शरीर हमारा, फैसला उनका:डियर मर्द... एक दिन अकेले सड़कों पर चलकर तो देखिए, पता चल जाएगा औरतों के लिए दुनिया कैसी है

2 महीने पहले
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फर्ज करिए कि आप पुरुष हैं और किसी नौकरी का इंटरव्‍यू देने गए हैं। क्‍या जॉब से जुड़ी जरूरी क्‍वालिफिकेशंस के साथ आपको ये बताया जाता है कि इस नौकरी के लिए किस तरह के कपड़े पहनने होंगे, कैसे जूते पहनने होंगे, किस तरह अपने बाल सजाने होंगे और चेहरे पर क्‍या-क्‍या मेकअप लगाना होगा। क्‍या-क्‍या करना होगा के साथ-साथ एक लंबी लिस्‍ट उन कामों की, जो आप नहीं कर सकते।

अजीब लग रहा है न ? शरीर आपका, उस पर अधिकार आपका तो उससे जुड़ा फैसला कोई और कैसे ले सकता है। नौकरी के लिए आप अपना स्किल, अपनी काबिलियत दे रहे हैं, अपना शरीर, मन, आत्‍मा और विचार नहीं।

हां, यदि आप तैराक हैं तो जाहिर है, लेदर जैकेट पहनकर पूल में नहीं कूदेंगे या हवाई जहाज उड़ा रहे हों तो कुर्ते-पाजामे में नहीं जाएंगे। आप काम की जरूरत के हिसाब से कपड़े पहनेंगे, किसी की मर्जी, सनक और अधिकार के हिसाब से नहीं।

औरतों के साथ ऐसा नहीं होता। उनके जॉब इंटरव्‍यू में सिर्फ उनका स्किल और काबिलियत नहीं देखी जाती। शरीर का आकार, चेहरे का डिजाइन, चमड़ी का रंग सबकुछ देखा जाता है। कई बार ये अलिखित नियम की तरह होता है और कई बार जॉब की डिमांड की तरह।

असल में वो जॉब की डिमांड कम, मर्दवादी दुनिया में मर्दों के बनाए नियमों और उनकी इच्‍छाओं की डिमांड ज्‍यादा होती है।

हाल ही में एयर इंडिया ने अपनी एयर होस्‍टेस और केबिन क्रू वगैरह के लिए गाइडलाइंस जारी की। ये गाइडलाइंस काम की, वर्क कल्‍चर की, परफॉर्मेंस की, बिहेवियर की गाइडलाइंस नहीं हैं। ये गाइडलाइंस हैं मेकअप और कपड़ों की।

इसमें लिखा है कि वो किस तरह के कपड़े पहनेंगी, क्‍या मेकअप करेंगी, कैसे अपने बाल बनाएंगी, कैसे जूते पहनेंगी और क्‍या-क्‍या नहीं पहनेंगी।

चूंकि एयर होस्‍टस और केबिन क्रू लड़के भी होते हैं, तो इस गाइडलाइन में उनके लिए भी विशेष ताकीद की गई है, लेकिन दोनों से की जा रही मांगें और सोशल मीडिया पर उस पर आ रही प्रतिक्रियाएं बिल्कुल अलग हैं।

लड़कियों से कहा गया है कि उनके लिए बाल बांधकर रखना, लिप्‍सटिक, काजल और आईशैडो लगाना अनिवार्य है। वहीं लड़कों के लिए भी बालों में जेल लगाना अनिवार्य किया गया है। लड़कियों के लिए मेकअप की लंबी लिस्‍ट और लड़कों के लिए बालों में जेल।

सोशल मीडिया पर लोगों को हंसी सिर्फ लड़कों के लिए बनाए गए नियमों पर आ रही है। लड़कियों से जबरन करवाया जा रहा मेकअप उन्‍हें विचित्र नहीं लग रहा। बेचारे लड़कों के लिए ये कैसे दुखभरे स्‍यापे हैं।

लड़कियों का क्‍या है, उन्‍हें तो आदत है नियमों का पालन करने की। मर्दों के लिए खुद को सजाने की। देह और सूरत को अपना सबसे कीमती खजाना समझने की। सैकड़ों सालों से औरतों को यही तो घुट्टी पिलाई गई है कि औरत का सबसे बड़ा हथियार और सबसे बड़ी कमजोरी उसका शरीर है।

ये पहली और आखिरी बार नहीं है कि लड़कियों के कपड़े, चेहरे, बाल, सबकुछ के नियम कंपनी तय कर रही है। तीन साल पहले जापान की एक कंपनी ने महिलाओं के लिए दफ्तर में हाई हील्‍स पहनकर आना कंपलसरी कर दिया।

जब महिलाएं इस नियम के खिलाफ कोर्ट पहुंची गईं, तो वहां के हेल्‍थ और लेबर मिनिस्‍टर ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि ये नियम “सही और जरूरी” है। औरतों के लिए ऑफिस में हाई हील्‍स पहनना अनिवार्य होना चाहिए।

ये तो कुछ भी नहीं है। आपको थोड़ा अजीब इसलिए लग रहा है क्‍योंकि वक्‍त बदल रहा है। अब आप अभी बात-बात पर देश में, समाज में, कानून में जेंडर बराबरी की बात करने वाले युग में रह रहे हैं, लेकिन ये ज्‍यादा पुरानी बात नहीं।

आज से महज 30 साल पहले तक फैशन, मॉडलिंग की दुनिया में आने वाली औरतों के लिए नियमों की लंबी फेहरिस्‍त थी। इन नियमों में ये भी शामिल था कि उनका वजन एक खास पैमाने से ऊपर नहीं हो सकता।

वो शादी नहीं कर सकतीं, बॉयफ्रेंड नहीं रख सकतीं, सार्वजनिक रूप से अफेयर नहीं कर सकतीं, प्रेग्‍नेंट नहीं हो सकतीं और उनके लिए कॉन्‍ट्रेसेप्टिव पिल्‍स का सेवन अनिवार्य था।

ये मजाक नहीं है। ये नियम और शर्तें बाकायदा कॉन्‍ट्रैक्‍ट में लिखी होती थीं, जिन्‍हें तोड़ने का मतलब था काम से निकाल दिया जाना।

ये नियम सिर्फ फैशन और मॉडलिंग इंडस्‍ट्री पर ही लागू नहीं था। कितने दफ्तरों में ऑफिस सेक्रेटरी जैसी मामूली जॉब के लिए भी यह अलिखित नियम था।

70 के दशक तक अमेरिका में सेना, माइन्‍स समेत कुछ खास जगहों पर नौकरी देने से पहले औरतों का प्रेग्‍नेंसी टेस्‍ट किया जाता था। यह भी अलिखित नियम था। ये देश के कानून में नहीं लिखा था, लेकिन ये भी नहीं लिखा था कि ऐसा करना गैरकानूनी है।

कानून में यह लाइन लिखवाने के लिए और इसे दंडनीय अपराध ठहराने के लिए औरतों ने एक सदी लंबी लड़ाई लड़ी है। फिर भी अभी हम उस आपराधिक लैंगिक भेदभाव से ज्‍यादा दूर नहीं आ पाए हैं।

डारलेन का केस तो सिर्फ 21 साल पुराना है। 2001 में अमेरिका के नेवादा में 20 साल की डारलेन जेसपरसन ने अपने इंप्‍लॉयर के खिलाफ केस कर दिया। डारलेन एक बार टेंडर थी, जिसने मेकअप करके काम पर आने से इनकार कर दिया।

ये भी एक अलिखित नियम था कि सारी फीमेल इंप्‍लॉइज को चेहरे पर ढेर सारा मेकअप लगाना होता था और खास तरह की उभार वाली पोशाक पहननी होती थी। जबकि लड़के सामान्‍य टी-शर्ट और जूते में बिना किसी मेकअप के काम पर आ सकते थे।

डारलेन को ये भेदभाव गलत लगा। उसने विरोध किया तो मालिक ने उसे काम से निकाल दिया। डारलेन फेडरल कोर्ट पहुंच गई और वर्कप्‍लेस पर लैंगिक भेदभाव का मुकदमा ठोंक दिया।

उस मुकदमे का फैसला क्‍या आया?

कोर्ट ने कहा कि लड़कियों से मेकअप की डिमांड करना हमारे सोशल कल्‍चर का हिस्‍सा है। ये कोई लैंगिक भेदभाव नहीं। डारलेन केस हार गई।

कोर्ट ने बार के मालिक से कहा कि अब तो आप केस जीत ही गए हैं। अब अनुकंपा के आधार पर डारलेन को वापस नौकरी पर रख लीजिए। अच्‍छे इंप्‍लॉई कहां मिलते हैं। इतनी मामूली बात पर नौकरी से निकालना ठीक नहीं।

जी हां, आपने ठीक पढ़ा। कोर्ट की नजरों में डारलेन को नौकरी से निकालना भेदभावपूर्ण नहीं था, लेकिन दया करके उसे वापस नौकरी दे देनी चाहिए थी। 2006 में ये फैसला आया था। सिर्फ 14 साल पहले।

तो जनाब, आपको सिर्फ ऐसा लगता है कि दुनिया बदल रही है।

दिन-रात चारों ओर जेंडर बराबरी का राग सुन-सुनकर आपके कान पक चुके हैं, लेकिन देख लीजिए, आज भी लिप्‍सटिक लगाने से इनकार करने, ऑफिस में हाई हील्‍स पहनने से इनकार करने पर किसी महिला की नौकरी जा सकती है और कोर्ट को इसमें लैंगिक भेदभाव जैसा भी कुछ नजर नहीं आएगा।

दुनिया जाहिर तौर पर बदली है, लेकिन उतनी भी नहीं, जितनी मर्दों को बदली नजर आती है।

आप एक औरत की तरह एक दिन दफ्तर जाकर देख लीजिए। एक दिन सड़क पर चलकर देख लीजिए। एक दिन अपने शहर की पब्लिक बस में चढ़कर देख लीजिए। एक रात 12 बजे अकेले ऑफिस से घर ड्राइव करके देख लीजिए। सड़क पर, ट्रेन में या किसी भी सार्वजनिक जगह पर बस एक दिन औरत बनकर अकेले होकर देख लीजिए।

आप देख नहीं सकते, क्‍योंकि आप औरत हो नहीं सकते। मेरा यकीन करिए, अगर आप हो भी गए तो सह नहीं पाएंगे। आप एक दिन, एक पल के लिए भी वो जिंदगी सह नहीं पाएंगे, जो हम औरतें रोज जीती हैं। जीवन के हर कदम पर भेदभाव का सामना करती हैं। हम पर दबाव है कि हम दफ्तर बिना मेकअप के नहीं जा सकते। हम पर दबाव है कि हमें मुस्‍कुराकर ही बात करनी है।

आपको हर हफ्ते ये कॉलम पढ़ना भी दुश्वार लगता होगा। जाने किस बराबरी की बात कर रही हैं ये औरतें। यकीन मानिए, हम उससे बहुत कम कर रहे हैं, जितना दुख, डर और गुस्‍सा हमारे दिलों में है। अभी तो हमने सच कहना बस शुरू ही किया है।

अब बात बराबरी सीरीज की ये 3 स्टोरीज पढ़ लीजिए

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