मुंबई हमले के 13 साल:कसाब को पहचानने वाली 9 साल की बच्ची की कहानी, गवाही के बाद कैसे डरपोक रिश्तेदारों ने फेर लिया मुंह

10 महीने पहलेलेखक: देविका रोटावन

26 नवंबर 2008 की वो खौफनाक रात, जिसके जिक्र से ही मेरी रूह कांप जाती है। तेरह बरस हो गए, लेकिन ना तो उस रात का खौफ दिल से गया है और ना ही मेरे घाव भरे हैं। तब मेरी उम्र 9 साल 11 महीने थी। मैंने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन (CST) पर चारों तरफ खून की होली, लाशें देखी थीं। एक राक्षस को गोली चलाते और हंसते हुए देखा था। मेरे दाहिने पैर में उसकी गोली लगी, 6 महीने में 6 सर्जरी हुई, TB की बीमारी भी हो गई। जब मैं मुख्य गवाह बनी तो बैसाखी के सहारे कोर्ट में पहुंचकर बिना डरे मैंने ही आतंकवादी अजमल कसाब को पहचाना और उसे फांसी के तख्ते तक पहुंचाया।

मेरी इस बहादुरी का यह इनाम मिला कि मुझे जान से मारने की लगातार धमकियां आती रहीं, रिश्तेदारों और समाज के लोगों ने हमसे दूरियां बना लीं। पापा का बिजनेस बर्बाद हो गया। घर का किराया देने और खाने के लाले पड़ गए। नेताओं, मंत्री और अफसरों ने घर देने और मेरी पढ़ाई का जिम्मा उठाने के जो वादे किए, 13 साल बाद भी पूरे नहीं हुए। मैंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री के दफ्तर तक चक्कर काटने के बाद अब न्याय के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

जी मेरा नाम देविका रोटावन है, अब मैं 22 साल की हूं और उस हमले की पीड़िता और चश्मदीद गवाह हूं। मैं अपने पापा और विकलांग भाई के साथ बांद्रा की सरकारी कॉलोनी के एक छोटे से कमरे में रह रही हूं। आर्थिक तंगी से परिवार टूट चुका है।

चलिए आज उस हमले की 13वीं बरसी पर मैं उस खौफनाक रात की दास्तां बताती हूं...

जब मैं मुख्य गवाह बनी तो बैसाखी के सहारे कोर्ट में पहुंचकर बिना डरे मैंने ही आतंकवादी कसाब को पहचाना और उसे फांसी के तख्ते तक पहुंचाया।
जब मैं मुख्य गवाह बनी तो बैसाखी के सहारे कोर्ट में पहुंचकर बिना डरे मैंने ही आतंकवादी कसाब को पहचाना और उसे फांसी के तख्ते तक पहुंचाया।

26 नवंबर 2008 की उस शाम मैं अपने पिता नटवरलाल रोटावन और छोटे भाई जयेश के साथ बड़े भाई भरत से पुणे मिलने जा रही थी। हम लोग मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन (CST) के प्लेटफार्म 12 पर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। तभी अचानक लोगों की चीखने, चिल्लाने और भागो-भागो की आवाजें आने लगीं। बीच-बीच में गोलियों की तेज आवाज और धमाके सुनाई देने लगे। पिता ने मेरा हाथ पकड़ा और भीड़ के साथ भागने की कोशिश करने लगे।

इसी बीच मेरे दाहिने पैर में गोली लगी, मैं वहीं गिर पड़ी। सामने एक व्यक्ति हंसते हुए लोगों पर गोलियां चला रहा था। मेरे सामने ही कई लोग उसकी गोलियों का शिकार हुए। कुछ ही पल में इधर-उधर लाशें दिखने लगीं। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। कुछ देर बाद मैं बेहोश हो गई। जब होश आया तो मैं सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल में थी। मेरी तरह कई लोग वहां थे, डॉक्टर्स टांके लगा रहे थे, गोली निकाल रहे थे। वह सब देखकर मैं बहुत डरी थी।

वहां से मुझे जेजे अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया। 27 नवंबर को मेरे पैर से गोली निकाली गई। मेरे पैर की हड्डी टूट चुकी थी। वहां मेरे 6 सर्जिकल ऑपरेशन हुए। 6 महीने तक मैं अस्पताल में रही। वहां से डिस्चार्ज होने के बाद अपने गांव राजस्थान चली गई। वहां पर मुंबई क्राइम ब्रांच से मेरे काका को कांटैक्ट किया गया। फिर मुझसे बात की और कहा कि आप कोर्ट में आने के लिए तैयार हो। कसाब को पहचान जाओगे। डरोगे तो नहीं, पीछे तो नहीं हटोगे।

मैं 6 महीने तक अस्पताल में रही। इस दौरान 6 सर्जरी हुई। मेरा भाई मेरी देखभाल करता था।
मैं 6 महीने तक अस्पताल में रही। इस दौरान 6 सर्जरी हुई। मेरा भाई मेरी देखभाल करता था।

उस आतंकी का खौफनाक चेहरा आंखों के सामने आते ही मैं सहम गई, लेकिन उसकी बर्बरता और खूंखार हंसी से लबरेज गोलीबारी ने हौसला बढ़ा दिया। मैंने गवाही देने के लिए हामी भर दी। मैंने कहा कि उन राक्षस को मैं पहचानने के लिए तैयार हूं। पापा ने दोनों आतंकवादी को देखा और मैंने कसाब को देखा था। फिर 10 जून को मेरी और पापा की कोर्ट रूम में गवाही हुई।

जब मैं कोर्ट रूम में गई तब मैं बैसाखी से चलती थी। कसाब को देखकर मन तो ऐसा हुआ कि इसे बैसाखी फेंक कर मारूं या कोई मुझे बंदूक दे दे तो मैं उसे गोली मार दूं। उसे अभी फांसी पर लटका दूं। मेरे सामने तीन आतंकवादी बैठे थे, मुझे उनमें से कसाब को पहचानना था। जो जज साहब के साइड में फर्स्ट में बैठा था वो था आतंकवादी कसाब। मैंने वहां कसाब को आइडेंटिफाई किया।

उस गवाही के बाद मेरी पूरी जिंदगी बदल गई। कसाब की पहचान लिए जाने की बात जब मीडिया से होते हुए रिश्तेदारों और पड़ोसियों तक पहुंची, तो सब का रवैया बदल गया। मेवे के कारोबारी मेरे पिता को होलसेलरों ने माल (मेवा) देना बंद कर दिया। उनका धंधा बंद हो गया। स्कूल वालों ने मेरा नाम काट दिया। पड़ोसियों ने दूरी बना ली। कर्ज देने को कोई तैयार नहीं था। लोगों को डर था कि कहीं आतंकवादी उनके घरों, दुकानों या रिश्तेदारों पर हमला न कर दें। वे कहने लगे कि आप तो मरोगे हमें क्यों मारना चाहते हो। कसाब छूट कर आया तो आपको तो मारेगा ही हमें भी नहीं छोड़ेगा, जाओ कहीं और चले जाओ। मेरी हालत गुनहगार जैसी हो गई।

मैं अपने पापा और भाई के साथ किराए के कमरे में रहती हूं। घर देने का वादा तो किया गया लेकिन अभी तक फ्लैट अलॉट नहीं हुआ।
मैं अपने पापा और भाई के साथ किराए के कमरे में रहती हूं। घर देने का वादा तो किया गया लेकिन अभी तक फ्लैट अलॉट नहीं हुआ।

जब मैं हॉस्पिटल में एडमिट थी तो भाई मेरे साथ रहता था। मेरी ड्रेसिंग करता था, वहां लोगों ने कहा कि जयेश तुम अपनी बहन की ड्रेसिंग करते हो दूसरों की भी कर दिया करो। तब भाई को बताया नहीं गया था कि ड्रेसिंग के वक्त ग्लव्स पहने, मास्क पहने। भाई ने उसका ध्यान नहीं दिया। दूसरों की बीमारी से भाई को गले में इंफेक्शन और गांठ हो गई। उसका इलाज चला फिर उसकी पीठ की रीढ़ की हड्‌डी बाहर निकल आई। बैक बोन में प्रॉब्लम हो गई। आज मेरा भाई खुद हैंडीकैप्ड है। वो मुझसे बड़े हैं, आप देखोगे तो मुझसे छोटे लगते हैं। उनका शरीर पूरी तरह से झुक चुका है।

मेरे पापा के पास पाकिस्तान से फोन आते थे। हमें रुपए देकर बयान बदलने के लिए धमकाया जाता था। हम नहीं माने तो पूरे परिवार को जान से मारने तक धमकी दी गई। इसके बावजूद मैंने बैसाखी पर कोर्ट में कसाब के खिलाफ गवाही दी। हमें कहा गया था कि इस केस से हट जाओ नहीं तो आपको मार देंगे, काटकर टुकड़े-टुकड़े कर देंगे। हमें डराने का प्रयास किया, लेकिन मैंने सोच लिया था कि चाहे जो हो जाए मैं गवाही दूंगी, देश के इस दुश्मन के खिलाफ।

गवाह बनने के बाद मुझे लोगों ने कहा कि तुमने बहुत बहादुरी का काम किया है बेटी। देश को तुम पर नाज है। उस वक्त महाराष्ट्र सरकार के कई नेता और मंत्री लोग भी आए। उन्होंने कहा कि आपके लिए घर का इंतजाम होगा और आपकी पढ़ाई का पूरा जिम्मा उठाएंगे। साथ ही पापा के बिजनेस में हेल्प करेंगे, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। सिर्फ बोल बचन, झूठे वादे किए गए। उस दौरान कलेक्टर ऑफिस से दो लोग हमारे घर आए। उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से आपको घर अलॉट हुआ। वे हमारे साइन लेकर गए पेपर पर। हमने उनसे कहा कि हमें इसका जेरॉक्स पेपर दे दीजिए। उन्होंने कहा कि आपको दो दिन में सारे पेपर मिल जाएंगे।

मेरी देखभाल करते-करते मेरा भाई बीमार हो गया। बैक बोन में प्रॉब्लम हो गई। आज मेरा भाई हैंडीकैप्ट है।
मेरी देखभाल करते-करते मेरा भाई बीमार हो गया। बैक बोन में प्रॉब्लम हो गई। आज मेरा भाई हैंडीकैप्ट है।

उन्होंने जो कॉन्टेक्ट नंबर दिया था, उस पर लगाया तो पता चला रॉन्ग नंबर है। जब हम कलेक्टर ऑफिस गए तो पता चला वह कलेक्टर ऑफिस का ही नंबर है, लेकिन वहां न तो कलेक्टर ने हमारी सुनी न दूसरे अधिकारियों ने। आज 13 साल हो गए उस बात को। दर-दर चक्कर लगाने के बाद अब मैंने हाईकोर्ट में इंसाफ के लिए गुहार लगाई है। अब बस कोर्ट से उम्मीद है, मैं थक चुकी हूं, बुरी तरह टूट चुकी हूं। जहां गोली लगी उसके कारण चलने में तकलीफ होती है, ठंड में दर्द भी होता है।

हमारी हालत बहुत खराब है, आर्थिक तंगी के चलते किराए देने में भी असमर्थ हो रहे हैं। लॉकडाउन में भूखे मरने जैसी नौबत आ गई। पापा जिस शॉप में काम करते थे, वो बंद हो गई। भाई विकलांग है, घर पर हैं, पापा की भी तबीयत ठीक नहीं रहती। मां 2006 में ही दुनिया छोड़ चुकी हैं। रिश्तेदार हमसे मुंह मोड़ चुके हैं। मैंने मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को ट्वीट कर स्थिति बताई। मंत्रालय के चक्कर काटे, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे को भी पत्र लिखे, ट्वीट किए, मिलने की कोशिश की, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

मुझे पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से 10 लाख की सहायता राशि मिली थी जो मेरे टीबी के इलाज में खर्च हो गई, अगर वो मदद नहीं मिलती तो मैं बचती नहीं। मैं इसके लिए शुक्रगुजार हूं लेकिन जो वादे मेरे से किए गए, वे अभी तक पूरे नहीं हो पाए हैं।

कई लोग मेरा सम्मान करते हैं। मेरी बहादुरी की इज्जत करते हैं, लेकिन अभी भी मेरी मांगें पूरी नहीं हुई हैं।
कई लोग मेरा सम्मान करते हैं। मेरी बहादुरी की इज्जत करते हैं, लेकिन अभी भी मेरी मांगें पूरी नहीं हुई हैं।

सरकार कहती है बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। मैं भी तो देश की एक बेटी हूं। मेरी आवाज उनके पास क्यों नहीं पहुंचती। मुझे जान-बूझकर इग्नोर किया जाता है। ऐसा लग रहा है कि मैं सिर्फ एक तमाशा बनकर बैठ गई हूं।

गोली और फिर टीबी की बीमारी होने के कारण मेरी पढ़ाई का चार साल लॉस हो चुका है। मैं अभी चेतना कॉलेज से बीए सेकंड ईयर की पढ़ाई कर रही हूं। आगे चलकर यूपीएसी की तैयारी करुंगी और आईपीएस बनूंगी। मुझे दुख है कि मैंने किसके लिए यह कदम उठाया, जिसके चलते आज उसका परिवार न घर का रहा है, न घाट का, लेकिन मुझे मिले दर्जनों ‘अवॉर्ड’ सम्मान मुझे हमेशा देश सेवा के लिए प्रेरित करते हैं।

मैं देश और समाज से यही कहना चाहती हूं कि जब मैं विटनेस बनी। जो मेरे साथ हुआ किसी और के साथ ऐसी तकलीफ नहीं होनी चाहिए। अगर किसी के साथ प्रॉब्लम होती है तो उसके साथ खड़े हों। उसका मजाक मत बनाइए। अगर देश में कुछ हो रहा है कहीं एक्सीडेंट हो रहा है ताे लोग डर जाते हैं। पुलिस केस में नहीं जाते कोर्ट कचहरी से घबराते हैं। मेरा कहना है कि उसका डटकर सामना कीजिए। आप उससे भागो मत। अब आप भागोगे तो उस गुनहगार को सजा नहीं मिलेगी। हमें लड़ना आना चाहिए, हमें सामने वाले को मुंहतोड़ जवाब देना आना चाहिए।

देविका रोटावन ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर राजेश गाबा से शेयर की हैं...