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बात बराबरी की:मुलायम ब्रेड और कुरकुरे पकौड़े बनाने वाले हाथों में रसोईघर का छल्ला सुहाता है, न कि कार की चाबी

नई दिल्ली10 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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साल 1910 की बात है, जब दुनिया के कई हिस्से औद्योगिक क्रांति से दपदपा रहे थे। उस दौर में नई-नई चीजें आईं, जिनमें कारें भी एक थीं। अब बाजार में किस्म-किस्म की कारें दिखने लगीं, लेकिन खरीदे कौन! फिर हुआ ये कि कंपनियां लागत निकालने के लिए कीमतें गिराने लगीं। ये तरीका काम आया। छुट्टन की दुकान से जूता बनवा उसे ऑक्सफोर्ड-मेड बताने वाले लोग भी लाइन लगाकर शो-रूम पहुंच गए। हर कोई अपने ठाठ की गाड़ी चाहता।

सड़कों का चेहरा बदलने लगा। पैदल-याफ्ता लोगों की जगह लंबी-छोटी मोटरकारों ने ले लिया। देर तक सोने वाले लोग निहार-मुंह जागकर, कोट-टाई डाटकर सैर पर निकलने लगे। शामें परिवार के साथ कार-यात्रा के लिए रिजर्व्ड थीं। सब ठीक चल रहा था, लेकिन इससे पहले कि कार में पहली खरोंच लग पाती, दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। युवा-अधेड़ पुरुष जवान बीवियों को जलनखोर बूढ़े पड़ोसियों के भरोसे छोड़कर जाने लगे। सवाल था- अब कार का क्या होगा!

मौका भी था- दस्तूर भी। मुलायम ब्रेड और कुरकुरे पकौड़े बनाने वाले हाथों ने गाड़ी की स्टीयरिंग संभाल ली। पहले झिझकते हुए। फिर लापरवाह भरोसे के साथ। बच्चों को स्कूल छोड़ा जाने लगा, साग-भाजी लाई जाने लगी, फिर एक वक्त वो आया, जब पति से दूरी में तपती औरतें मन बहलाने को भी कार निकालने लगीं। कोई कॉफी हाउस जाती। कोई किले-कंदरा खंगालती। वहीं कोई-कोई उतरती शाम में डूबता सूरज देखने के लिए ड्राइव करने लगी। उड़ते-उड़ते ये खबर जंग लड़ते पतियों तक पहुंच गई। बस, यहीं से गड़बड़ी शुरू हुई।

युद्ध से लौटे पतियों ने वर्दी से धूल बाद में झाड़ी, कार की चाबी पहले कब्जाई। अल्फाज बेहद मुलायम- ‘तुमने इतने दिन सब संभाला। अब आराम करो। भाग-दौड़ ने तुम्हें मर्दाना-सा बना दिया है! जाओ, आंखों पर थोड़ा खीरा, होंठों पर मलाई लगाओ।’

पसीजे हाथों से बीवियों ने चाबी समेत अपनी नई-ताजा आजादी भी शौहर के हवाले कर दी। बची-खुची कसर ‘कार चलाती औरत’ पर रचे चुटकुलों ने पूरी की। इन मर्दाना चुटकुलों का जिक्र Women drivers!: The emergence of folklore नाम की किताब में मिलता है। लेखक माइकल एल बर्जर एक-एक करके तह खोलते हैं कि कैसे एकदम चुपके से, लेकिन पूरी तैयारी के साथ औरतों को ड्राइविंग सीट से हटाने की साजिश रची गई।

दुश्मनों को नए-नए तरीकों से जहर देकर मारने के लिए बदनाम रूस भी शायद उतना पक्का जाल न बुन सके, जैसा जतन महिलाओं के हाथ से स्टीयरिंग लेने के लिए हुआ। जहर नहीं दिया गया। मारपीट नहीं हुई। बदजबानी भी नहीं हुई। बस चुटकुले बना दिए गए।

औरतें अगर गाड़ी चला रही हों तो एक्सिडेंट तय है। वो गोल रोटी थाप सकती हैं, मजेदार केक बना सकती हैं, लेकिन कार पार्क नहीं कर सकतीं। औरत का धीरज परखना है तो उसे ट्रैफिक में कार के साथ छोड़ दो। अपनी बीवी को सारी आजादी दो, बस कार की चाबी अपने पास रखना…! अंतहीन लतीफे। जहर-बुझे इन लतीफों ने बेहद चुपके से हाथ आती आजादी औरतों से छीन ली।

खुद स्त्रियां मानने लगीं कि वे उतनी शानदार कार नहीं चलातीं, जैसा उनके मियां जी, या भाई या पिता चलाते हैं। पार्किंग के नाम पर वे पसीना-पसीना होने लगीं। भीड़ देखकर घबराने लगीं। इस तरह वे ड्राइविंग सीट से सरककर बगल में आ गईं। अब उनके पास ‘अपनी’ गाड़ी नहीं रही। वे तभी सफर करेंगी, जब उनका पुरुष चाहेगा। वैसे भी जनाना हाथों में रसोईघर का छल्ला सुहाता है, न कि कार या बाइक की चाबी।

तालिबान ये बात भली तरह से समझता है, तभी तो वहां ड्राइविंग इंस्टीट्यूट से महिलाओं का लाइसेंस जारी न करने का फरमान निकल आया। दो-चार रोज पहले अफगानिस्तान के हेरात शहर से ये खबर आई। वहां सड़कों पर गाड़ी चलाती महिलाओं पर तो सीधी रोकटोक नहीं है, लेकिन नए ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने पर पाबंदी हो गई।

धीरे-धीरे सड़कों पर से लड़की ड्राइवरों की संख्या कम होते-होते गायब हो जाएगी। बता दें, ये हेरात वही शहर है, जहां कुछ महीनों पहले दुकानों से जनाना मैनेक्विन हटाने का आदेश जारी हुआ था। वहां के ‘सदाचार फैलाने और बुराई रोकने वाले मंत्रालय’ के मुताबिक दुकानों पर नपे-तुले शरीर वाली औरतों की पुतलियां देखकर जिंदा मर्द रास्ता बहक सकते हैं।

बहका-बहकी का ये खेल अफगानिस्तान तक सीमित नहीं, कुछ सालों से हवाई जहाजों में नया ट्रेंड चल निकला है, जिसकी शुरुआत हुई साल 2015 में। न्यूयॉर्क से इजरायल आ रही फ्लाइट्स एकाएक देर से पहुंचने लगीं। वजह खोजी गई तो पता लगा कि कुछ पुरुष यात्रियों को अनजान महिला यात्रियों के बगल में बैठने से एतराज था। एक खास समुदाय से ताल्लुक रखते इन मर्दों को लगता था कि औरत यात्री के साथ बैठने पर उनकी शुद्धता भंग हो जाएगी। वे डिमांड करने लगे कि वे तो अपनी जगह पर बने रहेंगे, लेकिन औरतों को उठाकर दूसरी सीट पर भेज दिया जाए। ऐसा न होने पर हंगामा खड़ा होने लगा और फ्लाइट्स लेट होने लगीं।

यहां तक कि पुरुषों के लिए एक वीडियो आ गया, जिसे आध्यात्मिक सेफ्टी वीडियो कहा गया। इसमें बताया गया कि किन तरीकों से महिला सहयात्री को काबू में रखा जाए, कि उसके घुटने न छू जाएं, या फिर बाल उड़कर चेहरे पर न आएं। फुल बॉडी सेफ्टी वेस्ट की मांग होने लगी ताकि पुरुष उस खोल के भीतर घुसकर अपनी शुद्धता बनाए रख सकें।

बाद में इजराइल एयरलाइन्स के खिलाफ कुछ बागी स्त्रियों ने ऑनलाइन कैंपेन शुरू किया, जिसके बाद थोड़ा बदलाव हुआ। अब इजराइल-अमेरिका के हवाई रास्ते में कोई मर्द ये मांग नहीं करता कि महिला सहयात्री को उसके बगल से हटा दिया जाए वरना वो अशुद्ध हो जाएगा। कोई बॉडी वेस्ट नहीं पहनता। न ही औरतों को देखकर नाक-भौं सिकोड़ता है, हालांकि इतना बदलाव काफी नहीं।

असल बदलाव तब आएगा, जब औरतें सड़क पर भी उतनी ही सहज रह सकें, जितनी घर पर होती हैं। या फिर- बदलाव तब आएगा, जब सड़क पर औरतों को फर्राटे से कार चलाता देख मर्द उतने ही सहज रह सकें।