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आज की पॉजिटिव खबर:सरकारी नौकरी छोड़ खेती में हाथ आजमाया; 6 एकड़ जमीन से खेती शुरू की, फिर कांट्रैक्ट फार्मिंग पर आए, सालाना कारोबार सवा करोड़

छिंदवाड़ा8 महीने पहलेलेखक: विकास वर्मा
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मप्र के छिंदवाड़ा जिले के किसान गुरु प्रसाद पवार ने 6 एकड़ जमीन पर खेती से हुई कमाई से आज 50 एकड़ जमीन खरीद ली है। - Dainik Bhaskar
मप्र के छिंदवाड़ा जिले के किसान गुरु प्रसाद पवार ने 6 एकड़ जमीन पर खेती से हुई कमाई से आज 50 एकड़ जमीन खरीद ली है।

आज की कहानी है मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के एक छोटे से गांव बीजकवाड़ा में रहने वाले गुरु प्रसाद पवार की। गुरु बचपन से ही पढ़ाई में अच्छे थे, पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद पीटीआई (फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर) किया और साल 2004 में शिक्षा कर्मी वर्ग-2 में नौकरी भी लग गई। तब उन्हें 5000 रुपए महीना सैलरी मिलती थी। करीब तीन साल तक नौकरी करते हुए गुरु को समझ आया कि इतने पैसों से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल है। ऐसे में उन्होंने नौकरी के साथ-साथ खेती करना शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने अपनी 6 एकड़ पैतृक जमीन पर लहसुन की खेती की। इस खेती के लिए उन्होंने बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड बनवाया और डेढ़ लाख रुपए का लोन लिया।

करीब साढ़े चार महीने में लहसुन की फसल तैयार हुई और इसे बेचकर गुरु को 10 लाख रुपए फायदा हुआ। लिहाजा साल 2007 में उन्होंने नाैकरी छाेड़ दी और पूरी तरह खेती में आ गए। आज उनके पास अपनी 50 एकड़ जमीन है, जिससे वो सालाना सवा करोड़ रुपए का बिजनेस करते हैं और इससे उन्हें करीब 55 लाख रुपए की कमाई होती है।

गुरु कहते हैं, ‘जब पहली बार लहसुन की फसल से फायदा हुआ तब उससे मैंने 6 एकड़ खेत भी खरीद लिया। तब मुझे 80 हजार से 1 लाख रुपए एकड़ तक में कृषि की जमीन मिल जाती थी। इसके बाद मैं हर साल थाेड़ी-थाेड़ी जमीन खरीदने लगा। आज मेरे पास अपनी 50 एकड़ कृषि भूमि है।

गुरु ने कम पानी में खेतों की सिंचाई करने के लिए ड्रिप इरीगेशन सिस्टम लगाया है।
गुरु ने कम पानी में खेतों की सिंचाई करने के लिए ड्रिप इरीगेशन सिस्टम लगाया है।

दरअसल, उनके गांव में पानी की समस्या थी इसलिए गुरु ने इसका समाधान खोजने के लिए कई कृषि वैज्ञानिकों से बातचीत की और फिर ऐसा फसल चक्र तैयार किया, जिससे एक साल में रबी और खरीफ, दोनों फसलों की अधिकतम पैदावार मिल सके। उन्होंने रबी और खरीफ फसलों के बीच कुछ ऐसी फसलें भी उगाने की सोची, जिससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम न हो और फसल अच्छी हो। इसके अलावा कम पानी में सिंचाई करने ड्रिप इरीगेशन तकनीक का सहारा लिया। इससे उन्हें फायदा तो हुआ ही साथ ही खेत में लेबर चार्ज की भी कमी आई।

अपनी किसानी के तरीके के बारे में वे आगे बताते हैं, ‘मैं अपने खेतों में साल भर में तीन फसलें पैदा करता हूं और ये सब नगदी फसलें होती हैं। इसमें शुरुआत में हम सितंबर-अक्टूबर में लहसुन लगाते थे, जो कि फरवरी-मार्च में तैयार हो जाता था। इसके तुरंत बाद गोभी लगाते थे, मई-जून में यह फसल तैयार होने के बाद खेत में स्वीट कॉर्न लगा देते थे। गोभी और स्वीट कॉर्न की फसल 60-65 दिनाें में तैयार हो जाती है। साल 2012 के बाद यही शेड्यूल चलता रहा, लेेकिन फिर हमने पेप्सिको के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की शुरुआत की और लहसुन की जगह सितंबर-अक्टूबर में आलू उगाने लगे। यह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अभी तक चल रही है।

हमारी स्थिति उन किसानों से काफी अच्छी है जो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग नहीं कर रहे हैं
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को गुरु किसानों के लिए फायदेमंद ऑप्शन मानते हैं। इसके फायदे गिनाते हुए वे कहते हैं, ‘इसमें कॉन्ट्रैक्ट के बावजूद भी यह किसान पर निर्भर रहता है कि वो उन्हें पूरी फसल दे या न दे। इसके अलावा कंपनियां किसानों को मार्केट से सस्ती दरों पर बीज उपलब्ध कराती हैं। इसके अलावा कंपनी के लोग खेतों में आकर विजिट करते हैं, कब कौन सी खाद का छिड़काव होना है, सब बताते हैं।

इन सबके बावजूद भी अगर मार्केट में फसल के रेट कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में तय रेट से ज्यादा हैं, तो कंपनी किसान को उनकी फसल का रेट बढ़ाकर देती है।​​​

पेप्सिको के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे गुरु सितंबर-अक्टूबर में अपने पूरे खेत में आलू लगाते हैं, जो कि दिसंबर तक तैयार हो जाता है।
पेप्सिको के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे गुरु सितंबर-अक्टूबर में अपने पूरे खेत में आलू लगाते हैं, जो कि दिसंबर तक तैयार हो जाता है।

पिछले साल का उदाहरण देते हुए गुरु कहते हैं, ‘कंपनी ने 27.70 रुपए प्रति किलाे की दर से हमें सीड दिया था। वहीं जिस रेट पर आलू खरीदना तय हुआ था, उसके तहत 30 नवंबर तक 16.64 रुपए, 1 से 15 दिसंबर तक 15.30 रुपए और 15 से 31 दिसंबर तक 14.09 रुपए का रेट तय था। लेकिन, आलू का मार्केट तेज था तो कंपनी ने हमसे दिसंबर में 24 रुपए प्रति किलो के हिसाब से आलू खरीदा। वहीं 30 जनवरी तक जो आलू गया वो भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तय रेट से 3 रुपए ज्यादा पर किसानों से खरीदा गया।’

उनका कहना है कि ​​​​​​​कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के नाम पर देश में किसानों को गुमराह किया जा रहा है। आज छिंदवाड़ा जिले के 500 से ज्यादा किसान पेप्सिको के साथ ​​​​​​​कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे हैं। उन सबकी स्थिति उन किसानों से काफी अच्छी है, जो ​​​​​​​कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग नहीं कर रहे हैं। यहां आलम ये है कि छिंदवाड़ा जिले के किसान तो ​​​​​​​कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करना चाहते हैं, लेकिन कंपनी का अपना टारगेट रहता है कि उन्हें साल भर में कितना आलू खरीदना है।

गुरु अपने खेत में हर साल तीन फसलें उगाते हैं, ये सभी नगदी फसलें होती हैं।
गुरु अपने खेत में हर साल तीन फसलें उगाते हैं, ये सभी नगदी फसलें होती हैं।

साल में तीन फसलें उगाते हैं, ये वो फसलें होती हैं जिनकी मार्केट में डिमांड है
गुरु बताते हैं, ‘सितंबर-अक्टूबर में हम पेप्सिको के साथ ​​​​​​​कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर पूरे खेत में आलू लगाते हैं, जो कि दिसंबर तक तैयार हो जाता है। इसके बाद जनवरी-फरवरी में खेतों में सब्जी लगाते हैं, अभी 30 एकड़ में फूल गोभी लगी है और 20 एकड़ में तरबूज-खरबूज लगे हैं। बाकी हिस्से में गेहूं लगाते हैं, जो कि खुद के लिए होता है, हम इसे बेचते नहीं हैं। अप्रैल-मई में जब खेत खाली हो जाता है तो हम उसमें स्वीट कॉर्न लगाते हैं।’

गुरु कहते हैं कि उनके यहां उगाया गया पूरा स्वीट कॉर्न महाराष्ट्र और जबलपुर जाता है। इसके लिए व्यापारी खुद खेत में आकर फसल देखते हैं, रेट तय करते हैं और खेत से ही माल उठाकर ले जाते हैं। गुरु का कहना है कि वो अपनी किसानी से संतुष्ट हैं। वो कहते हैं, ‘अगर मैं टीचर होता तो मेरे पास सिर्फ मोटरसाइकिल होती, लेकिन आज मेरे पास एक बहुत बड़ा घर है, गाड़ियां हैं, जिले का सबसे बड़ा ट्रैक्टर भी है।

साल 2019 में गुरु प्रसाद पवार को जिला व राज्य स्तर पर प्रगतिशील कृषक के तौर पर सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा ​​​​​​​कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए अपनी और अन्य किसानों की आय बढ़ाने के लिए भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। गुरु कहते हैं, ‘आज भी कई किसानों को लगता है कि खेती फायदे का सौदा नहीं है, लेकिन मेरा मानना है कि खेती लाभ का धंधा है, बस इसे करते समय पारंपरिक तौर-तरीके बदलने की जरूरत है।’

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