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पानी बचाने की कहानी:एक छोटी सी कोशिश ने किसी किसान को करोड़पति बना दिया, कहीं जिंदा हो गई 60 साल से सूखी नदी

एक महीने पहलेलेखक: उत्कर्षा त्यागी

भारत के एक बड़े हिस्से में इस वक्त भयंकर गर्मी पड़ रही है। इस चिलचिलाते मौसम में भी कई इलाके पानी को मोहताज हैं। इसमें राजधानी दिल्ली भी शामिल है। नीति आयोग ने 2019 में एक रिपोर्ट में आशंका जताई थी कि 2020 तक देश के 21 शहरों से ग्राउंड वाटर लेवल लगभग खत्म हो जाएगा। इसमें चेन्नई, बेंगलुरु, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शहर शामिल थे। 2001 में प्रति व्यक्ति के आधार पर लगभग 1,800 क्यूबिक मीटर पानी था, वहीं 2021 में ये घटकर करीब 1,300 क्यूबिक मीटर ही रह गया। ये सभी आंकड़े बताते हैं कि हालात कितने बदतर हो चुके हैं।

पानी की इस स्थिति में भी कई लोग इस उम्मीद में बैठे रहते हैं कि सरकार कुछ करेगी, लेकिन कुछ लोग खुद प्रयास शुरू करके हालात में बदलाव ला देते हैं। आज हम ऐसे ही लोगों की कहानी पेश कर रहे हैं।

लगातार यमुना का जलस्तर घट रहा है। दिल्ली के कई इलाकों में पानी की किल्लत हो रही है।
लगातार यमुना का जलस्तर घट रहा है। दिल्ली के कई इलाकों में पानी की किल्लत हो रही है।

1. लद्दाख में बनाए आइस स्तूप: लद्दाख एक पहाड़ी इलाका है जहां बारिश तो होती है मगर गर्मियों का मौसम आने तक पानी टिक नहीं पाता। यही वजह है कि खेती के लिए पानी की कमी महसूस होती थी। तब यहां रह रहे मैकेनिकल इंजीनियर सोनम वांगचुक ने ‘आइस स्तूप’ बनाने का आइडिया निकाला। सोनम वांगचुक वही हैं जिनके जीवन से प्रेरणा लेकर 3 ईडीयट्स का फुंकसुक वांगडू का किरदार गढ़ा गया था।

आइस स्तूप या कृत्रिम ग्लेशियर को बनाने के लिए किसी मशीन या बिजली का इस्तेमाल नहीं किया जाता। नीचे झाड़-झंकाड़ और पाइप्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसके ऊपर स्थित किसी जलस्रोत से पानी छोड़ा जाता है। ये पानी इन झाड़-झंकाड़ और पाइपों से होते हुए बूंद-बूंद करके जमीन पर गिरता है और जम जाता है। बूंद-बूंद के रूप में पानी जल्दी बर्फ बन जाता है।

इस तरह ये पूरा स्तूप बनाया जाता है। इस स्तूप को कोन के आकार में बनाया जाता है ताकि सरफेस एरिया कम हो जाए। इससे बर्फ पर कम धूप पड़ती है जिससे स्तूप ज्यादा समय तक नहीं पिघलता। इस तरह यहां गर्मियों के मध्य तक भी बर्फ बची रहती है। इस कृत्रिम ग्लेशियर या आइस स्तूप का इस्तेमाल गर्मियों के मौसम में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम के जरिए सिंचाई के लिए किया जाता है।

लद्दाख में आइस स्तूप की मदद से गर्मियों में खेती हो रही ।
लद्दाख में आइस स्तूप की मदद से गर्मियों में खेती हो रही ।

2. राजस्थान के अलवर में अपनाई पुरानी परम्परा: राजस्थान के अलवर जिले में पानी की कमी नई नहीं है। न केवल यहां बारिश कम होती है, बल्कि तापमान भी काफी ज्यादा रहता है। इसके कारण बारिश का पानी जल्दी ही भाप बनकर उड़ जाता है। 1980 में यहां हालात इतने खराब हो गए थे कि लोगों ने यहां से पलायन शुरू कर दिया था।

इसी दौरान यहां कुछ नौजवानों ने काम करना शुरू किया जिनका नेतृत्व कर रहे थे 28 साल के राजेंद्र सिंह। इन्हें आज ‘वाटरमैन ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है। राजेंद्र सिंह ने जब यहां पानी की विकट समस्या को देखा तो इसके बारे में जानने समझने की कोशिश की। तब जाना कि अलवर में पुराने समय में जोहड़ और तालाबों की परंपरा थी जिसके सहारे लंबे समय तक पानी की समस्या से निपटा जा रहा था।

तब 1985 में राजेंद्र सिंह ने अपने साथियों के साथ गोपालपुरा गांव में एक जोहड़ खोदना शुरू कर दिया। इन्हें देख गांव के दूसरे लोग भी साथ आ गए। इसके बाद बारिश के मौसम में न केवल जोहड़ के पीछे का तालाब पानी से भर गया बल्कि पास के ही कुएं का जलस्तर भी बढ़ गया। गोपालपुरा को देख बाकी गांव के लोगों ने भी इसी पुरानी जोहड़ और तालाब की परंपरा को अपनाया। इसके बाद राजेंद्र सिंह ने कई दूसरे गांवों में जाकर वहां जोहड़ और तालाबों की मरम्मत और नवीकरण पर काम किया।

इसका असर यह रहा कि यहां बहने वाली अरवरी नदी जो मानसून में कुछ हफ्तों के लिए ही बहती थी 1995 से वो पूरे साल बहने वाली नदी बन गई।

60 साल से सूखी अरवरी नदी लोगों के प्रयास से जीवित हुई।
60 साल से सूखी अरवरी नदी लोगों के प्रयास से जीवित हुई।

3. बुंदेलखंड में चला ‘खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़’ अभियान: जहां बुंदेलखंड के लोग पानी की किल्लत हर साल झेलते हैं उसी बुंदेलखंड में एक गांव है जखनी। इस गांव में न सिर्फ हरे-भरे पेड़ देखे जा सकते हैं मगर यहां पानी से भरे कुएं और तालाब भी आसानी से मिल जाएंगे।

जखनी भी करीब 25 साल पहले बुंदेलखंड के बाकी इलाकों की ही तरह पानी की किल्लत से जूझ रहा था। मगर यहां के रहने वाले उमाशंकर पांडे ने गांव के लोगों के साथ मिलकर पूरी तस्वीर ही बदल डाली।

गांव में सबसे पहले उन्होने ‘खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़’ अभियान चलाया। इसमें गांव के लोगों ने उमाशंकर का पूरा सहयोग किया। इसके अलावा सभी ने साथ मिलकर गांव के कुओं और तालाबों की सफाई की और वहां से अतिक्रमण हटाया। साथ ही मेड़बंदी की और गांव की नालियों को खेतों की ओर मोड़ दिया। गांव में किसी भी तालाब के किनारे को पक्का नहीं किया गया। यहां एक समिति भी बनाई गई जो इन तालाबों के रखरखाव का ख्याल रखती है।

आज गांव के कई तालाबों में बारिश का पानी संरक्षित किया जाता है। गांव के लोगों का कहना है कि पानी को बनाया नहीं सिर्फ संरक्षित किया जा सकता है।

इसके अलावा बुंदेलखंड में करीब 600 जल सहेलियां भी पानी की समस्या से निपटने के लिए मिलकर काम कर रही हैं।

बुंदेलखंड के जखनी गांव में गांव वालों के सहयोग से आज पानी की कमी हुई दूर।
बुंदेलखंड के जखनी गांव में गांव वालों के सहयोग से आज पानी की कमी हुई दूर।

4. नागालैंड का एक गांव अपना रहा ‘जाबो’: नागालैंड के रेन शैडो क्षेत्र में बसा एक गांव है किकरूमा। रेन शैडो क्षेत्र वो होता है जहां किसी पर्वत श्रृंखला के बीच में आने के कारण बारिश बहुत कम होती है। मगर सदियों से चली आ रही एक परंपरा के कारण यहां पानी बचा हुआ है। सबसे पहले तो यहां के लोग गांव के जंगलों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, क्योंकि ये जानते हैं कि पेड़ों के बचे रहने से बारिश का पानी गांव में रुका रहेगा।

इसके साथ ऊपर पहाड़ी से बहते हुए बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए लोगों ने छोटे तालाब खोद दिए। तालाब के पानी को खेतों तक मवेशियों को रखने वाली जगह से लेकर जाते हैं, जिससे पानी में गोबर आदि धुलकर खेतों तक पहुंच जाए। गांव के लोग खेतों में चावल की खेती के साथ-साथ मछली पालन कर पानी का दोहरा लाभ उठाते हैं।

गांव के सभी तालाबों को छोटे-छोटे रास्तों से जोड़ा जाता है। इन तालाबों के इर्द-गिर्द औषधीय पौधे भी लगाए जाते हैं। अरुणाचल प्रदेश की अपतानी ट्राइब के लोग भी इसी तरह खेत में चावल की खेती के साथ-साथ मछली पालन भी करते हैं।

नागालैंड के किकरूमा गांव में सदियों से लोग ‘जाबो’ के जरिए पानी बचा रहे।
नागालैंड के किकरूमा गांव में सदियों से लोग ‘जाबो’ के जरिए पानी बचा रहे।

5. देवास ने अपनाया ‘पानी बचाओ, धन कमाओ’: मध्य प्रदेश के मालवा में पानी की किल्लत है। यहां के देवास जिले में प्रशासन ने करीब 10 साल पहले ‘पानी बचाओ, धन कमाओ’ अभियान चलाया। इसमें किसानों से अपने खेत के 10वें हिस्से को खोद कर छोटा तालाब बनाने को कहा गया। इन छोटे तालाबों के बहुत से फायदे भी किसानों को बताए गए जैसे यहां मछली पालन कर कमाई की जा सकती है।

किसानों ने प्रशासन की बात मानकर खेतों में खुद ही तालाब खोदने शुरू किए। आज यहां 1000 खेतों में इस तरह के तालाब हैं जिनमें केवल 564 सरकारी पैसे से बने हैं। करीब 400 गांव इस अभियान की बदौलत सूखे से उबर चुके हैं।

6. खेती में छोटे बदलाव किए, आज गांव के कई किसान करोड़पति: महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में एक गांव है हिवरे बाजार। यहां के कई किसान खेती के जरिए आज करोड़पति हैं। मगर ये गांव हमेशा से ऐसा नहीं था। साल 1972 में यहां सूखा पड़ा। इसके बाद साल दर साल पानी की कमी से गांव वाले जूझने लगे और गरीबी की गर्त में समाने लगे।इससे गांव के लोग पलायन करने लगे।

मगर गांव के नौजवानों ने गांव की कमान युवा हाथों में देने पर विचार किया और 1989 में पोपटराव पवार को सरपंच बनाया गया। सबसे पहले गांव के लोगों को समझाया गया कि ज्यादा पानी का इस्तेमाल होने वाली फसल न उगाई जाए। उसकी जगह ऐसी फसलें उगाई जाएं, जिसमें कम पानी इस्तेमाल हो जैसे दालें और सब्जियां। गांव के लोगों को पशु पालन के लिए प्रोत्साहित किया गया।

महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गांव में आज 235 परिवारों में से 60 लखपति हैं।
महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गांव में आज 235 परिवारों में से 60 लखपति हैं।

इसके अलावा गांव में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगाया गया। गांव के कुएं और तालाब साफ किए गए और उनके रख-रखाव पर ध्यान दिया गया। साथ ही ढेरों पेड़ लगाने पर भी जोर दिया गया। इस सबके कारण गांव में आज खुशहाली है। जहां 1995 में गांव के 182 में से 168 परिवार गरीबी रेखा के नीचे थे वहीं आज गांव के केवल 3 परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं।