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बात बराबरी की:ऐश्वर्या की बेटी का छिपा हुआ माथा देखने को लोग ऐसे उतावले हैं, मानो माथा न हो 200 साल में दिखने वाला चंद्रग्रहण हो

नई दिल्ली16 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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वो दौर पोल्का डॉट वाली जवानी का था। छोटी-छोटी बुंदियों वाली सलवार-कमीज पहनकर मैं तैयार हुई। चेहरे पर दरियादिली से पाउडर थोपा। कानों में सोने की बालियां। अब बारी थी बालों की। घूमरदार बाल खोलकर मैंने एक तरफ क्लिप लगा ली। दरवाजे पर पुरानी, लेकिन साफ साइकिल मेरा इंतजार कर रही थी। कॉलेज का पहला दिन, लेकिन इससे पहले कि मैं निकलती, मां की आंखों ने मुझे रोक लिया।

मैं भीतर लौटी और बालों में तेल डालकर दो कसी हुई चोटियां गूंथ लीं। मां के माथे की लकीरें नर्म पड़ गईं। ये किस्सा 20 साल पुराना है। नई कहानी ऐश्वर्या और उनकी बेटी आराध्या की है। हरी-नीली आंखों वाली ऐश्वर्या हरदम बेटी का हाथ थामे नजर आती हैं। इस पर वे ट्रोल भी होती रहीं। अब आराध्या का बेबी कट भी निशाने पर है। ट्रोलर्स पूछ रहे हैं कि 10 साल की होने के बावजूद आराध्या क्यों अब तक बच्चों वाली हेयरस्टाइल में नजर आती हैं!

लोग आराध्या का छिपा हुआ माथा देखने को उतावले हैं, मानो माथा न हो, 200 साल में एक बार आने वाला चंद्रग्रहण हो। इधर बच्ची के चेहरे पर छितरे बालों में मां ने अपना डर छिपाया हुआ है। भले ऐश्वर्या के पास दुनियाभर की दौलत हो, भले ही वो चाहें तो आसपास एक छोटी-मोटी फौज खड़ी कर दें, लेकिन वो हैं तो एक मां ही। वो मां जो जानती है कि पीठ फिरते ही उसकी बच्ची उठा ली जाएगी और सुबह उसकी अस्त-व्यस्त लाश किसी नाले किनारे पड़ी मिलेगी। तो गनीमत इसी में है कि बेटी की उम्र और देह के उभार जितने समय तक छिपाए जा सकें, छिपे रहें।

जैसे-जैसे बच्ची का कद और वजन बढ़ता है, मां की चिंताएं भी बढ़ती जाती हैं। वो उसे मोटे और ढीले-ढाले कपड़े पहनने को कहती है। बालों में रंग-बिरंगे क्लिप्स की जगह मोटी-सख्त चोटियां दिखने लगती हैं। कई बार तो ये चिंता खाने की थाली तक पहुंच जाती है। कुछ तीनेक साल पहले मैं एक प्रोजेक्ट के लिए ओडिशा के गांवों में घूम रही थी।

वहां ऐसी कई मांओं से मिलना हुआ, जो बेटी को दुबला-पतला दिखाने के लिए उसकी थाली तक दूध-घी पहुंचने से रोके हुए थीं। उनका कहना था कि दूध-घी खाकर लड़की जल्दी जवान हो जाती है। घर में दौलत तो छिपाई जा सकती है, लेकिन बेटी की जवानी नहीं। उसे न हुंडी में गड़ाकर छिपा सकते हैं, न तिजोरी में। वो चमचमाएगी तो दुनियाभर के डाकू-लुटेरे जमा हो जाएंगे और खजाना लूटकर ही टलेंगे।

‘जवान होती बेटी’ के इस डर से यूरोप भी अछूता नहीं। कोई 17वीं सदी में वहां लड़कियों को घी-तेल में तर मांस-भात की बजाय हल्का खाना परोसा जाने लगा। इसके दो मकसद थे- लड़की के उभार लंबे वक्त तक छिपे रहें, और वो कब्र में जाने तक नए पत्ते-सी जवान दिखे।

खाने के इतिहास से लेकर उसके जायकों की बात करने वाली लेखिका लौरा शापिरो ने अपनी किताब परफेक्शन सलाद में ऐसी तमाम बातों का जिक्र किया है। वे बताती हैं कि कैसे खाने की कोई खास डिश सेहत या स्वाद से हटकर डिब्बों में बंटती गई। पुरुषों की थाली में जायके ही नहीं, बल्कि सेहत का भी भरपूर ख्याल रखा गया। वे प्रोटीन भी लें, विटामिन भी, लेकिन इन सबके साथ अच्छी तरह से भुना हुआ मसाला हो। छौंक ऐसी हो कि खाने से पहले भूख भड़क उठे। और स्वाद वो, कि जबान के साथ उंगलियां भी चटकारे ले उठें। वहीं हरी-भरी, बेस्वाद थाली स्त्रियों के हिस्से आ गई।

सलाद ही नहीं, किसी भी तरह की हल्की डाइट को महिलाओं से जोड़ा जाने लगा। कनाडियन यूनिवर्सिटी ऑफ मनिटोबा ने एक स्टडी में पाया कि सलाद, नींबू और दही जैसी चीजों को फेमिनिन माना गया। जबकि पिज्जा, चिप्स या मांस जैसी चीजें पुरुषों के खानपान का हिस्सा मानी गईं। इस फर्क की जड़ें आज से हजारों साल पुरानी हैं, जब पुरुष शिकार के लिए खूंखार जानवरों से भिड़ा करते, वहीं इंतजार करती स्त्रियां गोश्त पकाने के लिए सब्जियां खोजतीं।

ये कहानी आगे चलकर औरत की एक खास छवि से जा अटकी। वो युवती, जिसके शरीर पर चर्बी की हल्की परत भी न हो। उम्मीद की गई कि ये खाना स्त्रियां न केवल खाएं, बल्कि खुशी से खाएं। तभी आया एक विज्ञापन, जिसने तहलका मचा दिया। हेयरपिन नाम की बेवसाइट पर छपे इस विज्ञापन का टाइटल था- वीमेन लाफिंग अलोन विद सैलेड। इसमें कुछ युवतियों की तस्वीरें हैं, जो सलाद टूंगते हुए खिलखिला रही हैं। लेकिन गौर से देखें तो तस्वीर के पीछे की तस्वीर काफी उदास है। इन पर इंची-टेप से नपकर जीने का दबाव है ताकि वे हल्की-फुल्की और हसीन-तरीन लगती रहें। सीधे शब्दों में कहें तो उम्र से कम दिखने का दबाव है।

उम्र से कम लगने का ये दबाव लड़कियों पर बचपन से ही रहता है, फिर चाहे वो ऐश्वर्या की बेटी हो या किसी आम औरत की। आराध्या का बेबी कट भी इसी डर का हिस्सा है। मां चाहती है कि जब तक मुमकिन हो, उसकी बेटी नन्हीं बच्ची दिखती रहे। वो जानती है कि जैसे ही आराध्या के माथे से बाल हटे, या कपड़े जरा भी डिजाइनर हुए, लुटेरे सक्रिय हो जाएंगे। उसे पता है कि हाथ की पकड़ ढीली होते ही बेटी खो सकती है। ये डर ऐश्वर्या का नहीं, बल्कि हर उस मां का है, जो अपनी बेटी को खोने से डरती है।

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