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जानना जरूरी है:मोहन भागवत ने कहा- हर भारतीय का DNA एक, साइंस और इतिहास कहते हैं- ऐसा नहीं है, फिर चुनाव के वक्त DNA का मुद्दा क्यों उछाला जाता है?

5 दिन पहलेलेखक: जनार्दन पांडेय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) चीफ मोहन भागवत का कहना है कि हर भारतीय का DNA एक है। हम किसी भी धर्म को मानते हों, पर हमारे DNA में कोई फर्क नहीं है। इसलिए हिन्दू-मुस्लिम एकजुटता जैसी बातों का कोई आशय नहीं है, लेकिन उनके इस बयान के मतलब बड़े हैं। उन्होंने ये बयान उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दिया है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यूपी चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। वहां पहले से ही धर्मांतरण, 2 चाइल्‍ड पॉलिसी जैसे मुद्दों पर लोग दो हिस्सों में बंटकर बहस कर रहे हैं। और अब DNA। ये चर्चा और जोर पकड़े, इससे पहले ये जानना जरूरी है कि मोहन भागवत के दावे में सच्चाई कितनी है।

हमारे मां-बाप की खानदान से आता है DNA
डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (DNA) यानी आपके शरीर की कोडिंग। आपकी हाइट कितनी बढ़ेगी, आपकी नाक कितनी लंबी होगी और आप सोचेंगे कैसे, ये सब कुछ DNA की कोडिंग से ही तय होता है। हमारा शरीर 200 तरह की कोशिकाओं से बना है। ये DNA उसी के अंदर केमिकल से बने महीन किस्म के बुने हुए धागों की तरह होता है। ये हमारे भीतर हमारे मां-बाप के जरिए आता है।

इसमें 2 खास बाते हैं। पहली, क्रोमोसोम। ये केवल हमारे माता-पिता से मिलती है। लेकिन हमारे DNA के जीन्स चाचा, नाना, ताऊ, दादा, यानी मां और बाप दोनों की खानदानों में से किसी के भी जीन्स से मेल खा सकते हैं।

ये भी मुमकिन है कि हमारे पिता, दादा या परदादा किसी के भी बाल न झड़ते रहे हों, लेकिन हमारे बाल झड़ें। ऐसा इसलिए कि बाल झड़ने वाले जीन्स तीन पीढ़ियों तक एक्टिव न रहे हों और वो चौथी पीढ़ी में एक्टिव हो गए हों।

भारतीयों की नस्ल में कई तरह के DNA
साइंस की ये थ्योरीज कहती हैं एक ही शख्स के DNA में दो अलग-अलग पीढ़ियों के जीन्स आ सकते हैं। इससे ये बात साबित हो जाती है कि हम भारतीयों के DNA में पश्चिमी देशों के जीन्स आने के आसार बहुत ज्यादा हैं, क्योंकि पुर्तगाल, फ्रांस, यूके, ग्रीस के लोग लंबे समय तक भारत में रहे और हमारे यहां की महिलाओं से शादी की, बच्चे पैदा किए।

यहां तक कि जब देश आजाद हुआ तो संसद में एंग्लो-इंडियंस के लिए अलग से दो सीटें रिजर्व कर दी गईं। एंग्लो-इंडियन यानी भारतीय महिलाओं से पैदा होने वाले ‌अंग्रेजों के बच्चे, या फिर ब्रिटिश महिलाओं से पैदा हुए भारतीयों के बच्चे। इनके DNA में भारत और पश्चिमी देशों, दोनों के जीन्स हैं।

डेक्‍कन कॉलेज की स्टडी के चलते होता है हर भारतीय के एक DNA का दावा
फिर मोहन भागवत का कहना कि हमारा DNA एक ही है, ये पूरा सच नहीं है। लेकिन जिस आधार पर वो ये बात कह रहे हैं, वो आपको बता देते हैं। असल में हरियाणा के राखीगढ़ी में खुदाई में कुछ कंकाल मिले थे। हॉर्वर्ड, बोस्टन, लखनऊ यूनिवर्सिटी और डेक्कन कॉलेज के 30 इतिहासकार इस पर रिसर्च कर रहे थे। डेक्कन कॉलेज के पूर्व प्रमुख डॉ. वसंत शिंदे टीम का नेतृत्व कर रहे थे। इन्होंने 2019 में स्टडी पब्लिश की और दावा किया कि आर्य बाहर से नहीं आए थे, बल्कि 8 हजार साल से यहीं थे, क्योंकि जिस कंकाल पर स्टडी की गई वो हड़प्पा सभ्यता के लोगों के थे।

हड़प्पा सभ्यता में रहने वाले आर्यों ने ही वेद-उपनिषद रचे। यही लोग पूरे साउथ एशिया में फैले। इनके DNA एक ही हैं। पूरी साउथ एशिया के DNA एक ही कहने का मतलब है कि अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव के हर शख्स का DNA एक ही है।

इसी रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष के वकील के. पाराशरण ने दलील दी कि आर्य भारत के मूल निवासी हैं। रामायण में सीता, श्रीराम को आर्य कहकर बुलाती थीं, ऐसे में वे बाहरी कैसे हो सकते हैं। यानी ये साबित हो जाता है कि हर भारतीय में एक ही वंश के जीन्स हैं। या फिर कह लीजिए कि सबके DNA एक हैं।

आर्यों के बाद हमारे देश में दूसरी नस्‍लों के लोग आए, बच्चे पैदा किए
आर्यों के बाद हमारे देश में ग्रीक, मंगोल, मुस्लिम, पारसी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी और ब्रिटिश भी आए। सभी ने हमारे यहां की महिलाओं से शादी की और बच्चे पैदा किए। जिसके चलते देश में आज सैकड़ों किस्म की नस्लें यानी DNA मौजूद हैं।

मोदी सरकार लाने वाली थी ह्यूमन DNA प्रोफाइलिंग बिल
नरेंद्र मोदी सरकार 2015 में ह्यूमन DNA प्रोफाइलिंग विधेयक लाने वाली थी। अगर ये विधेयक संसद में पास हो गया होता तो आज DNA वाला पूरा झगड़ा ही खत्म हो गया होता, क्योंकि इस बिल के पास होने के बाद हम सभी के DNA चेक हो चुके होते, लेकिन वो तैयारी पूरी नहीं हो सकी।

DNA को चुनावी मुद्दा बनाती हैं राजनीतिक पार्टियां
हमें ये चर्चा जरूर कर लेनी चाहिए कि DNA जैसी विशुद्ध वैज्ञानिक और ऐतिहासिक बात को बार-बार राजनीतिक हस्तियां क्यों छेड़ देती हैं? वो भी तब, जब चुनाव सिर पर होते हैं। या फिर डेक्कन कॉलेज पुणे की स्टडी 2019 में क्यों आई, जब देश में लोकसभा चुनाव होते हैं।

इसके लिए हमें पीएम मोदी और नीतीश कुमार की 6 पुरानी एक दास्तान कहनी होगी। साल था 2015, नीतीश कुमार फटाफट बिहारियों के बाल, नाखून, थूक, खून इकट्ठा कर रहे थे। उन्होंने 50 लाख बिहारी लोगों के सैंपल लेकर PMO ‌भिजवा दिया था और कहा था- लीजिए मोदी जी, करा लीजिए हमारा DNA चेक।

50 लाख बिहारियों के सैंपल पीएम मोदी को भेजकर नीतीश खेल गए थे बड़ा दांव
मामला ये था कि 2014 के लोकसभा चुनावों के वक्त, जब BJP ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाया तो नीतीश NDA छोड़ गए। 2015 में जब बिहार विधानसभा चुनाव आए तो वो लालू के साथ चले गए। इसी बात‌ पर पीएम मोदी 21 अगस्त 2015 को मुजफ्फरपुर की एक रैली में बोले, 'शायद उनके यानी नीतीश के DNA में ही गड़बड़ है।'

पीएम मोदी के मुंह से DNA निकला, तो नीतीश समझ गए बिहारियों को एक करने का मौका मिला गया है। पलटवार करते हुए नीतीश बोले कि मोदी ने बिहार के DNA पर उंगली उठाई है। जिनके पूर्वजों का देश की आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था, वो हमारे DNA पर उंगली उठा रहे है। फिर चुनाव तक ये अहम मुद्दा बना रहा। अब यूपी चुनाव से पहले मोहन भागवत को DNA की याद आई है।

अगर विज्ञान की मानें तब तो मोहन भागवत की बातों में सच्चाई नहीं है, लेकिन ट्रेंड यही कहता है कि अब हमें कई लोग हमारा DNA बताएंगे। ये हमारे ऊपर है कि हम किसकी सुनें।

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