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बात बराबरी की:औरत की सारी ताकत शादी को बचाने में खप जाती है, भले ही इसके लिए उसे अपने सपनों की बलि देकर आलू छौंकना पड़े या किसी बाबा से भभूत लेनी पड़े

नई दिल्ली10 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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तलाक काफी खराब शब्द है। मैं यही सोचती थी, जब तक मेरा दूसरी बार तलाक नहीं हो गया। ये शब्द हैं आयशा मुखर्जी के, जो अब टीम इंडिया के क्रिकेटर शिखर धवन की पूर्व पत्नी हैं। चंद रोज पहले उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपनी शादीशुदा जिंदगी से अलग होने का ऐलान करते हुए एक इमोशनल पोस्ट डाली। पोस्ट के उतार-चढ़ाव को कोई भी पत्नी बखूबी समझ सकती है, जिसकी शादी कभी किसी मोड़ पर डांवाडोल हुई हो।

कलेजा कैसे कांपता है! कैसे सुबह जागते हुए हमेशा के लिए आंखें मूंद लेने का खयाल आता है! कैसे, बच्चों का चेहरा मरते-मरते भी जकड़ लेता है, लेकिन आयशा से एक चूक हो गई। तमाम तकलीफों के बावजूद उनकी पोस्ट में सहजता थी, एक किस्म की हिम्मत कि साथ रहना मुश्किल हो गया था, तो मैं बाहर निकल आई। दुखियारी और छोड़ी हुई बीवी की बजाए, वे मजबूत औरत की तरह उभरकर आईं। शायद यही वजह है कि अब वे ट्रोल हो रही हैं।

पोस्ट पर यूजर उन्हें शातिर स्त्री बता रहे हैं, जो पैसों के लिए शादी और फिर तलाक का खेल खेलती है। तंज कसते हुए कई ने उन्हें मुफ्तखोर और पूर्व पतियों से गुजारा-भत्ता लेकर पेट पालने वाली औरत तक कह दिया। ट्रोलर यहीं नहीं रुके, बल्कि आगे बढ़ते हुए ऐलान कर दिया कि आयशा में कोई न कोई खोट जरूर है, वरना दो बार तलाक नहीं होता।

तो इस तरह से पति-पत्नी का निहायत निजी मामला धज्जीउखाड़ गैंग के निशाने पर आ गया। वे पक्का हैं कि 12 साल बड़ी होने के कारण आयशा रिश्ते में ज्यादा डोमिनेटिंग रही होंगी। वे जानते हैं कि एक तलाक के बाद आयशा में उतनी तरलता बाकी नहीं होगी कि वे अपने युवा पति को खुश रख सकें। इस पर तो वे 100 फीसदी तय हैं कि दो बच्चों की मां को अपनाकर शिखर ने जो दरियादिली दिखाई, उस पर सबकुछ माफ हो सकता है।

लिहाजा, शादी में चाहे जितनी ऊब और ठंडापन आ चुका हो, चाहे जितनी उठा-पटक हो रही हो, आयशा को तलाक नहीं लेना चाहिए था, लेकिन तलाक तो हो चुका और आयशा ने दुनिया से गुहार लगाने की बजाए खुला ऐलान कर दिया। लिहाजा उनकी जमकर मजम्मत हो रही है। गुजारा-भत्ता को आयशा का इकलौता पेशा बताया जा रहा है। उन्हें गुजारा-भत्ता मिले या न मिले, ट्रोलर्स को हफ्तेभर की रंगारंग खुराक मिल चुकी है।

तलाक का फैसला वैसे तो पति या पत्नी किसी के लिए भी आसान नहीं, लेकिन पत्नियों पर ये खासकर भारी पड़ता है। कल्पना करें, एक ड्राइंगरूम में सोफे पर ठसाठस बैठे ताऊ-चाचाओं और किनारे एक्स्ट्रा चेयर पर बैठी लड़की की। एकाध दिन पहले ही में उसने अपने तलाक का फैसला सुनाया। आनन-फानन बैठकी जमी और सब मिलकर उसे कुरेद रहे हैं। क्यों, जमाई जी मारते हैं क्या? बच्चों के सामने गालियां देते हैं क्या? या क्या कोई दूसरी औरत...? क्या कहा! ध्यान नहीं देते! बात नहीं करते! अरे, गप-गुलाई ही करते रहेंगे तो तुम्हारे लिपस्टिक-लत्ते का खर्चा कहां से लाएंगे! वैसे भी हंसी-ठठ्ठा जनानियों का काम है, मर्द ऐसा करते अच्छे नहीं लगते।

ताऊ-चाचा बैठकी से बात नहीं बने, तो मूंछों ही मूंछों में इशारा होता है और एक्स्ट्रा कुर्सी समेत लड़की रसोई में पहुंच गई। ड्राइंगरूम में बैठी पंचायत के लिए कड़क चाय उबालती जनानियां धीरे-धीरे टोह लेती हैं। क्या हुआ लल्ली, जो इतना बड़ा फैसला ले लिया! दामाद जी बात तो बड़ी मीठी करे हैं। जब मिले हैं, लपक के पैर छुए हैं। अब थोड़ी-बहुत ऊंच-नीच भला किस शादी में नहीं होती। ये बोलने के बाद अंचरे से आंखों की कोर पोंछती ताई-चाचियां अपनी ऊंच-नीच के किस्से भी सुना डालती हैं। एजेंडा साफ है- जो भी हो, लल्ली तलाक की जिद छोड़ दे।

लल्ली अगर पढ़ी-लिखी हो और कमाऊ भी, तो एक और वाक्य वह जरूर सुनेगी- क्या मतलब है इतनी पढ़ाई का, जो एक मियां को काबू नहीं कर सकी! या फिर- तुमने पूरी कोशिश किए बिना ही हार मान ली। समझाइश देकर शादी बचाने की मुहिम में लगे ये लोग नहीं बता पाते हैं कि कौन-सी कोशिश पूरी मानी जाएगी। शादी में चाहे प्रेम न हो, चाहे कितना ही ठंडापन पसरा हो, चाहे पति-पत्नी के कमरे से लेकर खाने का वक्त और सोच भी बदल जाए, या फिर चाहे पति किसी दूसरी स्त्री के प्यार में पड़ जाए, लेकिन साथ तो रहना है। हार नहीं माननी है।

औरत की ताकत की सारी आजमाइश दरकती शादी को बचाने में ही खप जाती है। उसे जंग के मैदान जाने की जरूरत नहीं। न ही कुश्ती या बंदूकबाजी सीखने की जरूरत है। जरूरत है तो केवल ऐसे दांवपेंच सीखने की, जिससे शादी बच जाए। फिर चाहे इसके लिए जापानी भाषा से मोह छोड़कर पहाड़ी आलू छौंकना सीखना पड़े, या फिर किसी बाबा की शरण में जाकर कोई भभूत लेनी पड़े।

तलाक और इसके बदलते ट्रेंड पर ढेरों किस्से-कहानियां हैं, लेकिन कोई भी कहानी तलाकशुदा औरतों पर बात नहीं करती। हां, अमेरिकी कंसल्टिंग फर्म गैलप पोल का एक सर्वे जरूर इस पर बात करता है। वहां लगभग डेढ़ लाख तलाकशुदा जोड़ों पर एक स्टडी में ये निकलकर आया कि तलाक के बाद महिलाओं को रिश्ते से निकलने में काफी वक्त लगा। वे लंबे समय तक डिप्रेशन में रहीं। कई की नौकरी चली गई और दोस्तों-परिवार से भी रिश्ते बिगड़े।

इसके उलट, पति तलाक से ऐसे उबरे, जैसे मौसमी बुखार जाता है। वे जल्द ही नौकरी और नए रिश्ते में चले गए। जब रिश्ता वही है तो उसकी टूटन का दर्द भी दोनों को उतना ही होना चाहिए! इस पर द गुड डिवोर्स किताब की लेखिका डॉ कन्सतेंस अहरॉन्स का कहना है कि चूंकि शादी के बाद महिलाओं का दायरा अक्सर पति और घर-बच्चों तक रह जाता है, लिहाजा रिश्ता खत्म होने पर उनकी दुनिया ठिठक जाती है। वे काफी वक्त तो इसे मानने में लगा देती हैं कि अब उनकी रिंग-फिंगर पर कोई छल्ला नहीं। इस वक्त तक पुरुष अपनी खाली उंगली में नई अंगूठी डाल चुका होता है।

वो अमेरिका है। ये भारत है। यहां उंगली में छल्ला तो छोड़िए, गले में, माथे पर, मांग से लेकर पैरों की उंगलियों तक कोई न कोई निशानी सजी होती है, जो औरत को बीवी बनाए रखती है। तो जाहिर है कि तलाक केवल कागजी बदलाव नहीं लाता। इसके बाद शृंगार के तमाम चाव एक-एक करके उतारे जाते हैं। ऐसे में तकलीफ तो होती है और बेहद होती है।

आयशा ने खूब सोच-समझकर तलाक को सार्वजनिक किया होगा। पोस्ट में उन्होंने एक लाइन लिखी- तलाक के मायने हैं खुद को चुनना, और शादी के नाम पर अपने को झोंक नहीं देना। पॉइंट में लिखे इस वाक्य के आगे छोटा-सा लाल दिल चमचमा रहा है। उसकी सुर्खी आयशा की ताकत है। और उन तमाम औरतों की, जिन्होंने अपने सबसे प्यारे रिश्ते के लिए सबकुछ किया, लेकिन रिश्ता टूटने पर रोईं नहीं, बल्कि मुस्कुराकर उसे अलविदा कह सकीं।

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