डियर मेन! आप भी तो दीजिए वर्जिनिटी का सबूत:लड़कियों से पवित्रता का सर्टिफिकेट मांगने वाले लड़के भी तो बताएं वे कितने अनछुए हैं

2 महीने पहले
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फोटो सोर्स- गूगल - Dainik Bhaskar
फोटो सोर्स- गूगल

ये किसी आदिम युग की बात नहीं है। 10 दिन पहले आपके घर से बस कुछ सौ किलोमीटर दूर इसी देश के एक गांव में हुई घटना है। बिहार के मोतिहारी जिले में एक लड़का बारात लेकर शादी करने गया। पूरे धूमधाम के साथ शादी हुई। माता-पिता ने अपनी हैसियत भर सब खर्च कर दिया कि बेटी ससुराल में सुख पाएगी।

फिर मौका आया खुशियों, उम्‍मीदों और अरमानों के जोड़े में सजी दुल्‍हन की विदाई का। पता है उस दिन विदाई की जगह क्‍या हुआ? लड़के ने कहा, “पहले लड़की का कौमार्य (वर्जिनिटी) टेस्‍ट होगा। फिर विदाई होगी। लड़के के घरवाले उसके इस फैसले के साथ थे।

पहले जांच होगी कि लड़की कुंवारी है या नहीं। पवित्र है या नहीं। उसने पहले कभी किसी और के साथ सेक्‍स तो नहीं किया है। लड़की की पवित्रता की अग्नि परीक्षा के बाद ही उसकी विदाई होगी।

हो सकता है ये पढ़कर आपको लगे कि सवा अरब की आबादी वाले देश में किसी एक सिरफिरे लड़के की ऐसी बातों को क्‍या तूल देना। ऐसा हर लड़का तो नहीं होता। सारी लड़कियों की शादी के बाद वर्जिनिटी तो नहीं चेक की जाती।

अगर आपको ऐसा लगता है कि तो आप किसी खूबसूरत मुगालते में है। अपनी खुशफहमियों के द्वीप में, क्‍योंकि सच तो ये है कि आज भी इस देश के बहुसंख्‍यक लड़कों का अरमान यही है कि उन्‍हें अनछुई लड़की मिले।

वो खुद भले पचास गर्लफ्रेंड घुमा चुके हों, जीवन के साथ सारे अच्‍छे- बुरे प्रयोग कर चुके हों, सब अनुभव ले चुके हों, लेकिन लड़की चाहिए एकदम अनछुई।

ये ऐसी दबी- छिपी कहानियां हैं, जो लिखी और सुनाई नहीं जातीं। ये कहानियां सिर्फ औरतें ही जानती हैं। ये उनके मन के वो अंधेरे कोने हैं, जिस पर ये इज्‍जतदार समाज पर्दा डाले रहता है। एक लड़की की शादी इसलिए टूट जाती है, क्‍योंकि सुहागरात को उसे ब्‍लीडिंग नहीं हुई।

जरूरी नहीं कि हर लड़की की विदाई से पहले दूल्‍हा उसकी वर्जिनिटी का सुबूत मांगे, लेकिन शादी के बिस्‍तर पर ये अनकहा सवाल दैत्‍य बनकर बैठा होता है।

यही कारण है कि लड़कियां छिप-छिपकर हाइमन रिपेयर सर्जरी करवा रही हैं। देश भर में हाइमन या वर्जिनिटी सर्जरी का चलन बढ़ रहा है।

बिहार में पहली बार वर्जिनिटी सर्जरी शुरू होने के बाद से पिछले 10 दिनों में डेढ़ सौ लड़कियां सर्जरी के लिए रजिस्‍ट्रेशन करवा चुकी हैं और 5000 से ज्‍यादा लड़कियां इस बात की इंक्‍वायरी कर चुकी हैं।

शिक्षा और नौकरी में अपना वाजिब हक मांग रही, घर से बाहर निकलकर कॉलेज जा रही, नौकरी कर रही लड़कियों के लिए अब शादी से पहले संबंध बनाना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन फिर भी उन्‍हें डर है कि शादी की रात उनसे उनकी पवित्रता का सुबूत मांगा जाएगा।

उन्‍होंने प्रेम तो किया, देह के सुख-दुख को महसूस भी किया, लेकिन अब भी इतनी आजादी और ईमानदारी की जगह नहीं है कि वो खुलकर इस बात को स्‍वीकार कर सकें।

वो अपने साथ और रिश्‍ते के साथ ईमानदार हों सकें। वो पवित्रता का सबूत मांगने वाले जाहिल लड़कों को रिजेक्‍ट कर सकें। वर्जिनिटी सर्टिफिकेट मांग रहे लड़के से पलटकर पूछ सकें- मेरी पवित्रता का सुबूत मांगने से पहले ये बताओ कि तुम कितने पवित्र हो। पहले अपनी पवित्रता का सुबूत पेश करो।

सही और गलत का, नैतिक और अनैतिक का नियम औरत और मर्द के लिए दो अलग- अलग नियम तो नहीं हो सकता। जो मेरे लिए गलत है, वो तुम्‍हारे लिए भी गलत है और जो तुम्‍हारे लिए सही, वो मेरे लिए भी सही।

लेकिन पितृसत्‍ता की ये पूरी इमारत इसी बुनियाद पर खड़ी है कि औरत का उसके शरीर पर कोई हक नहीं। वो पिता और पति की संपत्ति है।

लड़की की सारी इज्‍जत और पवित्रता उसके एक अंग विशेष में धरी हुई है, जिसकी रक्षा का दायित्‍व पहले पिता निभाता है और फिर उसे पति नामक के एक जीव को सौंप देता है। औरत का अपने शरीर पर अधिकार नहीं। पिता और समाज मिलकर तय करेंगे कि स्‍त्री की देह पर किस मर्द का अधिकार होगा।

जिस अधिकार से मर्द औरतों की पवित्रता का सुबूत मांगते हैं, वो अधिकार उन्‍हें इसी समाज ने दिया है। वही समाज, जिसने मर्दों को बेलगाम अधिकार दिए हैं। शादी से पहले और शादी के बाद अनेकों संबंध बनाने की इजाजत दी है, जिस समाज ने औरतों को कारागार और मर्दों को चकलाघर दिए हैं।

जिस समाज ने मर्द के व्‍यभिचार को उसकी जरूरत और औरत को उस जरूरत को पूरा करने का साधन भर माना है, उसी समाज ने दिया है मर्दों को ये विशेषाधिकार, जिससे वो पूछ रहे होते हैं कि औरत वर्जिन है या नहीं।

इन कूढ़मगजों को कोई ये समझाए कि एक औरत भी उतनी ही मनुष्‍य है, जितने कि वो खुद। उसका अपने शरीर पर उतना ही हक है, जितना उनका। उसकी आजादी, उसका अधिकार कुछ भी मर्दों से कम नहीं। जैसे मर्द के चरित्र उसकी देह के एक खास अंग से कोई सीधा या टेढ़ा ताल्‍लुक नहीं होता, वैसे ही औरत का भी नहीं होता।

जिस प्रकृति, धरती और मिट्टी ने मर्द को गढ़ा है, उसी प्रकृति से उपजी है औरत की देह भी।

प्रकृति ने हॉर्मोन बांटते हुए कोई भेदभाव नहीं किया। न किसी को ज्‍यादा दिया, न किसी को कम।

प्रकृति ने सुख के बंटवारे में भी दो आंख नहीं की। उम्र का उफान आता है तो दोनों पर बराबर आता है। जितनी बेचैन होती है एक पुरुष की देह, उससे तनिक भी कम स्‍त्री की नहीं होती। फर्क सिर्फ इतना है कि मर्द के लिए ये सब सही है और औरत के लिए ये सब गलत।

ये सारा भेदभाव, ये सारा अन्‍याय इस समाज का रचा हुआ है। वो दुनिया जिस पर मर्दों का एकछत्र साम्राज्‍य है। जो सदियों से स्त्रियों को एक देह, एक भोग का सामान बनाकर उसकी मनुष्‍यता पर कब्‍जा जमाए बैठा है।

देह जीवन के बहुत सारे सुखों, राग-रंगों में से एक तक पहुंचने, उसे महसूस करने और जीने का जरिया मात्र है। ये सुख भी तभी सुख है कि जब इसमें दोनों बराबर के साझेदार हों। मालिक और गुलाम के रिश्‍ते में प्रेम नहीं होता।

यह तो दुर्भाग्‍य है ही, लेकिन इससे भी बड़ा दुर्भाग्‍य ये है कि मालिक बन बैठा मर्द ये नहीं जानता कि दोस्‍ती के, बराबरी के, देह के खेल में बराबर की साझेदारी से तो वो खुद भी वंचित है।

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