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जलियांवाला बाग से भास्कर एक्सक्लूसिव:जनरल डायर ने जिस गली से फौज लाकर भारतीयों पर गोलियां चलवाईं, अब वहां से गुजरते वक्त सिहरन नहीं होती; एंट्रेस सेल्फी पॉइंट बना और बाग मस्ती का पार्क

अमृतसरएक महीने पहलेलेखक: रोहित चौधरी/मनीष शर्मा

जलियांवाला बाग… इसकी एक ही कहानी है, यानी मौत की कहानी। जिसे देख, सुन और सोच हमारी रूह कांप जाए। ...और एक ही परिणति- 28 साल बाद देश को हासिल आजादी। 13 अप्रैल 1919, दिन रविवार, बैसाखी का उल्लास। अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों की भीड़ और रौलेट एक्ट का विरोध। शाम होते-होते जनरल डायर आता है और सिपाहियों को फायर का ऑर्डर देता है...। कहते हैं उस दिन करीब एक हजार भारतीय गोलियों से भून दिए गए।

101 साल बाद भी जलियांवाला बाग मौत की उन निशानियों को लिए सांस ले रहा है, लेकिन अब बहुत कुछ बदल दिया गया है। अब बाग में दाखिल होने की गली से गुजरते हुए वो खौफ महसूस नहीं होता, न दीवार छूने पर हडि्डयों में सिहरन होती है। अब एंट्रेस गली में लगे बुतों के साथ लोग सेल्फी ले रहे हैं। और बुतों के चेहरों पर भी मातम की जगह खुशियों की लकीरें हैं। सरकार ने जलियांवाला बाग में रेनोवेशन कराए हैं। चलिए पहले इन 13 तस्वीरों से गुजरते हैं…

बाग की एंट्री गैलरी की दोनों तरफ की दीवारों पर आदमकद बुत लगाए गए हैं। पहले एंट्रेस गली की चौड़ाई सिर्फ इतनी थी कि दो लोग ही एक साथ चल पाते थे। अब चूने की मोटी दीवारों को थोड़ा-थोड़ा छीलकर एंट्रेस गली की चौड़ाई बढ़ाई है। बुत लगाने के लिए भी जगह निकाली।
बाग की एंट्री गैलरी की दोनों तरफ की दीवारों पर आदमकद बुत लगाए गए हैं। पहले एंट्रेस गली की चौड़ाई सिर्फ इतनी थी कि दो लोग ही एक साथ चल पाते थे। अब चूने की मोटी दीवारों को थोड़ा-थोड़ा छीलकर एंट्रेस गली की चौड़ाई बढ़ाई है। बुत लगाने के लिए भी जगह निकाली।
कुएं के ऊपर बने पुराने स्ट्रक्चर को हटाकर वहां नानकशाही ईंटों से नया गोलाकार स्ट्रक्चर बनाया गया है, जिसमें 8 दरवाजे बने हैं। हर दरवाजे पर 8-8 फीट ऊंचा ग्लास लगा है। ताकि लोग शीशों के अंदर झांककर कुएं को देख तो सकें, मगर उसमें पैसे वगैरह न फेंकें।
कुएं के ऊपर बने पुराने स्ट्रक्चर को हटाकर वहां नानकशाही ईंटों से नया गोलाकार स्ट्रक्चर बनाया गया है, जिसमें 8 दरवाजे बने हैं। हर दरवाजे पर 8-8 फीट ऊंचा ग्लास लगा है। ताकि लोग शीशों के अंदर झांककर कुएं को देख तो सकें, मगर उसमें पैसे वगैरह न फेंकें।
पहले बाग में एक ही गैलरी थी जबकि अब यहां 4 गैलरियां बनाई गई हैं। आजादी की लड़ाई और आजाद हिंद फौज में पंजाबियों के योगदान को तस्वीरों और बुतों के जरिए दिखाया गया है।
पहले बाग में एक ही गैलरी थी जबकि अब यहां 4 गैलरियां बनाई गई हैं। आजादी की लड़ाई और आजाद हिंद फौज में पंजाबियों के योगदान को तस्वीरों और बुतों के जरिए दिखाया गया है।
बाग के मुख्य आकर्षण शहीदी लॉट को रेनोवेशन में नहीं छेड़ा गया। हालांकि इसके चारों ओर बने तालाब में लिली के फूल खिलाए गए हैं।
बाग के मुख्य आकर्षण शहीदी लॉट को रेनोवेशन में नहीं छेड़ा गया। हालांकि इसके चारों ओर बने तालाब में लिली के फूल खिलाए गए हैं।
बाग के अंदर दीवारों पर बने गोलियों के निशान के आगे लगे ग्लास को हटाकर उसकी जगह लकड़ी की ग्रिल लगाई गई है, ताकि लोग उन्हें छू न सकें।
बाग के अंदर दीवारों पर बने गोलियों के निशान के आगे लगे ग्लास को हटाकर उसकी जगह लकड़ी की ग्रिल लगाई गई है, ताकि लोग उन्हें छू न सकें।
अमर शहीद ज्योति को पीछे शिफ्ट कर दिया गया। दावा है कि इसे राजघाट वाला लुक देने का प्रयास किया गया है।
अमर शहीद ज्योति को पीछे शिफ्ट कर दिया गया। दावा है कि इसे राजघाट वाला लुक देने का प्रयास किया गया है।
जनरल डायर ने जिस जगह खड़े होकर फायरिंग का ऑर्डर दिया था पहले वहां डेढ़-दो फीट ऊंचा त्रिभुज बना था। अब फर्श समतल कर दिया गया है।
जनरल डायर ने जिस जगह खड़े होकर फायरिंग का ऑर्डर दिया था पहले वहां डेढ़-दो फीट ऊंचा त्रिभुज बना था। अब फर्श समतल कर दिया गया है।
लाइट एंड साउंड शो के जरिए जलियांवाला बाग में 100 साल पहले हुए नरसंहार और उससे पहले व बाद का घटनाक्रम दिखाया जा रहा है।
लाइट एंड साउंड शो के जरिए जलियांवाला बाग में 100 साल पहले हुए नरसंहार और उससे पहले व बाद का घटनाक्रम दिखाया जा रहा है।
पुराने एडमिन ब्लॉक की ऊपरी मंजिल पर एयरकंडीशंड डॉक्युमेंट्री हॉल बनाया गया है जहां 7D में शहीदों से जुड़ी डॉक्युमेंट्री दिखाई जाती है।
पुराने एडमिन ब्लॉक की ऊपरी मंजिल पर एयरकंडीशंड डॉक्युमेंट्री हॉल बनाया गया है जहां 7D में शहीदों से जुड़ी डॉक्युमेंट्री दिखाई जाती है।
पहले जलियांवाला बाग के अंदर जाने और बाहर निकलने का रास्ता एक ही था। अब बाग से बाहर निकलने का रास्ता चौक पराग दास की तरफ मस्जिद वाली गली में खुलता है। अगर कोई बाहर निकलने के लिए एंट्रेस गली की तरफ आ भी जाए तो वहां तैनात गार्ड और पुलिस जवान उसे वापस भेज देते हैं।
पहले जलियांवाला बाग के अंदर जाने और बाहर निकलने का रास्ता एक ही था। अब बाग से बाहर निकलने का रास्ता चौक पराग दास की तरफ मस्जिद वाली गली में खुलता है। अगर कोई बाहर निकलने के लिए एंट्रेस गली की तरफ आ भी जाए तो वहां तैनात गार्ड और पुलिस जवान उसे वापस भेज देते हैं।
पुराने फव्वारे की जगह नया गोलाकार फाउंटेन लगाया गया है। इसमें रात में शानदार लाइटिंग की जाती है। यह फाउंटेन उसी जगह बनाया गया है, जहां 13 अप्रैल 1919 को छबील लगी थी।
पुराने फव्वारे की जगह नया गोलाकार फाउंटेन लगाया गया है। इसमें रात में शानदार लाइटिंग की जाती है। यह फाउंटेन उसी जगह बनाया गया है, जहां 13 अप्रैल 1919 को छबील लगी थी।
बाग के अंदर कई महान हस्तियों के कोट्स लगाए गए हैं। नरसंहार के बाद बाग पहुंचे महात्मा गांधी का कोट भी शामिल है- ‘जो एक बात मुझे सबसे अधिक अचंभित करती है वह यह है कि जिस प्रांत ने विश्वयुद्ध के समय सबसे अधिक सैनिक मुहैया करवाए थे, उसे ही सबसे अधिक जुल्मों का शिकार बनाया गया।’
बाग के अंदर कई महान हस्तियों के कोट्स लगाए गए हैं। नरसंहार के बाद बाग पहुंचे महात्मा गांधी का कोट भी शामिल है- ‘जो एक बात मुझे सबसे अधिक अचंभित करती है वह यह है कि जिस प्रांत ने विश्वयुद्ध के समय सबसे अधिक सैनिक मुहैया करवाए थे, उसे ही सबसे अधिक जुल्मों का शिकार बनाया गया।’
पार्क में दो हजार से ज्यादा किस्म के फूल-बूटे लगाने का दावा भी किया गया है। पार्क के लिए खास तौर पर यूपी से घास मंगवाई गई है। यहां सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाया गया है। यहां वेस्ट पानी को ट्रीट करके गार्डन की सिंचाई की जा रही है। बाग में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगाया गया है।
पार्क में दो हजार से ज्यादा किस्म के फूल-बूटे लगाने का दावा भी किया गया है। पार्क के लिए खास तौर पर यूपी से घास मंगवाई गई है। यहां सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाया गया है। यहां वेस्ट पानी को ट्रीट करके गार्डन की सिंचाई की जा रही है। बाग में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगाया गया है।

अब बाग में हुए उन 7 बदलावों की बात कर लेते हैं, जिनकी तस्वीर नहीं खींची जा सकती। लेकिन ,ये बाग की मूल भावना को ही बदल दे रहे हैं-

1. बाग के अंदर जाने वाली गली सेल्फी पॉइंट बन गई है
जनरल डायर 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में जमा लोगों को टैंक से उड़ा देना चाहता था मगर बाग की एंट्रेस गली संकरी होने की वजह से वह टैंक अंदर ले जा नहीं सका। रेनोवेशन में एंट्रेस गली को चौड़ा करते हुए ऊपर छत के तौर पर लकड़ी की मोटी-मोटी बल्लियां लगा दी गई हैं।

एंट्रेस गली के दोनों तरफ की नानकशाही ईंटों से बनी चूने की जो दीवारें डायर के खौफनाक कदमों की आहट का अहसास दिलाती थीं अब वहां हंसते-खिलखिलाते लोगों की मूर्तियां लगा दी गई हैं। नतीजा-अब एंट्रेस गली लोगों के लिए इतिहास को महसूस करने की जगह न रहकर सेल्फी खिंचवाने का पॉइंट बन गई हैं।

2. जहां डायर ने खड़े होकर गोलियां चलवाईं थीं अब उसे कोई नहीं देखता
संकरी एंट्रेस गली से गुजरकर जलियांवाला बाग में पहुंचे जनरल डायर ने जिस जगह खड़े होकर निहत्थे भारतीयों को गोलियों से भूनने का ऑर्डर दिया था। पहले वहां डेढ़-दो फीट ऊंचा त्रिभुज बना था जिस पर लिखा हुआ था कि यहीं खड़े होकर डायर ने गोलियां चलाने का आदेश दिया था।

बाग में आने वाले टूरिस्ट रुककर उस जगह को देखा करते थे मगर अब रेनोवेशन के दौरान त्रिभुज को हटाकर फर्श समतल कर दिया गया है। बेशक यहां एक टाइल पर जनरल डायर के बारे में लिखा गया है मगर 99% लोग उसे नोटिस किए बगैर सीधे उसके ऊपर से गुजर जाते हैं।

3. शहीदों के परिवारों ने चंदे से जो दीवार बनाई थी, उसकी जगह पर नई दीवार खड़ी कर दी
नरसंहार के बाद शहीदों के परिवारों ने चंदा इकट्‌ठा किया। साल 1925 से 1927 के बीच कुएं के चारों तरफ दीवारें बनाकर उसके ऊपर क्राउननुमा स्ट्रक्चर बनवाया था। इसके पीछे सोच थी कि इसे देखकर ऐसा भाव आए मानों लाशों के ऊपर ब्रिटेन की महारानी बैठी हो।

रेनोवेशन के दौरान उस पूरे स्ट्रक्चर को हटाकर कुएं के चारों तरफ नानकशाही ईंटों की दीवारें बनाकर उसमें शीशे लगा दिए गए हैं। पहले लोग कुएं के अंदर गहरे तक झांककर 102 साल पुरानी दुर्दांत घटना को याद करते थे जिससे उनके मन में शोक व गुस्से के भाव आते थे। अब वैसा कुछ नहीं है और लोग शीशे के पार झांककर लौट आते हैं।

4. अमर ज्योति ऐसे खिसकाई कि लोग उसे बिना देखे ही बाहर निकल जाते हैं
शहीदों की याद में लगाई गई अमर ज्योति पहले गेट के बिल्कुल सामने होती थी। लोग दाखिल होते ही शहीदों को श्रद्धांजलि देते थे। रेनोवेशन के बाद अमर ज्योति को दाईं तरफ एक किनारे कर दिया गया। अब लोग पूरा बाग घूम लेते हैं और एक किनारे जल रही अमर ज्योति को बिना देखे ही बाहर निकल जाते हैं।

5. कुर्बानी की प्रतीक शहीदी लाट पर लेजर शो चलाया जा रहा है
रेनोवेशन के बाद जलियांवाला बाग में हर रोज शाम को शहीदों की याद में लेजर शो करवाया जाता है। यह लेजर शो यहां बनी शहीदी लाट के ऊपर चलता है। शहीदों के परिवार इसे भी उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि यह शहीदी लाट यहां जान कुर्बान करने वाले लोगों के सम्मान का प्रतीक है मगर सरकार ने लेजर शो के जरिए इसे मनोरंजन की जगह बनाकर रख दिया।

शहीद परिवारों के मुताबिक अगर लेजर शो दिखाना ही है तो किसी दीवार पर दिखाया जाना चाहिए। शहीद परिवारों की नजर में नया लेजर शो प्रभावी नहीं है। इसकी जगह पुराना लेजर शो ज्यादा प्रभावी था, जिसमें अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज दी थी।

6. गैलरी 1 से 4 हुई, लेकिन पुरानी फोटो और डिटेल गायब हैं
रेनोवेशन से पहले जलियांवाला बाग में एक ही गैलरी थी जहां एक बड़ी सी पेंटिंग के जरिए 13 अप्रैल 1919 का नरसंहार दिखाया गया था। उसी गैलरी में 13 अप्रैल 1919 को बाग में सभा आयोजित करने वाले प्रमुख नेताओं की फोटो उनकी पूरी डिटेल के साथ लगी थीं।

नरसंहार में मारे गए कई लोगों के अलावा बचे हुए कुछ लोगों की फोटो भी यहां लगी थी और साथ में उनकी डिटेल दी गई थी। अब ये फोटो यहां नहीं है। पेंटिंग को भी बाग के अंदर बनाई गई 4 गैलरियों में कहीं नहीं रखा गया।

7. खुलने का टाइम बढ़ाया, रात में भी देख पा रहे लोग
2019 में रेनोवेशन शुरू होने से पहले जलियांवाला बाग सुबह 9 बजे खुलता था और शाम 6 बजे बंद कर दिया जाता था। अब बाग रात 9 बजे तक खुला रहता है और लोग इसका नाइट व्यू भी देख पा रहे हैं।

आइए उन परिवारों की बातों से रूबरू होते हैं, जिनके घरों के लोग इस बाग में शहीद हुए थे-

अब यहां वेडिंग हॉल और डिस्को जैसा महसूस होता है: कपूर
जलियांवाला बाग फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन में 30 शहीदों के परिवार शामिल हैं। इसके प्रधान सुनील कपूर रेनोवेशन में किए गए बदलावों से बहुत नाराज हैं। इनके परदादा वासुमल कपूर यहां 2 गोलियां लगने से शहीद हुए थे। वो कहते हैं कि यहां आकर लगता है किसी वेडिंग हॉल में चल रही किसी शादी में आ गए हैं, जहां डिस्को लाइट चल रही हैं।

फाउंडेशन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि बाग में एक वॉल बने, जिस पर शहीदों की तस्वीर लगाकर उनके बारे में डिटेल दी जाए। फाउंडेशन ने मौजूदा लाइट एंड साउंड शो बंद करने और इसे ‘डिवाइन टेंपल’ कहने की मांग की है, क्योंकि यहां जान की कुर्बानी देने वाले लोगों में हर मजहब के लोग शामिल थे।

जहां कभी बाथरूम होते थे, वहां अमर ज्योति बना दी: करनजीत सिंह
जलियांवाला बाग फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन के सेक्रेटरी करनजीत सिंह के दादा गोपाल सिंह नरसंहार में शहीद हुए थे। करनजीत के अनुसार, ये जगह अब शहीदों की स्थली न होकर सैरगाह बन गई है। जहां कभी बाथरूम होते थे, वहां अमर ज्योति बना दी। उनका आरोप है कि रेनोवेशन के दौरान केंद्र सरकार या दूसरे किसी भी लेवल पर शहीदों के परिवारों से कोई चर्चा नहीं की गई।

102 साल बाद किसी ने बाग के बारे में सोचा तो सही: महेश बहल
जलियांवाला बाग शहीद परिवार समिति से 13 शहीदों के परिवार जुड़े हुए हैं। इसके प्रधान महेश बहल के दादा लाला हरिराम बहल यहां शहीद हुए थे। बहल के अनुसार, 102 साल बाद किसी ने बाग के बारे में सोचा, यह अच्छी बात है, लेकिन अमर ज्योति को नहीं खिसकाना चाहिए था।

हमने इस रेनेवोशन पर कुछ इतिहासकारों से भी बात की है। उन्होंने जो कहा उसे ज्यों का त्यों रख रहे हैं-

ये इतिहास का संरक्षण नहीं है, ये तो हिस्ट्री का रीक्रिएशन है: बलविंदर सिंह
गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी (GNDU) के गुरु रामदास स्कूल ऑफ प्लानिंग में साढ़े 31 साल पढ़ा चुके प्रोफेसर बलविंदर सिंह कहते हैं, ‘लगता है कि जिन लोगों ने इसका रेनोवेशन का काम किया है, उनकी समझ ही इतनी रही होगी। वह पंजाब और यहां के लोगों की भावनाओं को शायद समझ ही नहीं पाए। ऐसा नहीं होता कि जो आपको अच्छा लगे, इतिहास को वैसा ही कर लो। इतिहास तो जो है, वही रहेगा।’

प्रोफेसर सिंह के मुताबिक, बेहतर होता अगर सरकार स्थानीय इतिहासकारों को साथ में लेती। लोकल हिस्टोरियन के सुझाव लेती तो इतना पैसा खर्च करने के बाद इतिहास भी संरक्षित होता और कहीं आलोचना भी नहीं होती।

जलियांवाला बाग शोक का प्रतीक था, उसे एम्यूजमेंट पार्क बना दिया: आशीष
अमृतसर में ही रहने वाले हिस्टोरियन सुरिंद्र कोछड़ के बेटे और जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में PHD कर रहे आशीष कोछड़ कहते हैं, जलियांवाला बाग हमारे शोक का प्रतीक था लेकिन रेनोवेशन के बाद अब यह एम्यूजमेंट पार्क की फीलिंग ज्यादा देता है।

उनका कहना है कि इतिहास को संरक्षित करना अच्छी बात है, लेकिन रेनोवेशन के नाम पर उसे बदल देना गलत है। अब आने वाली पीढ़ियां कभी इतिहास के बारे में सही जानकारी ले ही नहीं पाएंगी।

जो पहले बाग को मेंटेन करते थे, उनकी बात भी पढ़ लीजिए-

इतने बड़े प्रोजेक्ट में गलतियां हो ही जाती हैं: मुखर्जी
जलियांवाला बाग के रखरखाव का काम नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट के पास होता है। इसके प्रमुख खुद प्रधानमंत्री होते हैं। इसके सेक्रेटरी सुकुमार मुखर्जी कहते हैं कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में गलतियां हो ही जाती हैं, लेकिन उन्हें सुधारा भी जा सकता है।

हालांकि उनका कहना है कि रेनोवेशन के बाद अभी तक बाग की देखरेख का काम ट्रस्ट को मिला नहीं है। बाग की देखरेख का काम अभी भी भारत सरकार की नवरत्न कंपनी, नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड (NBCC) के पास ही है।

आखिर में जिस कंपनी ने बाग रेनोवेट कराया है, उसकी राय भी जान लीजिए-

यहां के सारे काम दिल्ली से पास होकर आते थेः NBCC के प्रतिनिधि
रेनोवेशन का प्रोजेक्ट पूरा करने वाली भारत सरकार की कंपनी NBCC के प्रतिनिधि ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कंपनी ने जलियांवाला बाग में अपनी मर्जी से एक ईंट भी इधर से उधर नहीं लगाई।

प्रोजेक्ट के दौरान उन्हें जो-जो चीज जैसी-जैसी बनाने को कहा गया, कंपनी ने उसे वैसे ही बना दिया। यहां के सारे काम दिल्ली से पास होकर आते थे। रेनोवेशन में लोकल लेवल पर किसी की कोई इन्वॉल्वमेंट नहीं रही।