
1945 में फजल दिन सिर्फ 23 साल के थे, जब वह दुश्मन सेना के खिलाफ बहादुरी से लड़े। 10 बलूच रेजिमेंट के 7वीं बटालियन में उनकी तैनाती थी। बर्मा में पोस्टिंग के दौरान नाजी सेना के एंबुश में उनकी पूरी बटालियन तीन बंकरों के बीच फंस गई थी। इसके बाद बिना एक सेकेंड भी देर किए दिन ने एक बंकर पर ग्रेनेड फेंककर हमला कर उसे तबाह कर दिया।

इस दौरान दूसरे बंकर से हो रही हैवी फायरिंग से बचने के लिए उनके साथी को भागने का रास्ता मिल गया। दिन ने अपने साथियों को बचाने के लिए भागने की बजाए डट कर सामना करने का फैसला किया। तभी एक दुश्मन सेना ने तलवार से दिन पर हमला कर दिया। खून से लथपथ होने के बावजूद दिन ने उसी तलवार से दुश्मन को मौत के घाट उतार दिया। घायल होते हुए भी दिन ने कई दुश्मन सैनिकों को मार डाला था।

घायल फजल दिन ने अपने शरीर से तलवार निकाल कर दुश्मन पर जोरदार हमला किया। जिसमें उसकी मौत हो गई।
घायल फजल दिन ने अपने शरीर से तलवार निकाल कर दुश्मन पर जोरदार हमला किया। जिसमें उसकी मौत हो गई।

सामने से दुश्मन नहीं टिक पाए तो दूर छिपे स्नाइपर ने यशवंत को मारी गोली
22 साल के यशवंत गाडगे महाराष्ट्र लाइट इंफेंट्री में नायक के पद पर तैनात थे। इटली की टिबर वैली में एक दिन उनकी बटालियन पर हैवी फायरिंग शुरू हो गई। जिसमें उनके कई सैनिक शहीद हो गए। चारों तरफ से हो रही ताबड़तोड़ गोलीबारी के बीच यशवंत गाडगे अपने साथियों को बचाने के लिए ढाल बनकर दुश्मनों के सामने खड़े हो गए। गाडगे ने भागकर एक मशीन गन पकड़ी और ग्रेनेड से दुश्मन सेना पर ताबड़तोड़ हमला किया।

उनके लगातार हमले के बाद भी दुश्मन सेना के दो सैनिक उनकी तरफ बढ़ रहे थे। उनको अपनी गन रिलोड करने का मौका नहीं मिल पाया। इस हालात में दोनों से निपटने के लिए गाडगे ने उस बंदूक से ही दोनों के सिर पर वार कर दिया। लेकिन, युद्ध के मैदान में मौत कहीं से भी आ सकती है। गाडगे को सामने से नहीं हरा पा रहे दुश्मन के स्नाइपर ने गाडगे को गोलियों से छलनी कर दिया। इस तरह लड़ते-लड़ते यह वीर भारतीय सपूत जंग की मैदान में शहीद हो गया।

यशवंत गाडगे की ये पुरानी तस्वीर भारत के वीर सपूत की कहानी को बयां करने के लिए काफी है। लड़ते-लड़ते यह वीर भारतीय सपूत जंग की मैदान में शहीद हो गया तो बाद में ‘विक्टोरिया क्रास’ सम्मान मिला।
यशवंत गाडगे की ये पुरानी तस्वीर भारत के वीर सपूत की कहानी को बयां करने के लिए काफी है। लड़ते-लड़ते यह वीर भारतीय सपूत जंग की मैदान में शहीद हो गया तो बाद में ‘विक्टोरिया क्रास’ सम्मान मिला।

मशीनगन की गोली के आगे भी दीवार बनकर खड़े रहे राव अब्दुल हाफिज
18 साल के राव अब्दुल हाफिज खान 9वीं जाट रेजिमेंट में जमादार के रूप में ब्रिटिश भारतीय सेना में तैनात थे। अप्रैल 1944 में अब्दुल हाफिज और उनके बटालियन की तैनाती इम्फाल में थी।

पहाड़ पर चढ़ाई के दौरान अचानक से नाजी सेना ने अब्दुल हाफिज की बटालियन पर जानलेवा हमला कर दिया। बिल्कुल खड़ी पहाड़ी पर चढ़ते वक्त दुश्मन सेना ने उनपर ताबड़तोड़ हमला की। लेकिन, फिर भी वो आगे बढ़े और दुश्मन के बंकर तक पहुंच गए। राव ने सामने से ग्रेनेड फेंककर दुश्मन के बंकर को तबाह कर दिया था।

उन्होंने अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए दुश्मनों को ललकारा। जंग के दौरान मशीनगन की गोली से घायल होकर राव जमीन पर गिर गए। जब तक जिंदा रहे राव की उंगली ट्रिगर पर टिकी रही।