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मेगा एम्पायर:हर मिनट 11.54 लाख रुपए का मुनाफा, हर ढाई साल में निवेशकों के पैसे दोगुने करने वाला रिलायंस समूह

एक महीने पहले
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जितनी देर में आप यह खबर पढ़ेंगे, रिलायंस समूह करीब 33 लाख रुपए का मुनाफा कमा चुका होगा। दरअसल, रिलायंस ने पिछले फाइनेंशियल ईयर यानी 2021-22 में 60 हजार 705 करोड़ रुपए का नेट प्रॉफिट हासिल किया…यानी प्रति मिनट 11.54 लाख रुपए। लगभग 50 साल पुराने इस समूह की सफलताओं का राज है इसकी युवा सोच।

मुकेश अंबानी अक्सर अपने पिता धीरूभाई की एक बात दोहराते हैं- ‘रिलायंस की औसत उम्र हमेशा 30 साल रखना।’ मुकेश इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि भारत युवाओं का देश है और बिजनेस बढ़ाने के लिए सोच, कार्यशैली और हर स्तर पर अपनी उम्र 30 रखनी होगी। यही वजह है कि रिलायंस जियो के बोर्ड में अब 30 साल के आकाश चेयरमैन बन गए हैं। अगला नंबर ईशा और अनंत का है।

पॉलीएस्टर, ऑइल रिफाइनिंग से लेकर पेट्रोकेमिकल्स, ई-कॉमर्स, ग्रीन एनर्जी, इंटरनेट और अब रिटेल के रूप में देश पर राज कर रही रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड का मार्केट कैप शुक्रवार को बाजार बंद होने तक 16 लाख 29 हजार 596 करोड़ रुपए था।

आज मेगा एम्पायर में जानिए रिलायंस के बारे में…

1000 रुपए की जमापूंजी से शुरू हुआ था बिजनेस, ऑफिस के नाम पर सिर्फ एक टेबल-कुर्सी थी...

धीरूभाई की बात किए बिना रिलायंस को पूरी तरह नहीं समझ सकते। जूनागढ़ के चोरवाड़ में पैदा हुए धीरूभाई (धीरजलाल हीराचंद अंबानी) महज दसवीं तक पढ़े थे, पर बिजनेस रगों में था, तो 1948 में यमन चले गए। अदन में धीरूभाई के बड़े भाई माणिक चंद फ्रेंच कंपनी में काम करते थे। धीरूभाई ने भी वहां पेट्रोल पंप पर काम करने से लेकर सिक्के पिघलाकर पैसे कमाए। फिर 1958 में धीरूभाई पत्नी कोकिला और दो साल के बेटे मुकेश के साथ भारत आ गए। महज एक हजार रुपए की जमापूंजी और एक टेबल रखकर धीरूभाई ने बिजनेस की शुरुआत की। इसके बाद अहमदाबाद के पास कपड़ा मिल शुरू की।

अब बात 1977 की करते हैं, जब रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज पैसा जुटाने के लिए शेयर मार्केट में उतरी। आज की तरह उस समय आईपीओ को लेकर उतना क्रेज नहीं था। फिर भी शेयर्स की सात गुना मांग रही। नौ साल बाद निवेशकों को धन्यवाद देने का मौका आया। 1986 में कंपनी के शेयरधारकों की सालाना मीटिंग में 30 हजार निवेशक शामिल हुए। भारत के कॉरपोरेट इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में लोग पहले कभी शामिल नहीं हुए थे। मार्केट कैप के हिसाब से रिलायंस आज देश की सबसे बड़ी कंपनी है। खास बात है कि कंपनी पूरी तरह से कर्जमुक्त यानी डेट फ्री (Debt Free) है।

रिलायंस... नाम में ही सबकुछ रखा है...

रिलायंस का मतलब ही है भरोसा। धीरूभाई ने यह नाम अपने दोस्त प्रवीणभाई ठक्कर से लिया था। प्रवीणभाई का रिलायंस नाम से बिजनेस था और ये चल पड़ा था। फिर धीरूभाई ने रिलायंस नाम के साथ कारोबार आगे बढ़ाया।

रिलायंस की शुरुआत मसाले से हुई मगर पॉलिएस्टर ने बनाया किंग

यमन में धीरूभाई, चंपकलाल दमानी के साथ काम करते थे। 1958 में भारत लौटे तो चंपकलाल के साथ ही रिलायंस कमर्शियल कॉरपोरेशन पार्टनरशिप फर्म की स्थापना की। शुरुआत में मसाले जैसे आइटम मध्य और पूर्वी अफ्रीका में निर्यात किए थे। साठ के दशक के बीच में कपड़े और हाथ से बने कपड़ों के व्यापार पर ध्यान केंद्रित किया।

60-70 के दशक के बीच में धीरूभाई पॉलिएस्टर के व्यापार में बड़ा नाम बन गए थे। 1966 में धीरूभाई ने रिलायंस टेक्सटाइल इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाई। इसी साल अहमदाबाद के पास कपड़ा मिल शुरू की। 1969 में रिलायंस एक्सपोर्ट कंपनी, 1973 में विमल फैब्रिक्स और 1975 में अनिल फैब्रिक्स, दीप्ती टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज और नीना टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज की स्थापना की।

रिलायंस : पॉलिएस्टर बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी

विमल, धीरूभाई के बड़े भाई रमणीकलाल के बेटे का नाम था। विमल 70 के दशक में ब्रांड बन गया था ‘ओनली विमल’ स्लोगन बनाया था। देश की टॉप क्लास होटल्स में इसकी ब्रांडिंग की जाती थी। 1991 में हजीरा प्लांट शुरू होने के साथ ही रिलायंस पॉलिएस्टर बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बन गई।

रिलायंस दूरदर्शी सोच और सही समय पर सही निर्णय के चलते सफल कारोबारी समूह है...

रिलायंस दिनोंदिन सफलता के पैमाने चढ़ती जा रही थी। फैब्रिक से लेकर तेल तक रिलायंस के पास अवसरों का भंडार था। मुकेश अंबानी कहते हैं कि 90 के दशक के आखिर में हमारे पास दो विकल्प थे। पॉलिएस्टर, प्लास्टिक, रिफाइनरी, ऑइल और गैस के बिजनेस को विस्तार देते हुए वैश्विक स्तर पर ले जाएं। या दूसरा कि अपने कैश फ्लो का इस्तेमाल करते हुए दूसरे बिजनेस में कदम रखें।

धीरूभाई ने निर्णय मुकेश पर छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि कैश फ्लो का इस्तेमाल करोड़ों भारतीयों की जिंदगी बदलने के लिए होना चाहिए। भविष्य तुम्हें चुनना है। और इस तरह आगे की रणनीति तय हुई कि वर्तमान बिजनेस को मजबूत करते हुए भविष्य के व्यापार पर भी निवेश करेंगे।

इस तरह भविष्य के व्यापार यानी इंफोकॉम की स्थापना हुई। मुकेश अंबानी कहते हैं कि 1990 के दशक में हम सेल्युलर लाइसेंस की बोली लगाकर इस क्षेत्र में दाखिल हुए, पर मुझे महसूस हुआ कि असली वैल्यू तो सूचना और कम्युनिकेशन को मिलाने से ही पैदा होगी। इसलिए हमने बिजेनस वेंचर का नाम इंफोकॉम रखा।

पिता की मौत के बाद रिलायंस परिवार में हुआ बंटवारा

साल 2002 में धीरूभाई की मौत के बाद दोनों भाइयों को अरबों की संपत्ति विरासत में मिली। धीरूभाई अपने पीछे कोई वसीयतनामा नहीं छोड़ गए थे। धीरूभाई अंबानी के निधन के कुछ समय बाद ही यह प्रश्न उठने लगा कि इतने बड़े रिलायंस के साम्राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा। इसके बाद मुकेश और अनिल के बीच दूरियां बढ़ती गईं।

मुकेश अंबानी 1981 और अनिल अंबानी 1983 में रिलायंस से जुड़े थे। जुलाई 2002 में धीरूभाई अंबानी के निधन के बाद मुकेश अंबानी रिलायंस ग्रुप के चेयरमैन बने। अनिल मैनेजिंग डायरेक्टर बने। नवंबर 2004 में पहली बार मुकेश और अनिल का झगड़ा सामने आया। जून 2005 में दोनों के बीच बंटवारा हुआ।

लेखक हेमिश मैक्डोनाल्ड ने अपनी किताब ‘अंबानी एंड संस’ में खुलासा किया कि जब 2002 के बाद मुकेश अंबानी रिलायंस इंडस्ट्री के चेयरमैन बने थे, तब छोटे भाई अनिल को मुकेश अंबानी से मिलने के लिए उनके सचिव से समय लेना होता था। जो अक्सर नहीं मिलता था। घर पर मुकेश कारोबार की कोई बात ही नहीं करते थे।

बंटवारे के बाद 15 साल में मुकेश की नेटवर्थ 9 गुना बढ़ी, अनिल की जीरो हुई

जून 2005 में बंटवारा तो हो गया, लेकिन किस भाई को कौनसी कंपनी मिलेगी इसका बंटवारा 2006 तक हो पाया था। बंटवारे के बाद मुकेश के हिस्से में पेट्रोकेमिकल के कारोबार रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडियन पेट्रो केमिकल्स कॉर्प लिमिटेड, रिलायंस पेट्रोलियम, रिलायंस इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड जैसी कंपनियां आईं।

छोटे भाई ने अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप बनाया। इसमें आरकॉम, रिलायंस कैपिटल, रिलायंस एनर्जी, रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेस जैसी कंपनियां थीं। रिलायंस ग्रुप का बंटवारा होने से पहले तक मार्च 2005 में मुकेश और अनिल की ज्वाइंट नेटवर्थ 7 अरब डॉलर थी। उसके बाद 2006 से लेकर 2008 तक तो दोनों भाइयों की नेटवर्थ में ज्यादा अंतर नहीं था।

फिर 2009 में आर्थिक मंदी आई और पूरा खेल बदल गया। दुनियाभर के अमीरों की संपत्ति में गिरावट दर्ज की गई। मुकेश और अनिल अंबानी की संपत्ति में भी बड़ा फर्क यहीं से आना शुरू हुआ। 2008 में मुकेश 5वें और अनिल 6वें नंबर पर थे। लेकिन, 2019 आते-आते अनिल अंबानी तो अरबपतियों की लिस्ट से बाहर ही हो गए। 2006 से लेकर अब तक मुकेश अंबानी की नेटवर्थ में 9 गुना से ज्यादा का इजाफा हुआ है। जबकि, फरवरी 2020 में ब्रिटेन की एक कोर्ट में अनिल कह चुके हैं कि उनकी नेटवर्थ जीरो है और वो दिवालिया हो चुके हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी भी रिलायंस समूह के पास

गुजरात के जामनगर में मौजूद रिलायंस की रिफाइनरी दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है। 25 दिसंबर 2008 में रिलायंस पेट्रोलियम लिमिटेड ने कंपनी चालू करने की घोषणा की थी। यह रिफाइनरी 7500 एकड़ में फैली हुई है और न सिर्फ आधुनिक सुविधाओं से लैस है, बल्कि यह प्राकृतिक सुंदरता से भी भरपूर है।

दुनिया के तीसरे सबसे बड़े मोबाइल नेटवर्क ऑपरेटर ‘जियो’ की कहानी

2012 में रिलांयस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव्स से वीडियो कांफ्रेंसिंग करते हुए मुकेश अंबानी ने अपनी बात एक चेतावनी के साथ शुरू की- ‘जो चीज हमें यहां लेकर आई है, वो हमें भविष्य की ओर नहीं ले जाएगी।’ मुकेश का इशारा ऑइल की ओर था। वे चिंतित थे कि रिन्यूएबल एनर्जी के दौर में और बढ़ते वैश्विक टेंशन के समय में पेट्रोकेमिकल, क्रूड ऑइल का बिजनेस उन्हें भविष्य का लीडर नहीं बना सकता। साथियों से बात करते हुए मुकेश अंबानी के दिमाग में एक प्लान था। दरअसल 2011 में मुकेश अंबानी की बेटी ईशा छुटि्टयों में घर आई थीं। ईशा येल यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थीं। ईशा ने स्लो इंटरनेट की शिकायत की। और यहीं से जियो की शुरुआत हुई।

रिलायंस में 900 से ज्यादा वैज्ञानिक हैं, 51 फीसदी कर्मचारियों की औसत उम्र 30 साल

धीरूभाई अंबानी की दी हुई सीख- ‘दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को अपने साथ जोड़ो’ मुकेश अंबानी हमेशा साथ रखते हैं। कर्मचारियों की संख्या के हिसाब से यह निजी क्षेत्र में टाटा समूह के बाद दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है। रिलायंस में अभी 2,30,000 लोग काम कर रहे हैं। रिलायंस के कर्मचारियों की औसत उम्र 30 साल है। समूह के 51 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी 30 साल से कम के हैं। रिलायंस ने बीते साल 2021 में रिसर्च और डेवलपमेंट पर 2500 करोड़ रुपए खर्च किए। रिलायंस के साथ फिलहाल 900 से ज्यादा शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों की टीम जुटी हुई है।

42 साल में निवेशकों के 10 हजार रु. हो गए 2.1 करोड़ रु.

1977 में रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज का आईपीओ बाजार में आया। 2017 की एजीएम मीटिंग में मुकेश अंबानी ने बताया था कि जिन निवेशकों ने 1977 में रिलायंस के एक हजार रुपए के शेयर खरीदे थे, 2017 में उनकी वैल्यू 16.50 लाख रुपए हो चुकी थी। इस हिसाब से अगर किसी ने 10 हजार रुपए का निवेश किया था, तो उसकी कीमत 2.1 करोड़ रुपए हो चुकी थी। अपनी स्थापना के बाद से रिलायंस के शेयर 2,09,900 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। मुकेश अंबानी ने इसी एजीएम में बताया था कि रिलायंस पिछले 40 साल से लगातार अपने निवेशकों का पैसा औसतन ढाई साल में डबल कर रही है।

रिलायंस के युवा चेहरे...

ईशा और आकाश अंबानी ने रिलायंस जियो और रिलायंस रिटेल बोर्ड 2014 में जॉइन किया था। ग्रैजुएट होने के महज चार दिन बाद ही आकाश ने कंपनी जॉइन कर ली थी।

आकाश अंबानी चेयरमैन-रिलायंस जियो..

पिछले कुछ सालों में आकाश और ईशा के नेतृत्व में रिलायंस ने 15 से ज्यादा कंपनियों का एक्विजिशन किया है। आकाश जियो स्ट्रेटजी टीम का हिस्सा हैं और जियो मार्ट के तकनीकी पक्ष को भी देखते हैं।

अनंत अंबानी...

शुरुआत जियो से ही की थी। ब्राउन यूनिवर्सिटी से पढ़े अनंत रिलांयस के दूसरे बिजनेस में ऑपरेशन गतिविधियों को देख रहे हैं।

ईशा अंबानी...

फैशन पोर्टल अजियो के पीछे इन्हीं का हाथ है। स्टैनफोर्ड और येल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाली ईशा रिलायंस जियो और रिलायंस रिटेल की ब्रांडिंग बॉस हैं। रिलायंस आर्ट फाउंडेशन की भी स्थापना की है।

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