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आज की पॉजिटिव खबर:अखबार में अपने शहर की गंदगी के बारे में पढ़ा तो विदेश की जॉब छोड़ घर-घर कचरा इकट्ठा करने लगे, 122 लोगों को नौकरी दी, खुद भी लाखों कमा रहे

नई दिल्ली2 महीने पहले

मैं 5 साल से स्विट्जरलैंड में वेस्ट मैनेजमेंट पर काम कर रहा था। अच्छी सैलरी और हर तरह की सुविधा थी। किसी चीज की दिक्कत नहीं थी। एक दिन अखबार में छपी एक खबर पर मेरी नजर गई। जिसमें मेरे होमटाउन असम के तिनसुकिया जिले को सबसे गंदा शहर बताया गया था। खबर पढ़ने के बाद मुझे काफी तकलीफ पहुंची। मैं सोचने लगा कि विदेश में रहकर स्वर्ग को स्वर्ग बना रहा हूं, लेकिन अपने शहर के लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं, ऐसे में मेरे मिशन का क्या मतलब है, जब खुद का शहर ही गंदा हो।

साल 2018 में मैंने नौकरी छोड़ी दी और अपने शहर की गंदगी मिटाने की मुहिम में जुट गया। आज मेरा शहर लगभग वेस्ट फ्री हो गया है, लोग जागरूक हो गए हैं। इतना ही नहीं अब असम के दूसरे जिले भी वेस्ट फ्री हो रहे हैं। लोगों को काम मिल रहा है, महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। बदलाव की इस कहानी को गढ़ने वाले शख्स का नाम संजय गुप्ता है, जो लंबे वक्त से वेस्ट मैनेजमेंट पर काम कर रहे हैं।

पढ़ाई के दौरान ही वेस्ट मैनेजमेंट पर काम करना शुरू कर दिया था

संजय गुप्ता लंबे वक्त से वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़े रहे हैं। उन्होंने भारत में और भारत के बाहर इससे जुड़े कई प्रोजेक्ट के लिए काम किया है।
संजय गुप्ता लंबे वक्त से वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़े रहे हैं। उन्होंने भारत में और भारत के बाहर इससे जुड़े कई प्रोजेक्ट के लिए काम किया है।

49 साल के संजय गुप्ता की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव में ही हुई, उसके बाद बैचलर्स की पढ़ाई के लिए वे इलाहाबाद चले गए। इसके बाद उन्होंने JNU में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने मास्टर्स और फिर पीएचडी की डिग्री हासिल की। संजय कहते हैं कि JNU में पढ़ाई के दौरान ही वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी थी। कैंपस में जहां भी गंदगी दिखती, उसे साफ करने में हम लग जाते थे। तब हमारा मोटिव था कैंपस को जीरो वेस्ट बनाना और हम बहुत हद तक उसमें कामयाब भी हुए। इसके बाद मैंने तय किया कि आगे इसी फील्ड में करियर बनाऊंगा।

JNU से पढ़ाई पूरी करने के बाद संजय गुप्ता की जॉब लग गई। 2013 तक उन्होंने अलग-अलग संस्थानों के लिए वेस्ट मैनेजमेंट और इससे जुड़े प्रोजेक्ट पर काम किया। इसके बाद वे स्विट्जरलैंड चले गए। अपनी इस मुहिम की कहानी को लेकर संजय बताते हैं कि तीन साल पहले जब मुझे अपने होमटाउन की गंदगी के बारे में पता चला तो मैंने सरकार और जिले के अधिकारियों को लेटर लिखा। उन्हें बताया कि मैं वेस्ट मैनेजमेंट पर काम कर रहा हूं और अब अपने राज्य और शहर के लिए कुछ करना चाहता हूं। इसको लेकर सरकार से पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिला और मैं असम लौट आया।

बहुत कम लोग अवेयर थे, जिसे जहां मन किया कचरा फेंक देता था

संजय गुप्ता की टीम हर तरह के वेस्ट कलेक्ट करती है। इसके बाद वे लोग वेस्ट को सेग्रिगेट करके आगे की प्रोसेसिंग करते हैं।
संजय गुप्ता की टीम हर तरह के वेस्ट कलेक्ट करती है। इसके बाद वे लोग वेस्ट को सेग्रिगेट करके आगे की प्रोसेसिंग करते हैं।

संजय गुप्ता कहते हैं कि यहां आने के बाद पता चला कि मुसीबत वाकई बहुत बड़ी है। शहर में गंदगी तो थी ही, साथ ही लोगों की आदतें भी सही नहीं थीं। जिसको जहां मन किया वहां कचरा फेंक देता था। सूखा कचरा और गीला कचरा सब मिक्स कर देते थे। होटल और दुकानों के बाहर वेस्ट का ढेर लगा रहता था। बहुत कम लोग ही अवेयर थे। इसके बाद मैं नगर निगम के अधिकारियों से मिला और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर अपनी एक टीम तैयार की।

सबसे पहले उन्हें वेस्ट मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी। सूखे और गीले कचरे का फर्क बताया। हर तरह के कचरे को कैसे अलग करना है, इसकी प्रोसेस समझाई और फिर अपने काम में जुट गए। हमारी टीम लोगों के घर-घर जाकर वेस्ट कलेक्ट करने लगी। इसका असर भी दिखा और एक साल के भीतर ही शहर की आधी गंदगी साफ हो गई, लोग अवेयर होने लगे, वे इधर-उधर कचरा फेंकने की बजाए, डस्टबिन में वेस्ट इकट्ठा करने लगे।

संजय गुप्ता की टीम के लोग रोज लोगों के घर-घर जाकर वेस्ट कलेक्ट करते हैं। बदले में लोगों से वे 50 से 100 रुपए मंथली चार्ज करते हैं।
संजय गुप्ता की टीम के लोग रोज लोगों के घर-घर जाकर वेस्ट कलेक्ट करते हैं। बदले में लोगों से वे 50 से 100 रुपए मंथली चार्ज करते हैं।

इसके बाद हमने अपने काम का दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया। तिनसुकिया जिले के साथ ही तीताबर और बाकी शहरों में भी हमने अवेयरनेस फैलाना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग हमारी मुहिम से जुड़ते गए और हमारी टीम बढ़ती गई। आज हमारी टीम में 122 लोग काम करते हैं। इनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। अब तक हम लोग 500 टन वेस्ट कलेक्ट कर चुके हैं। 50 लाख से ज्यादा प्लास्टिक बॉटल रिसाइकिल्ड कर चुके हैं।

कैसे करते हैं काम? क्या है वेस्ट मैनेजमेंट का मॉडल?
संजय गुप्ता ने केयर नॉर्थ ईस्ट फाउंडेशन नाम से खुद का ऑर्गेनाइजेशन बनाया है। वे कहते हैं कि हमने एरिया के हिसाब से अलग-अलग टीमें बनाई हैं। इनमें वेस्ट कलेक्ट करने वाले, उन्हें सेग्रिगेट करने वाले और ड्राइवर शामिल हैं। ये लोग हर दिन सुबह एक निश्चित समय पर अपने-अपने एरिया में जाते हैं और लोगों के घर से वेस्ट कलेक्ट करके अपनी यूनिट तक लाते हैं। यहां हम वेस्ट का एनालिसिस करते हैं। सूखा वेस्ट, गीला वेस्ट, प्लास्टिक वेस्ट, पेपर वेस्ट, रिसाइकिल्ड होने वाले वेस्ट, डिकंपोज करने वाले वेस्ट और ऑर्गेनिक वेस्ट को अलग-अलग करते हैं।

संजय गुप्ता और उनके साथी ऑर्गेनिक वेस्ट को प्रोसेस करके खाद तैयार करते हैं। हर साल वे लोग 2.5 टन खाद तैयार कर रहे हैं।
संजय गुप्ता और उनके साथी ऑर्गेनिक वेस्ट को प्रोसेस करके खाद तैयार करते हैं। हर साल वे लोग 2.5 टन खाद तैयार कर रहे हैं।

इसके साथ ही हमने होटल वाले, दुकानदार और बड़ी कंपनियों से भी टाइअप किया है। हमारी टीम उनके यहां से सभी तरह के वेस्ट कलेक्ट करती है। शहर में कोई कार्यक्रम या इवेंट होता है तो हम वहां से भी वेस्ट कलेक्ट करते हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर इतने वेस्ट का होता क्या है? संजय बताते हैं कि रिसाइकिल्ड होने वाले वेस्ट को हम लोग कबाड़ी वाले को बेच देते हैं। इससे जो कुछ आमदनी होती है वह वेस्ट कलेक्ट करने वाली टीम की होती है। जो वेस्ट रिसाइकिल्ड नहीं किए जा सकते, उन्हें हम डंप कर देते हैं। इसके बाद जो ऑर्गेनिक वेस्ट बचते हैं, उनसे हम लोग खाद तैयार करते हैं। अब तक हमारी टीम 2.5 टन से ज्यादा खाद तैयार कर चुकी है।

फंड कहां से लाते हैं, सोर्स ऑफ इनकम क्या है?
संजय कहते हैं कि CSR की तरफ से हमें कुछ फंड मिला है। उन्होंने वेस्ट कलेक्ट करने के लिए हमें 23 गाड़ियां उपलब्ध कराई हैं। कुछ मदद हमें नगर निगम से भी मिलती है। इसके अलावा जिन घरों से हम वेस्ट कलेक्ट करते हैं उनसे 50 रुपए से लेकर 100 रुपए तक महीना हम चार्ज करते हैं। इसी तरह होटल वालों और दुकानदारों से भी हम कुछ चार्ज लेते हैं। इसका कोई रेट फिक्स नहीं है। कई लोग पैसे नहीं देते हैं, फिर भी हम उनके यहां से वेस्ट कलेक्ट करते हैं। अभी करीब 20 हजार घरों तक हमारी टीम पहुंच रही है। इससे हर साल करीब 6 से 7 लाख रुपए कलेक्ट हो जाते हैं।

संजय कहते हैं कि व्यक्तिगत लेवल पर मैं कानपुर और देश के दूसरे हिस्सों के लिए भी काम कर रहा हूं। कई राज्यों में मेरा मॉडल अपनाया जा रहा है। जल्द ही हम बिहार में अपना प्रोजेक्ट शुरू करने वाले हैं।

संजय बताते हैं कि ऑर्गेनिक वेस्ट से खाद तैयार करने में करीब 70 दिन का वक्त लगता है। 25 से 30 टन कचरे से एक किलो खाद बनता है।
संजय बताते हैं कि ऑर्गेनिक वेस्ट से खाद तैयार करने में करीब 70 दिन का वक्त लगता है। 25 से 30 टन कचरे से एक किलो खाद बनता है।

करियर के लिहाज से भी वेस्ट मैनेजमेंट में बेहतर स्कोप है
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 150 लाख टन प्लास्टिक वेस्ट निकलता है। इसमें से महज 25% ही रिसाइकिल्ड हो पाता है। इससे आप समझ सकते हैं कि यह कितनी बड़ी चुनौती है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर अभियान चला रही हैं। कई शहरों में प्लास्टिक वेस्ट कलेक्शन सेंटर भी बने हैं। जहां लोगों को कचरे के बदले पैसे मिलते हैं। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) के तहत देश में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर कई प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

अगर कोई इस सेक्टर में करियर बनाना चाहता है तो उसे सबसे पहले प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को समझना होगा। उसकी प्रोसेस को समझना होगा। इसको लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकार ट्रेनिंग कोर्स भी करवाती हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल से इसकी ट्रेनिंग ली जा सकती है।

देश में कई ऐसे छोटे-बड़े स्टार्टअप हैं, जो वेस्ट से ईकोफ्रेंडली प्रोडक्ट बनाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। दिल्ली की रहने वाली कनिका आहूजा भी उनमें से एक हैं, जो न सिर्फ कचरे की समस्या से छुटकारा दिलाने की पहल कर रही हैं, बल्कि इससे ईकोफ्रेंडली बैग, पर्स, फैब्रिक प्रोडक्ट और हैंडीक्राफ्ट आइट्स की मार्केटिग करके सालाना 50 लाख रुपए की कमाई भी कर रही हैं। उन्होंने 200 से ज्यादा लोगों को रोजगार से भी जोड़ा है। (पढ़िए पूरी खबर)

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