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बात बराबरी की:औरत दफ्तर में नौकरी करे या घर में झाड़ू-फटका लगाए, उसे मर्दों के तानों से छुटकारा नहीं मिल सकता

नई दिल्ली4 महीने पहले
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सोशल मीडिया पर इन दिनों सांप-नेवले की लड़ाई चल रही है। लड़ाई में इस बार मर्द-औरत गुत्थमगुत्था नहीं, बल्कि औरतें आपस में भिड़ रही हैं। वहीं रौशन-खयाल मर्द दोनों तरफ गुलाटियां मार रहे हैं। मामला एक वरिष्ठ लेखिका से जुड़ा है। उन्होंने घरेलू और कामकाजी महिलाओं की तुलना करते हुए पोस्ट डाली। लेखिका के मुताबिक, कामकाजी महिलाएं रोज सुबह-सवेरे घर के खटराग से बाहर निकल पाती हैं। महीने के महीने उनकी जेबें खनकती हैं।

वहीं हाउसवाइफ के पास खटते रहने के बाद भी कोई सुख नहीं। लेखिका की पोस्ट वायरल हो गई। दोनों श्रेणियों की औरतें आपस में लड़ रही हैं। कुल मिलाकर, बेहद महीन चालाकी के साथ औरतें एक बार फिर साथिन की बजाए दुश्मन बना दी गईं।

16वीं सदी में हाउसवाइफ शब्द की खोज हुई, जो दरअसल सिलाई और कशीदाकारी की किट से आया था। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने हाउसवाइफ की परिभाषा कुछ यूं दी- 'एक छोटी डिबिया, जिसमें सुई-धागे और सीने-पिरोने के बाकी जरूरी सामान रखे हों।' इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती कि कैसे सीने-पिरोने की डिबिया को घरेलू महिलाओं का मानक बना दिया गया। हालांकि इस पर ज्यादा सोचने और इतिहास की कब्र खंगालने की जरूरत भी नहीं।

मामला साफ है। तब संभ्रांत महिलाएं घर पर ही रहते हुए नौकर-चाकरों की फौज संभालतीं और संतान पैदा करतीं। इस बीच वक्त मिले तो आरामकुर्सी पर बैठ कशीदाकारी करतीं। दूसरी तरफ उनके पति रियासत में ऊंचे ओहदे पर होते और घर-खर्च की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं की होती। इस तरह से घरेलू औरत बहुत चुपके से इंसान की बजाए ‘सिलाई की किट’ में तब्दील हो गई।

अब लौटते हैं नए जमाने में। कुछ वक्त पहले स्वीडन के नामी पत्रकार पीटर लेतमार्क ने एक इंटरव्यू के लिए हाउसवाइफ खोजने की कोशिश की, लेकिन एक करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में एक भी ऐसी औरत नहीं मिली, जो 'सिर्फ' घर संभालती हो। तो क्या तमाम औरतें कामकाजी हो गईं? नहीं। खोजबीन हुई तो नया ही राज खुला।

स्वीडन में हाउसवाइफ को इतनी नीची नजरों से देखा जाता रहा कि औरतों ने या तो पार्ट-टाइम काम शुरू कर दिया या फिर अपने गैर-कामकाजी होने को किसी बहाने से छिपाने लगीं। पड़ोसी देश नॉर्वे को अपने यहां हाउसवाइव्स के लिए बनी एक संस्था का नाम बदलना पड़ा, क्योंकि औरतें उसकी सदस्य बनने से बचती थीं।

औरत पढ़-लिख ले तो उसे काम करना ही चाहिए। एक सोच ये है। इस सोच को सिर पर मुकुट की तरह पहनने वाले लगातार कमाऊ औरत की वकालत कर रहे हैं। वे मास्टर्स कर चुकीं गृहिणी को हीन बताते हुए कहते हैं- ऐसी डिग्री का क्या मतलब, जब तुम्हें झाडू-फटका ही करना है। पड़ोसी की पेशेवर बीवी की मिसालें दी जाती हैं कि 'देखो, वे महीने के शुरू में मोटी पगार लाती है, और मजाल कि घर की फर्श पर कोई दाग भी दिख जाए। इतवार के इतवार बावर्चीखाने में देग पकने की महक आती है। कपड़े हरदम इस्त्री किए हुए।'

हर ऐसे ताने के साथ गृहिणी खुद पर और काम लादती जाती है। वह ज्यादा सुबह जागती है कि सबके उठने से पहले रसोई पक जाए। हर दूसरे दिन परदे-चादरें धुलने लगते हैं। मसालों के डिब्बों की जगह सिलबट्टा ले लेता है। हद तो ये है कि गृहिणी महीने की बचत के पैसे अपनी जरूरत पर खर्च करने की बजाए जमा करने लगती है। वह घुटने का दर्द टालती है कि ये उम्र का नतीजा है। तेज सिरदर्द को टीवी देखने का असर मान लेती है। यानी खुद को उपयोगी साबित करने की चाह में गृहिणी औरत से मशीन बन जाती है।

दूसरी सोच कामकाजी औरतों को लेकर है। इस सोच को धारण करने वाले लगातार उन्हें गृहिणी से कमतर बताते हैं। तानों की शक्ल कुछ ऐसी- 'दफ्तर तो घर के कामों से बचने का बहाना है, वरना औरतों को काम की जरूरत ही क्या!' ये तबका यकीन करता है कि औरतें लिपस्टिक-पाउडर के लिए ही कमाती हैं।

गृहिणी के उजले हंस की मानिंद चमकते घर से लगातार पेशेवर औरत के घर की तुलना होती है। बगैर घोषणा के ही जैसे कोई प्रतियोगिता चल पड़ती है। कामकाजी औरत दफ्तर में काम करते हुए घर के कामों की लिस्ट बनाती जाती है कि लौटते हुए उसे क्या-क्या निपटाना है। कभी मुंबई की लोकल में शाम को बैठें तो ढेरों औरतें सब्जियां काटती दिख जाएंगी। थकान से बेहाल ये औरतें रात का खाना भले छोड़ दें, लेकिन अगली सुबह की तैयारी शायद ही भूल सकें। तिस पर एक ताना ये भी रहता है कि मर्दाने संसार ने उसे काम करने की इजाजत दी। वे सारी उम्र इस अहसान का बदला, ज्यादतियां सहकर चुकाती हैं।

सवाल-जवाब की वेबसाइट ‘कोरा’ पर किसी भोले पुरुष ने सवाल किया- पत्नी कामकाजी चुनी जाए या घरेलू! इस पर एक ज्ञानी पुरुष ने लंबा-चौड़ा लेख लिख डाला। अपने लेख में वो दोनों किस्म की औरतों के फायदे-नुकसान बताता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई बैंगन के नफा-नुकसान गिनाए, उसके बाद पक्का हो कि गांव से आया बैंगन पड़ोसियों को बांटा जाए या सब्जी पकाई जाए।

अब वरिष्ठ लेखिका की पोस्ट को लेकर गुल-गुपाड़ा मचा हुआ है। कामकाजी औरतें और गृहिणियां दोनों अपनी शहादत को लेकर दूसरे से ज्यादा पक्की हैं। हितचिंतक होने का दावा करते पुरुष भी दाएं-बाएं कर रहे हैं। वे कभी इसका साथ देते हैं तो कभी उस पाले में चले जाते हैं।

आपस में उलझी औरतें यहां बंदर और बिल्ली की कहानी भूल रही हैं। दो बिल्लियों की लड़ाई में कैसे बंदर उनके हक की रोटी निगल जाता है। यही हो रहा है। महिलाएं एक-दूसरे से होड़ में लगी हैं। जबकि होने को ये भी किया जा सकता था कि दोनों एक-दूसरे को पूरक मान लें। दफ्तर से लौटी महिला, पड़ोसन के साथ चाय की चुस्कियां लेते हुए उसे बाहर का संसार दिखाए और घरेलू महिला फटाफट बनने वाले नाश्ते के टिप्स बांटे। होने को तो ये भी हो सकता था कि एक शाम जनाना पार्लियामेंट बिठाकर औरतें एलान कर दें कि भई, हम साथिनें हैं, दुश्मन नहीं, हमें बरगलाना बंद कर दो।

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