आज की पॉजिटिव खबर:12वीं बाद पढ़ाई छूटी, दिल्ली में नौकरी की; अब बागवानी और सब्जियों की खेती से सालाना 6 लाख कमा रहे

5 महीने पहले

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल के रहने वाले सुंदर लाल चमोली का बचपन मुश्किलों में गुजरा। 12वीं बाद पढ़ाई छोड़कर पिता के साथ खेती करने लगे। कुछ खास आमदनी नहीं हुई तो अपनी किराने की दुकान खोल ली, लेकिन उसमें भी मुनाफा नहीं हुआ। फिर नौकरी करने दिल्ली चले गए। इस तरह उन्होंने 20 साल तक कई अलग-अलग काम किए, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद वे गांव लौट आए और नए सिरे से कॉमर्शियल फार्मिंग शुरू की। अब वे 12 बीघे जमीन में सब्जियों और फलों की खेती कर रहे हैं। इससे सालाना 6 लाख रुपए उनकी कमाई हो रही है।

सुंदर लाल कहते हैं कि मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। बाहर जाता तो कोई अच्छी नौकरी मिलती नहीं, इसलिए पिता की मदद के लिए गांव में रहकर ही खेती करने लगा। चूंकि हमारे खेत दूर-दूर थे और हम ट्रैडीशनल फार्मिंग करते थे, इसलिए कुछ खास आमदनी नहीं होती थी। इसी बीच मेरी शादी भी हो गई। जरूरतें बढ़ने लगीं।

सुंदर लाला कहते हैं कि अगर सही तरीके से खेती की जाए और हर सीजन के हिसाब से सब्जियां उगाई जाएं तो अच्छी कमाई की जा सकती है।
सुंदर लाला कहते हैं कि अगर सही तरीके से खेती की जाए और हर सीजन के हिसाब से सब्जियां उगाई जाएं तो अच्छी कमाई की जा सकती है।

भास्कर से बात करते हुए सुंदर लाल कहते हैं कि ज्यादा आमदनी हो इसलिए कुछ पैसे जुटाकर एक दुकान खोल ली, लेकिन इसमें भी उन्हें कुछ हाथ नहीं लगा। फिर उन्होंने छोटा सा एक होटल खोला, जहां वे चाय-नाश्ता बनाते थे। शुरुआत में अच्छी आमदनी हुई, लेकिन बाद में दिक्कतें आने लगीं। लागत के मुकाबले बचत नहीं हो पाती थी। करीब 7 साल तक जैसे-तैसे उन्होंने होटल चलाया।

गांव के लोग दिल्ली कमाने जा रहे थे, मैं भी साथ हो लिया

55 साल के सुंदर लाल बताते हैं कि होटल का काम बंद करने के बाद नए काम की तलाश में था। उस समय गांव के कई लोग काम के लिए दिल्ली जा रहे थे। तब मैंने सोचा कि यहां तो कुछ हासिल हो नहीं रहा है। एक बार दिल्ली जाकर भी देखा जाए, हो सकता है वहां काम जम जाए और अच्छी कमाई होने लगे।

सुंदर लाल के काम में उनकी पत्नी भी काफी सपोर्ट करती हैं। वे खेतों में काम करने के साथ ही दूसरी महिलाओं को काम भी सिखाती हैं।
सुंदर लाल के काम में उनकी पत्नी भी काफी सपोर्ट करती हैं। वे खेतों में काम करने के साथ ही दूसरी महिलाओं को काम भी सिखाती हैं।

इसके बाद सुंदर लाल दिल्ली कमाने निकल गए। वहां भी उन्हें एक होटल में ही काम मिला। कुछ सालों तक उन्होंने वहां काम किया। अच्छी खासी आमदनी हो जाती थी, लेकिन वहां खर्च भी ज्यादा था। वे कहते हैं कि दिल्ली जैसे शहर में कमाई से ज्यादा तो खर्च ही हो जाते थे। कुछ समय बाद मुझे लगने लगा कि इससे तो बढ़िया है कि गांव में जाकर खेती ही की जाए। पैसे कम भी मिलेंगे तो खर्च भी कम ही लगेंगे।

गांव आया तो चुनौतियां और अधिक बढ़ गईं

सुंदर लाल कहते हैं कि गांव आ तो गया, लेकिन यहां मुश्किलें कम नहीं थीं। एक तो पहाड़ी इलाका और दूसरा कि हमारे खेत एक जगह नहीं थे। हर खेत तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर थे। लिहाजा लेबर कॉस्ट काफी ज्यादा हो जाता था। साथ हर खेत की देखभाल करना भी संभव नहीं था।

इसके बाद सुंदर लाल ने गांव के किसानों से बात की। सबकी दिक्कतें एक जैसी थीं। उन्होंने सुझाव दिया कि हम सभी को अपने खेत एक जगह कर लेना चाहिए। इससे सबका भला होगा। कई किसान तैयार नहीं थे, लेकिन काफी समझाने के बाद सभी ने उसी हिसाब से एक जगह पर अपने खेत कर लिए।

सुंदर लाल फिलहाल 12 बीघे जमीन पर खेती कर रहे हैं। उन्होंने हर तरह के प्लांट्स अपने खेत में लगाए हैं।
सुंदर लाल फिलहाल 12 बीघे जमीन पर खेती कर रहे हैं। उन्होंने हर तरह के प्लांट्स अपने खेत में लगाए हैं।

ट्रैडीशनल फार्मिंग की जगह कॉमर्शियल फार्मिंग और बागवानी शुरू की

जब सभी खेत एक जगह हो गए तो सुंदर लाल का काम आसान हो गया। उन्होंने पहाड़ी सेब, अमरूद, अंगूर, नींबू जैसे फ्रूट्स लगा दिए। इसके बाद जो जगह खाली बची उनमें शिमला मिर्च, मिर्च, टमाटर, गोभी सहित हर तरह की सब्जियां लगा दीं। साथ ही केमिकल फर्टिलाइजर की जगह पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीका अपना लिया।

इसका उन्हें फायदा भी हुआ। पहले ही सीजन में अच्छी पैदावार हुई। इसके बाद उन्होंने पास की मंडियों में जाकर बेचना शुरू किया। इससे ठीक-ठाक उनकी आमदनी हुई। इसी तरह 5-6 साल तक वे खेती करते रहे। फिर उनके फ्रूट्स के प्लांट तैयार हो गए और उनसे फल निकलने लगे। इसका फायदा यह हुआ कि उनकी कमाई बढ़ गई।

बच्चों ने संभाली सोशल मीडिया की कमान, दूसरे राज्यों से भी आने लगे ऑर्डर

सुंदर लाल के तीन बच्चे हैं। एक बड़ा है, जबकि दो अभी स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। सुंदर लाल कहते हैं कि पहले मेरी मार्केटिंग लोकल मंडियों तक ही सीमित थी। बाद में बच्चों ने सोशल मीडिया पर पेज बनाकर फोटो-वीडियो पोस्ट करना शुरू कर दिया। इसका फायदा यह हुआ कि देहरादून, हरिद्वार जैसे बाकी जिलों से भी लोग हमारे पास आने लगे। इससे मंडियों पर निर्भरता कम हो गई। ज्यादातर लोग खेत से ही सामान खरीदने लगे।

सुंदर लाल बताते हैं कि पहले हमें मंडी जाकर फ्रूट्स बेचने पड़ते थे, लेकिन अब बड़े-बड़े व्यापारी हमारे बगीचे से ही फ्रूट्स ले जाते हैं।
सुंदर लाल बताते हैं कि पहले हमें मंडी जाकर फ्रूट्स बेचने पड़ते थे, लेकिन अब बड़े-बड़े व्यापारी हमारे बगीचे से ही फ्रूट्स ले जाते हैं।

इसके बाद धीरे-धीरे हमारा दायरा दूसरे राज्यों में भी बढ़ा। UP, हिमाचल, दिल्ली जैसे राज्यों से भी आम ग्राहकों के साथ ही बड़े व्यापारी हमसे सामान खरीदने लगे। इससे हमारी कमाई बढ़ गई। वे कहते हैं कि फिलहाल हम फ्रूट्स और सब्जियों के साथ ही अनाज भी उगा रहे हैं। जब मौसम अच्छा होता है तो 7 से 8 लाख भी कमाई हो जाती है, तो कभी 4-5 लाख रुपए से भी नीचे कमाई चली जाती है। कुल मिलाकर अब शहर से ज्यादा कमाई और सुकून है। साथ ही बड़े लेवल पर इससे दूसरे लोगों को भी रोजगार मिला है। माइग्रेशन भी कम हुआ है।

अगर आपकी भी इस तरह की खेती-किसानी में दिलचस्पी है तो यह खबर आपके काम की है

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के रहने वाले श्याम सिंह खेती कर रहे हैं। उन्होंने अपनी 10 एकड़ जमीन को फूड फॉरेस्ट में बदल दिया है। उनके बगीचे में एक दर्जन से ज्यादा वेराइटी के फ्रूट्स, सभी सीजनल सब्जियां, हल्दी, अदरक जैसे प्लांट्स हैं। पिछले पांच साल से वे खेती कर रहे हैं। इससे प्रति एकड़ एक लाख रुपए का मुनाफा हो रहा है। (पढ़िए पूरी खबर)