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अमरनाथ यात्रियों को मंत्री-मुख्यमंत्री जैसी सुरक्षा:कश्मीर में एंट्री लेते ही पूरा शहर रोक दिया जाता है, हर दूसरे घर की छत पर तैनात हैं स्नाइपर्स

पहलगाम7 महीने पहलेलेखक: अक्षय बाजपेयी/ वैभव पलनीटकर

जम्मू और कश्मीर, राज्य के इन दो इलाकों को जोड़ती है- बनिहाल टनल। जम्मू की तरफ से जाने पर टनल पार होते ही मंजर बदलने लगता है। चौराहों, गली के मुहानों, छतों, बाजारों में सुरक्षाबलों के जवान भारी संख्या में दिखने लगते हैं। दोपहर 2 बजे यात्रा दस्ते को रास्ता देने के लिए पूरे शहर का ट्रैफिक रोक दिया जाता है।

2016 में हुए पुलवामा हमले के बाद से सुरक्षाबल रोड ओपनिंग और सिक्योरिटी सैनिटाइजेशन को लेकर ज्यादा सतर्क हैं। दूसरी तरफ बारिश ने अमरनाथ यात्रियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। मंगलवार को हुई तेज बारिश के बाद यात्री जहां थे, वहीं फंस गए। यात्रा भी रोक दी गई।

यात्रा में शामिल मंडिदीप के फूलसिंह परमार ने बताया कि एक यात्री की हार्ट अटैक से भवन के पास ही मौत हो गई। वहीं एक अन्य यात्री घोड़े से नीचे गिर गया, जिससे सुरक्षा जवानों ने बड़ी जद्दोजहद के बाद बचाया। अमरनाथ यात्रा की खड़ी चढ़ाई में घोड़े भी गिर रहे हैं।

30 घंटे की चढ़ाई
लगातार 30 घंटे जब आप सीढ़ियां और पहाड़ की खड़ी चढ़ाई चढ़ेंगे तब जाकर आप पहुंचेंगे अमरनाथ की पवित्र गुफा। ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ ऑक्सीजन कम होगी और सांस कम मिलेगी, थकान बढ़ेगी। मौसम इतना अटपटा कि पल में धूप, दूसरे पल बारिश और तीसरे पल बर्फबारी।

यह बानगी है अमरनाथ धाम की। भास्कर के दो रिपोर्टर पहले जत्थे के साथ बाबा के दर्शन को पहुंचे थे। यहां हम पहलगाम बेस कैंप के जरिए चढ़ने से लेकर बालटाल कैंप में उतरने तक की यात्रा का बेहद रोमांचक अनुभव आपसे साझा करने जा रहे हैं। जो किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं। इसके पहले पढ़िए श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड के सीईओ नितिश्वर कुमार से हुई बातचीत।

हीट पैदा न हो इसलिए तय दूरी बनाई
कुमार के मुताबिक, पहली बार बाबा अमरनाथ से भक्तों की एक तय दूरी बना दी गई है, क्योंकि भीड़ से हीट पैदा होती है। हीट को रोकने के लिए ही नई व्यवस्था बनाई गई है।

अब दर्शन के लिए इतनी जगह है कि बिना भीड़ के भक्त आराम से दर्शन कर निकल सकते हैं और उन्हें इंतजार भी नहीं करना पड़ता। सुबह 6 बजे आरती होने के बाद बाबा के दर्शन शुरू हो जाते हैं, जो शाम की आरती तक जारी रहते हैं।

श्राइन बोर्ड की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, इस साल पहले दिन, यानी 30 जून को 7,483 भक्तों ने दर्शन किए। भक्तों को सेवाएं देने के लिए 140 लंगर लगाए गए हैं। पूरे रूट पर ही छोटे-बड़े लंगर मिलते हैं।

कश्मीर घाटी में पुलवामा जिले में अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा में तैनात एक सैनिक।
कश्मीर घाटी में पुलवामा जिले में अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा में तैनात एक सैनिक।

अब पढ़िए 48 घंटे की यात्रा का बेहद रोमांचक सफर…

अमरनाथ यात्रा के पहले जत्थे के साथ हम 29 जून की शाम को पहलगाम के नुनवान बेस कैंप पहुंच चुके थे। घाटी में घुसते ही जम्मू में लगने वाली चिलचिलाती और उमसभरी गर्मी से राहत मिल चुकी थी।

कश्मीर की वादियों में चीड़ के पेड़ों के आगोश में देर शाम हमें तंबू में ठिकाना मिला। तंबू की देखरेख अनंतनाग के ही रहने वाले मुश्ताक के पास थी।

हम मुश्ताक भाई के इस सीजन के पहले गेस्ट थे। पहला गेस्ट पाने की खुशी उनके चेहरे और उनकी बोली में महसूस की जा सकती थी।

रात बढ़ने के साथ ठंडी हवाओं का शोर बढ़ चुका था। अब अगली सुबह और उसके साथ शुरू होने वाले रोमांच का इंतजार था।

कहानी अगली सुबह की…

सुबह 5 बजे। बर्फीला पानी मुंह पर लगा, एक सैकेंड को करंट मार गया, लेकिन लंगर और भंडारों की गर्म-गर्म चाय और नाश्ते ने जोश को फिर जिंदा कर दिया।

अमरनाथ यात्रा में इस बार करीब 140 लंगर लगे हैं। इनमें अधिकतर दिल्ली, पंजाब, राजस्थान जैसे राज्यों के हैं।

खैर, पहले जत्थे के हजारों यात्री स्नान के बाद नुनवान कैंप से चंदनवाड़ी की ओर निकल चुके थे।

नुनवान कैंप से चंदनवाड़ी 16 किमी है और टैक्सी से ये सफर आधे घंटे में पूरा हो जाता है। चंदनवाड़ी कैंप से सिक्योरिटी चेक के बाद ही बाबा बर्फानी की यात्रा शुरू होती है।

पहले जत्थे में शामिल ज्यादातर यात्री पैदल ही ऊंचे पहाड़ की चढ़ाई करना शुरू कर चुके थे।

15 साल के बच्चे से लेकर 75 साल के बुजुर्ग तक जोशीले अंदाज में 'बम भोले-बम भोले' के जयकारों आगे बढ़ने लगे।

कुछ यात्री घोड़ों और पालकी के जरिए भी जा रहे थे, लेकिन भीड़ पैदल वालों की ही थी।

अमरनाथ यात्रियों के जत्थों में कई जगहों पर लोग तिरंगा लेकर चल रहे थे और 'बम भोले' के साथ 'भारत माता की जय' के नारे भी लगा रहे थे।
अमरनाथ यात्रियों के जत्थों में कई जगहों पर लोग तिरंगा लेकर चल रहे थे और 'बम भोले' के साथ 'भारत माता की जय' के नारे भी लगा रहे थे।

पहला पड़ाव पिस्सू टॉप…

यात्रियों का पहला पड़ाव था- पिस्सू टॉप। एकदम सीधी खड़ी चढ़ाई, एक तरफ कल-कल बहती नदी दूसरी तरफ खाई।

एक पल को लगा कि हजारों लोग कैसे ये खड़ा पहाड़ चढ़ेंगे, लेकिन देखते देखते यात्रियों के ग्रुप आगे बढ़ना शुरू हुए।

साढ़े तीन किमी की खड़ी चढ़ाई, चार घंटे में चढ़ने के बाद पिस्सू टॉप पर पहुंचते हैं। इस पॉइंट पर यात्री थोड़ा आराम करते हैं और फिर लंगर में कुछ खाना-पीना करके अगले पड़ाव यानी शेषनाग की ओर रवाना हो जाते हैं।

पहाड़ों के कोने-कोने पर सुरक्षाबलों का पहरा है। जवान एक तरफ यात्रियों को आतंकी खतरों से सुरक्षा दे रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ कठिन यात्रा में लोगों की मदद कर रहे हैं। पिस्टू टॉप पर हम भी सुस्ताने के लिए करीब एक घंटे रुके।

यहां ड्यूटी दे रहे ITBP के जवान से हमने खूब सारी बातें कीं। जवान की ऊंचाई करीब 6 फीट, एक हाथ में 8 किलो की लोडेड इंसास राइफल, सिर पर बुलेट प्रूफ हेलमेट, बदन पर 20 किलो वजनी बुलेटप्रूफ जैकेट। कुल 35 किलो का लोहा शरीर पर लादकर ये जवान यात्रियों की सुरक्षा में 12 घंटे ड्यूटी दे रहे हैं। और इस तरह के करीब डेढ़ लाख जवान सुरक्षा में तैनात हैं।

दुर्गम पहाड़ियों से गुजरते संकरे और पथरीले रास्ते अमरनाथ यात्रा को खतरनाक बना देते हैं और अगर मौसम खराब हो गया तो ये रास्ते जानलेवा भी हो जाते हैं।
दुर्गम पहाड़ियों से गुजरते संकरे और पथरीले रास्ते अमरनाथ यात्रा को खतरनाक बना देते हैं और अगर मौसम खराब हो गया तो ये रास्ते जानलेवा भी हो जाते हैं।

दूसरा पड़ाव शेषनाग…

पिस्सू टॉप पर आराम और थोड़ा लंगर चखने के बाद हमने अपने अगले पड़ाव शेषनाग के लिए कूच किया।

पैदल यात्री करीब 5 घंटे की पैदल चढ़ाई के बाद शेषनाग पहुंचे। यहां पहुंचते ही सुंदर झील नजर आई जो तीन तरफ से बर्फ से ढंकी थीं। झील का पानी आकाश की तरह नीला था।

इसी झील से थोड़ा आगे यात्रियों के लिए बेस कैंप बना था। हमारे सामने रात बिताने के लिए कैंप में ठिकाना ढूंढने का चैलेंज था। हालांकि, बिना ज्यादा मशक्कत के कैंप में सभी यात्रियों को जगह मिल गई।

शेषनाग अमरनाथ यात्रा का सबसे खूबसूरत लेकिन सबसे कठिन पड़ाव है। 3590 मीटर की ऊंचाई पर है शेषनाग झील और इस झील को तीन तरफ से पहाड़ों ने घेरा हुआ है। ज्यादा ऊंचाई के चलते यहां ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्क्त महसूस होती है।

मन मोह लेने वाला ये नजारा है शेषनाग झील का। इसी झील के किनारे है यात्रियों के रुकने का कैंप। दो दिन की यात्रा के बाद यहां रुका जाता है।
मन मोह लेने वाला ये नजारा है शेषनाग झील का। इसी झील के किनारे है यात्रियों के रुकने का कैंप। दो दिन की यात्रा के बाद यहां रुका जाता है।

तीसरा पड़ाव पंचतरणी…

शेषनाग बेस कैंप से हमें सुबह 6 बजे पंचतरणी के लिए निकलना था। ये रास्ता 14 किलोमीटर का था। हाथों में तिरंगा और ‘बम भोले’ के नारों के साथ यहां से पहला जत्था रवाना हुआ।

पहले 2 किमी की खड़ी चढ़ाई और फिर बर्फ के अगल-बगल से गुजरते संकरे रास्ते। ऑक्सीजन की कमी के बीच खड़े पहाड़ों से गुजरता यात्रियों का कारवां। शेषनाग से चलने पर पहला पड़ाव आया महागुण स्टॉप।

करीब 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस जगह पर फाइव स्टार लंगर लगा था। जिसमें खाने की ढेरों वैरायटी थीं।

पहले हमने लंगर चखा और फिर थोड़ा आराम करने के बाद निकल पड़े अगले पड़ाव पंचतरणी की ओर।

शेषनाग में रात में आराम करने के बाद सुबह 6 बजे यात्रा पर निकलने के लिए तैयार यात्रियों का पहला जत्था।
शेषनाग में रात में आराम करने के बाद सुबह 6 बजे यात्रा पर निकलने के लिए तैयार यात्रियों का पहला जत्था।

पांच ग्लेशियर्स का संगम है पंचतरणी

पंचतरणी, पांच ग्लेशियर पहाड़ों से घिरा हरा भरा मैदान है। इन्हीं ग्लेशियर से निकलने वाले पानी से पंचतरणी नदी बनती है। पहलगाम रूट से जाने पर अमरनाथ गुफा पहुंचने से पहले का ये सबसे बड़ा यात्री कैंप है।

पंचतरणी घाटी में ही हेलिकॉप्टर बेस बना हुआ है। घाटी में फड़फड़ाते हेलिकॉप्टर हर एक मिनट देखे जा सकते हैं।

पैदल आने वाले यात्री अपनी दूसरी दिन की यात्रा पूरी करने के बाद यहीं आराम करते हैं और तीसरे दिन यहां से गुफा का 6 किमी का अगला सफर करते हैं।

पंचतरणी से गुफा का रास्ता सबसे कठिन रास्ता है। सीधी खड़ी चढ़ाई, धूल-बड़े पत्थरों वाले बेहद संकरे रास्ते, दोनों तरफ सैंकड़ों फीट गहरी खाई और श्रद्धालुओं की भीड़। रास्ते में आगे बढ़ते हुए आता है संगम पॉइंट।

बालटाल से आने वाला रास्ता इस पॉइंट पर मिलता है और संकरे से रास्ते पर ट्रैफिक दोगुना हो जाता है। लंबी-लंबी कतारों में श्रद्धालुओं को इंतजार करना होता है।

ये है संगम- यही वो जगह है जहां बालटाल और पहलगाम दोनों तरफ से आने वाले रास्ते मिलते हैं। अक्सर इस जगह पर भीड़ ज्यादा रहती है और श्रद्धालुओं को देर तर इंतजार करना पड़ता है।
ये है संगम- यही वो जगह है जहां बालटाल और पहलगाम दोनों तरफ से आने वाले रास्ते मिलते हैं। अक्सर इस जगह पर भीड़ ज्यादा रहती है और श्रद्धालुओं को देर तर इंतजार करना पड़ता है।

2 किमी पहले घोड़ेवालों को रोक दिया गया

करीब 2 किमी पहले ही घोड़ेवालों को रोक दिया जाता है और यहां से गुफा तक पैदल सफर करना होता है, हालांकि पालकी से श्रद्धालु गुफा तक जा सकते हैं।

सीढ़ियां चढ़ते हुए हमने गुफा में एंट्री ली। यहां मोबाइल और दूसरे गैजेट ले जाना बैन है। धाम के पंडित जी ने बताया कि- ‘सामने जो बड़े आकार का बर्फ का पिंड दिख रहा है वही बाबा बर्फानी हैं। उनके दायीं तरफ थोड़े छोटे आकार के गणेश जी और बांयी तरफ पार्वती जी विराजमान है।’

पंडित जी बोले, इस बार गर्मी ज्यादा होने के कारण शिवलिंग का आकार पहले के मुकाबले थोड़ा छोटा है।

दर्शन के बाद लौटते हुए रास्तों में भी यात्रा के जत्थों की सुरक्षा के लिए जबरदस्त सुरक्षा कवर तैनात है।
दर्शन के बाद लौटते हुए रास्तों में भी यात्रा के जत्थों की सुरक्षा के लिए जबरदस्त सुरक्षा कवर तैनात है।

बर्फानी बाबा के दर्शन करने के बाद हमने बाहर आकर भंडारा खाया, थोड़ी देर आराम किया। इसके बाद हमें इसी दिन दूसरे रूट के जरिए बालटाल पहुंचना था। करीब 14 किमी के इस ट्रैक को घोड़े पर पूरा करने में हमें 3-4 चार घंटे लगे। सिंधू नदी के किनारे से पहाड़ी से गुजरता हुआ रास्ता हमें गांदरबल जिले के बालटाल बेस कैंप ले आया और यहां पहुंचते ही 48 घंटे की रोमांच, चुनौतियों से भरी कठिन यात्रा पूरी हुई।