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महिला पत्रकार के लिए दारुल उलूम के मायने:औरतों पर पाबंदियों की लंबी फेहरिस्त; ऐसा लिबास पहनें जिससे जिस्म पर बने उभार जाहिर न हों, तालीम लें लेकिन मर्दों से अलग

3 दिन पहले
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दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में बसे देवबंद में स्थित इस्लामी तालीम के केंद्र दारुल उलूम में जाते हुए मैंने खुद को एक बार नहीं कई बार आईने में देखा। अपनी अलमारी के सबसे बंद कपड़ों को निकालकर उन्हें इस्त्री करने के बाद दुपट्टे के साथ खुद को अपनी कोशिश भर पूरा ढंका। मुझे पता था कि इस्लामिक कानून 'शरिया' की राह में चलने वाले एक मजहबी संस्थान में जा रही हूं। दारुल उलूम के दरवाजे पर पहुंचकर बेख्याली में ही दुपट्टे को मैंने फैलाकर ऐसे डाला कि मानो मैं अपने आपको छिपाने की कोशिश कर रही हूं। मुझे शायद यह ध्यान था कि शरिया में औरतों को बंद कपड़े पहनने के निर्देश दर्ज हैं।

खैर, मेरे लिए दरवाजा खुला और दारुल उलूम के एक पदाधिकारी का साथ मुझे मिला। उनकी मेहमान नवाजी काबिल-ए तारीफ थी, लेकिन दारुल उलूम में घूमते हुए शरिया लॉ से जुड़े मेरे सवाल और उनके जवाब मेरे औरत होने की आजादी और वजूद पर हर बार पाबंदी बनकर बरसते रहे। पूरे सात घंटों के इस सफर में 'यह जनाब' मेरे साथ थे। सच कहूं तो पाबंदी की तरह! दारुल उलूम में किसी से बात न करने की ताकीद पहले ही मुझे कर दी गई थी। मैंने इन जनाब से ही सवाल करने शुरू किए।

हर बार मैं एक सवाल पूछती और हर जवाब मेरे व्यक्तित्व पर कोड़े की तरह बरसता। मैंने दारुल उलूम के प्रिंसिपल अरशद मदनी से लेकर चोरी छिपे कुछ लोगों से भी औरतों को लेकर इस्लामिक कानून और उनकी राय को टटोलने की कोशिश की, लेकिन सबकी राय भी वही थी जो इन 'जनाब' और मौलाना अरशद मदनी की। मेरे मेहमान-नवाज दोस्त ने जो भी बताया वह सहज बातचीत के दौरान बताया। लिहाजा नाम लिखना पत्रकारिता के उसूल के खिलाफ होगा, लेकिन दारुल उलूम में बिताए गए वक्त में कई दफा मैंने अपने कपड़ों, अपने पेशे और जीवन के हर हिस्से पर चुभने वाले सवालों को महसूस किया।

शरिया लॉ औरत होने की जिस्म पर बनी हर निशानी के जाहिर होने पर पाबंदी लगाता है तो मर्दों के साथ उनके पढ़ने और काम करने पर उनके चरित्र पर भी सवाल उठाता है। दारुल उलूम के भीतर ऊपर बताए गए जिन 'जनाब' से मेरी मुलाकात हुई उन्होंने वहां की पहली चाय के दौरान पूछे गए मेरे पहले सवाल का जो जवाब दिया उससे चाय का घूंट मेरे हलक में अटक सा गया।

मैंने पूछा-शिक्षा के इतने बड़े केंद्र में केवल मर्द ही क्यों, औरतें क्यों नहीं? 5 दशक से भी ज्यादा पुराने इस संस्थान में अब तक औरतों के दाखिले पर कोई बात क्यों नहीं हुई? जो जवाब मिला वह दरअसल औरतों के चरित्र पर तो बड़ा सवाल था ही साथ ही इंसानों पर जानवरों की तरह यौन प्रवृत्ति को न रोक पाने का आरोप भी था।

जवाब था-औरतों के लिए और भी संस्थान हैं, वहां मजहबी शिक्षा दी जाती है। इस्लाम में औरत और मर्द साथ नहीं पढ़ सकते। इस तरह से औरतों के 'राह रवी' होने का खतरा बना रहता है। दोनों के ताल्लुक बन जाते हैं। औरत और मर्द साथ पढ़ेंगे और काम करेंगे तो यह मुमकिन ही नहीं कि वे सिर्फ अपना काम करते रहें। मैंने जैसे ही यह कहने की कोशिश की कि ऐसा जरूरी तो नहीं, उन्होंने मिसाल के तौर पर अपने एक दोस्त का किस्सा कह सुनाया कि कैसे एक औरत के साथ काम करते हुए एक दिन अचानक उनके 'ताल्लुक' बन गए थे।

लिहाजा इस निजी अनुभव के आधार पर हुए शोध के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि औरतों और मर्द का साथ कतई वाजिब नहीं। मैंने उनसे सवाल किया, अभी कुछ ही दिनों पहले तालिबानियों ने भी तो औरतों और मर्द को साथ न पढ़ने की पाबंदी का फरमान सुनाया था। क्या आप उनके इस फरमान से सहमत हैं? वे थोड़ा झल्लाकर बोले, देखिए मैं बस शरिया लॉ की बात करता हूं।

हम साथ घूम रहे थे, लिहाजा घर परिवार का जिक्र भी साथ-साथ चल ही रहा था। उनकी बेगम का फोन आया तो वे उनके बारे में बात करते हुए सहज ही मुझसे बोले, आप खुद एक खातून हैं, बुरा मत मानिए पर औरत कितना भी पढ़-लिख जाए लेकिन आईक्यू मर्द से कम ही रहती है। मेरी पत्नी मुझसे ज्यादा पढ़ी-लिखी है, पर दिमाग मुझसे कम है। मैंने उनकी तरफ देखा और पूछा आप इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे? जवाब मिला-रोजाना की हरकतों से। यकीन मानिए यह हंसी-मजाक नहीं था, एक बार फिर उनके निजी अनुभव के निष्कर्ष से बनी उनकी सख्त राय थी। हर जवाब मानो मेरे सवाल पर अंगारे की तरह बरसता और मैं उसे चुपचाप सहन करती, क्योंकि मैं जानती थी कि मेरा हस्तक्षेप उनके सहज निष्कर्षों पर असर डाल सकता है। मुस्कुराकर मैंने उनकी इस राय का जवाब दिया।

खैर, अब तक उन जनाब के पास मौलाना मदनी का बुलावा भी आ गया था। मैं आतुर थी 'इस्लामिक स्कॉलर' की राय जानने के लिए। मुद्दा केवल औरत नहीं बल्कि अफगानिस्तान में तालिबान के शासन से लेकर दारुल उलूम की 'तालीम' भी था। कई सवालों से गुजरते हुए मैंने उनसे भी पूछा कि औरतें तालिबान के भीतर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। आपका शरिया क्या इसकी इजाजत देता है? उधर से जवाब आया, पर्दे के साथ विरोध कर सकती हैं।

लेकिन, इसके बाद उन्होंने औरतों के कपड़ों और साज सज्जा पर जो कमेंट किया उसे ध्यान से सुनना और पढ़ना जरूरी है- कपड़े ढीले ढाले हों ताकि औरतों के जिस्म में बने उभार जाहिर न हों। आंख और मुंह दिखा सकती हैं, लेकिन लिपस्टिक और क्रीम न लगाएं तब। जमाल और हुस्न जाहिर करना कतई जायज नहीं।

उनके जवाब ने एक बार फिर मुझे मेरे लिबास की तरफ ध्यान खींचने पर मजबूर किया। मैं कोशिश के बाद भी इतने ढीले कपड़े नहीं पहन पाई थी जिससे मेरे औरत होने की हर निशानी मिट जाए। सिर ढंका नहीं था। जाहिर है क्रीम और लिपस्टिक की हल्की सी ही सही पर एक परत तो मैंने भी इस्लाम को चोट पहुंचाने के ख्याल के बिना लगाई तो थी। खैर, बात आगे बढ़ी-शरिया औरतों के पेशावर होने पर क्या कहता है?

मौलाना के जवाब ने थोड़ी देर के लिए मुझे राहत की सांस दी, लेकिन दूसरे ही पल पाबंदी का फिर एक पैबंद उसमें चढ़ा दिया। जवाब था, 'औरतें चाहें तो कुछ भी कर सकती हैं, बशर्ते वे मर्दों की संगत में सीधे न आएं और अपने जिस्म को जाहिर न करें। बेहयाई इस्लाम में नजायज है।' मैं एक बार फिर संकोच और गुस्से से भर गई। पर, चुप रही। वजह अपने मकसद से न भटकना।

तालिबानी विरोध करने पर औरतों पर कोड़े बरसा रहे हैं, आप क्या कहेंगे, शरिया इसकी इजाजत देता है? झल्लाहट भरा जवाब मिला, 'मैं नहीं जानता वहां क्या हो रहा। मैं खबरें नहीं पढ़ता।' लेकिन लाइब्रेरी में घूमते हुए वहां के एक छात्र से जब मैंने इस बात का जिक्र किया तो उसने कहा, 'हमें नहीं पता कि क्या सच है और क्या झूठ, लेकिन औरतों पर अगर वे कोड़े बरसा रहे हैं तो यह गलत है।' शरिया कभी नहीं कहता कि औरतों पर जुल्म करो। नौजवान पीढ़ी के उस लड़के का यह सवाल रेगिस्तान में ठंडी बौछार की तरह मेरे मन को सराबोर कर गया।

खैर, मैंने मौलाना से फिर सवाल किया, क्या आपका शरिया औरतों को खेल कूद की इजाजत देता है? जवाब सुनकर फिर मेरा दिल धड़कने लगा। 'मर्दों के सामने दौड़ना-भागना औरतों के लिए कतई जायज नहीं। फिर खेलकूद के वक्त पर्दा करना भी मुमकिन नहीं होगा। जैसे कपड़ों के साथ खेलकूद होता है वो इस्लाम में औरतों के लिए 'हराम' हैं।

खैर, मैं मौलाना से इंटरव्यू पूरा कर फिर उन जनाब के साथ थी। क्या औरतों के बिना मर्द बाहर निकलने की शरिया इजाजत देता है? उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराए, 'अगर बहुत जरूरत हो तो ठीक है। पर, अपने शौहर या किसी जिम्मेदार मर्द के साथ ही निकलें तो 'ज्यादा' ठीक रहेगा। अब मुझसे रहा नहीं गया। मैंने कहा, तो मेरा यूं दारुल उलूम आना बिना किसी मर्द के गैर इस्लामी होगा? आप इस्लाम की नहीं हैं, लेकिन फिर भी अकेले न आतीं तो बेहतर होता। और क्या हिंदू धर्म में घूंघट की बात नहीं कही गई है? मेरा जवाब था, पर हिंदू धर्म में पर्दा प्रथा को एक जमाने के बाद कुरीति भी माना गया।

जाहिर है आज भी पर्दा है, लेकिन उसके खिलाफ कई आवाजें भी हैं। और, पहली आवाज एक मर्द की ही थी। इस्लाम में यह आवाज कब उठेगी? आप कभी इसके खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे क्या? उन्होंने कहा, आप जिसे पाबंदी मानती हैं इस्लाम उसे 'हया' मानता है। मेरे सवाल अब खत्म थे क्योंकि जिन जवाबों के लिए मैं गई थी, वे सारे जवाब मेरे पास थे।

दारुल उलूम के भीतर कुछ औरतें दारुल उलूम को देखने आई थीं, लेकिन शरिया लॉ के हर हुक्म के साथ। ढीले-ढाले लिबास, साथ में शौहर और बुर्का भी। लिपस्टिक, क्रीम का पता नहीं। चेहरा ढंका था इतनी बारीकी से उन्हें देखना मुमकिन नहीं था, लेकिन बगल से निकलते हुए धीरे से मैंने एक मोहतरम से पूछ ही डाला आप दारुल उलूम देखने आई हैं। महीन आवाज में जवाब मिला-हां। साथ में शौहर हैं। जी...उनके साथ परिवार के और भी लोग हैं। उधर से सवाल उछला, आप शायद मुस्लिम नहीं। मैंने कहा जी नहीं, मैं हिंदू हूं। उधर से हंसती हुई आवाज आई तभी बिना बुर्का यहां आने की हिम्मत कर बैठीं। कहां से आई हैं? जवाब दिया दिल्ली से। कब तक हैं यहां? आज ही रात तक लौट जाऊंगी। चलते-चलते वह मोहतरमा रुक गईं। इतनी रात अकेले! शाम के तकरीबन साढ़े पांच बजे थे। दारुल उलूम में तालीम लेने लड़के दाखिल हो रहे थे।

मैं बाहर निकल रही थी, जेहन में तस्वीर उभर रही थी अमेरिका की उस रिपोर्टर की, जो अपने मनपसंद और आजाद ख्याल कपड़ों को छोड़कर अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के बाद बुर्के में नजर आई थी। सोच रही थी, अफगानिस्तान में विरोध में खड़ी उन औरतों के बारे में जो शरिया लॉ के सरपरस्त तालिबानियों के सामने आवाज उठाने की हिम्मत जुटा पाईं। और उन औरतों का ख्याल भी किया जो ताउम्र अपने औरत होने की निशानियों को छिपाने के लिए मजबूर हैं। सानिया मिर्जा के रैकेट के उन झटकों को भी महसूस कर रही थी जो रह-रहकर इन फरमानों पर पड़ते होंगे। उसकी स्कर्ट पर उठने वाले एतराज के बाद दिए गए फतवे का ख्याल भी मेरे जेहन में बिजली की तरह कौंधा।

दारुल उलूम से बाहर निकलते ही सबसे पहले मैंने उस दो फीट के दुपट्टे को फेंका जो भीतर बिताए घंटों के दौरान फंदे की तरह लिपटा रहा। फंदे की तरह इसलिए नहीं कि दुपट्टा पहली बार मैंने पहना! इसलिए क्योंकि औरतों के लिए इस्लाम के हुक्म मेरे उस दुपट्टे को बार-बार ऐसे कस रहे थे जैसे मैंने गले में महज दो फीट का कपड़ा नहीं बल्कि कोई मोटी रस्सी का फंदा डाला हो।