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बात बराबरी की:क्रांति-क्रांति चिल्लाती औरत हवा में कपूर की तरह इतिहास से गायब हो जाती है, लेकिन इंकलाबी पुरुषों का नाम नहीं मिटता

नई दिल्लीएक वर्ष पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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सिंघु बॉर्डर! बीते सालभर से ये नाम बचपन की चोट की तरह रह-रहकर डंक चुभोता रहा। कभी यहां कंटीले तार दिखे तो कभी हथियारबंद जवानों की टोलियां। बॉर्डर के उस पार किसान थे, जिनकी कुछ मांगें थीं। लगभग सालभर बाद 'उस पार' की जीत हुई। फिलहाल दिल्ली-हरियाणा की सीमाएं जश्न में नहाई हुई है। किसानों की आंखों में आंसू, चेहरे पर मुस्कान और जोश में उनका चिल्लाना, इंसानी किडनी से भी कीमती कैमरे इन पलों को कैद कर रहे हैं। कुछ महिलाएं भी हैं। झुकी कमर वालीं। बुलंद आवाज वालीं। कैमरे के फ्लैश अलग-अलग एंगल से उन्हें भी टटोल रहे हैं, लेकिन करोड़ों औरतें इस जश्न का हिस्सा नहीं। वे आंदोलनकारी पतियों की पत्नियां हैं, या फिर बहन-बेटियां।

सालभर में खेत सूख न जाएं, इसलिए वे मिट्टी गोड़ रही थीं। बॉर्डर तक खाना पहुंचता रहे, इसलिए फसलें उगा रही थीं। ये वे औरतें हैं, जिनके सीने पर न मेडल सजेगा, न इतिहास की काली-सफेद किताबों में जिक्र होगा। ये छूटी हुई औरतें हैं, जिनका काम इंकलाब का इंतजार है।

साल 2019 में शाहीन बाग में दिल्ली का मेला सजता था। हजारों-लाखों लोग यहां नागरिकता संशोधन बिल (CAA) के खिलाफ जुटे। वक्त के साथ सुस्त पड़ते आंदोलन को गर्म कॉफी की घूंट मिली, जब धरनास्थल पर ही एक दुधमुंहे की मौत हो गई। चंद रोज बाद बच्चे की मां दोबारा धरना दे रही थी। कैमरे धड़ाधड़ उसके लरजते होंठों और सूखी आंखों को कैद कर रहे थे। नन्हें बच्चे को अलविदा का चुंबन देकर लौटी उस मां ने आंदोलन को धार दे दी। वो शहीद की मां कहलाई। तीन महीने के बच्चे की ‘कुर्बानी’ बेकार नहीं गई।

जल्द ही दिल्ली की ये जगह महिलाओं से अट गई। वे इंकलाब का नया चेहरा थीं। हालांकि उन्हें बोलने की मनाही थी। औरतों के चारों ओर मर्दों का एक घेरा था, जिनका काम सवालों को औरतों तक पहुंचने से रोकना था। कुल मिलाकर, शाहीन बाग में गोश्त की पुतलियां बैठी थीं, जिनका काम दिल्ली की हड्डी-गलाऊ सर्दी में बिना आहट और बगैर आवाज के इंकलाब लाना था। बगैर आवाज इसलिए, क्योंकि अच्छी औरतें शोर नहीं करतीं। वो फुसफुसाती हैं, याचना करती हैं। ज्यादा हुआ तो थोड़ी ऊंची आवाज में रो सकती हैं, लेकिन विरोध कतई नहीं कर सकतीं।

वैसे भी विरोध के लिए खतरे उठाने होते हैं। घर से बाहर निकलना होता है। दुधमुंहे बच्चे या बुढ़ाते मां-बाप को छोड़कर। रसोई में सूखे बर्तन-भांडे छोड़कर। चलिए, कोई बेरहम औरत घर की ममता भुलाकर बाहर निकल भी गई तो भी खतरे खत्म नहीं होते। लैंपपोस्ट भले कम हों, लेकिन खतरे ज्यादा ही होंगे। वे रास्ते भर उसका इंतजार करते होते हैं। क्रांति मांगती औरत के साथ रेप हो सकता है। उसकी जबान काटकर फेंकी जा सकती है। या फिर एक और रास्ता भी है- उसे गायब किया जा सकता है। ये आजमाया हुआ रास्ता है।

क्रांति-क्रांति चिल्लाती औरत को ऐसे गायब कर दो, जैसे हवा में कपूर की डली घुल जाती है। तो लीजिए फिर! इतिहास के पन्नों से जनाना नाम या तो गायब हैं, या फिर हजारों नामों के बिल्कुल बीच में कहीं छिपे हैं। वहीं इंकलाबी पुरुषों का नाम किताब के फर्स्ट एडिशन की तरह है। जितना पुराना, उतना कीमती।

नेकदिल पुरुष केवल देश या दुनिया में आजादी नहीं लाते, वो औरतों को भी आजाद करते हैं। सती-प्रथा से आजादी एक पुरुष ने दिलाई। बाल विवाह रोकने वाले पुरुष ही थे। यहां तक कि कोख की आजादी के लिए लड़ने में भी पुरुष, महिलाओं से कहीं आगे हैं। वे औरतों को आजादी देते हैं। दिये ही जा रहे हैं। वैसे देने-दिलाने की बात पर एक किस्सा याद आता है।

कुछ साल पहले मुझे पंक्षी पालने का शौक चर्राया। बाजार से रंग-बिरंगी चिड़िया खरीद लाई। एक रोज इंकलाब की आग फड़फड़ाई और मैंने पिंजरे में कुदर-फुदर करती चिड़िया को आजाद कर दिया। वो पहले डगमगाई, फिर फुर्र् से उड़ गई। उस पूरा रोज मैं घमंड में डोलती फिरी कि मैंने भी किसी को आजादी दी। इसके बाद से जब भी मन उदास होता, मैं पिंजराबंद चिड़िया खरीदती और उसे आजादी देकर कुप्पा हो जाती। इतिहास का मिनी-वर्जन लिखा जाए तो मेरा और मुझ जैसों का भी नाम उसमें शामिल होगा। बस, नहीं होगा तो उन औरतों का जिक्र, जो सैनिकों की बीवियां है, या फिर किसानों की बीवियां।

सैनिक मोर्चे पर होते हैं, बीवियां घरों में। सैनिक फ्रोजन बीन्स खा रहे होते हैं, बीवियां मौसमी सब्जी के साथ गर्म चपाती। सैनिक बंदूकें चला रहे होते हैं, बीवियां टीवी का रिमोट। फर्क तो है, लेकिन ये आधा सच है। बाकी का सच ये है कि सैनिक निश्चिंत होकर बॉर्डर पर हैं, क्योंकि उनकी औरतों ने अंदरुनी मोर्चा संभाल रखा है। वे मौसमी सब्जियां पका रही होती हैं ताकि घर के बाकी सदस्य सेहतमंद रहें। वो टीवी का रिमोट थामे होती हैं ताकि पल-पल की खबर मिल सके। सैनिक लौटेगा तो सीने पर सुनहरा तमगा चमकेगा। न लौट सके तो धुन के साथ शहीद-राग बजेगा। औरत जहां थी, वहीं रहेगी। उन कहानियों के साथ, जो कोई नहीं सुनना चाहता।

किसान बीवियों के साथ भी यही होगा। मांगें मान ली गईं। आंदोलन छंटेगा। किसान लौटेंगे। किस्से-कहानियों से भरे हुए किसान चारपाई पर बैठकर शौर्यगाथा सुनाएंगे कि दिल्ली बॉर्डर कैसे उनके तेवरों से तमतमा गया। औरतें इन किस्सावीरों को चाय का गिलास थमाते हुए घोंट जाएंगी, उन कहानियों को, जो बीते सालभर से उनके साथ रही। कैसे रात-रातभर उन्होंने फसल की रखवाली की। कैसे साइकिल न चलाने वाली किसान पत्नी ने रातोंरात ट्रक चलाना सीख लिया। जब किसान दिल्ली किनारे बसे हुए थे, उनकी बीवियों ने कैसे घर को अकेले संभाला।

लाखों अनकही कहानियां हैं, जो सिंघु या टीकरी बॉर्डर से दूर गांवों में इंतजार कर रही हैं। अपने सुने जाने का। क्योंकि इंकलाब सिर्फ सीमाओं पर नहीं आता, बल्कि उन तमाम औरतों में बसता है, जो मोर्चे से दूर रोज लड़ाई लड़ रही हैं।

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