जंग के वो 20 साल:40 तस्वीरों में देखें अफगानिस्तान में अमेरिका की सबसे लंबी लड़ाई, तालिबान को भगाने से शुरू और तालिबान की वापसी से खत्म

3 महीने पहले
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अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 14 अप्रैल 2021 को ऐलान किया था- 11 सितंबर 2021 को 9/11 हमले की 20वीं बरसी तक अफगानिस्तान से अमेरिका और नाटो सेनाएं वापस हो चुकी होंगी। 30 जून को अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो के सबसे बड़े बगराम सैन्य अड्डे से विदेशी सैनिक की आखिरी टुकड़ी चली गई और इस सैन्य अड्डे को अफगान सेना के हवाले कर दिया गया।

अमेरिकी खुश हैं कि उनके देश की सबसे लंबी जंग खत्म हो चुकी है, मगर अफगानियों का सच एकदम उलट है। अमेरिका के इस ऐलान के बाद महज दो महीनों में ही अफगानिस्तान के तकरीबन दो तिहाई हिस्से पर तालिबान ने कब्जा कर लिया है।

तो आइए 20 साल लंबी अमेरिका की इस लड़ाई को 40 तस्वीरों में देखते हैं, जिसकी शुरुआत तालिबान को उखाड़ने से हुई और अंत तालिबान की वापसी से...

2001 से 2002 के दौरान अफगानिस्तान में अमेरिकी जंग की शुरुआत, तालिबान विरोधी साथ आए

अक्टूबर 2001: अफगानिस्तान के पूर्वोत्तर के शहर तालोकान में तालिबान की चौकियों पर गोलीबारी करते नॉर्दन अलायंस के सैनिक। फोटो: जेम्स हिल
अक्टूबर 2001: अफगानिस्तान के पूर्वोत्तर के शहर तालोकान में तालिबान की चौकियों पर गोलीबारी करते नॉर्दन अलायंस के सैनिक। फोटो: जेम्स हिल

अमेरिका की स्पेशल फोर्सेस अफगानिस्तान में तालिबान के विरोधी नॉर्दन अलायंस जैसे मिलिशिया के साथ मैदान में कूद पड़ीं। नवंबर 2001 के दूसरे सप्ताह में राजधानी काबुल के साथ कंधार को भी तालिबान से छुड़ा लिया गया। कंधार तालिबान का गढ़ था।

दिसंबर 2001 में ओसामा बिन लादेन टोराबोरा पर्वतों से होता हुआ पाकिस्तान भाग गया और इधर, काबुल में हामिद करजई की अगुवाई में नई सरकार बना दी गई।

नवंबर 2001: तालिबान विरोधी नॉर्दन अलायंस अफगानिस्तान के कुंदुज के पास तालिबान के गढ़ को घेरकर आगे बढ़ते हुए। फोटो: जेम्स हिल
नवंबर 2001: तालिबान विरोधी नॉर्दन अलायंस अफगानिस्तान के कुंदुज के पास तालिबान के गढ़ को घेरकर आगे बढ़ते हुए। फोटो: जेम्स हिल
नवंबर 2001: काबुल की ओर जाते हुए नॉर्दन अलायंस के सैनिकों को एक तालिबानी लड़ाका खाई मेंं छिपा मिला। उसकी मिन्नतों के बावजूद उसे मार डाला गया। फोटो: टायलर हिक्स
नवंबर 2001: काबुल की ओर जाते हुए नॉर्दन अलायंस के सैनिकों को एक तालिबानी लड़ाका खाई मेंं छिपा मिला। उसकी मिन्नतों के बावजूद उसे मार डाला गया। फोटो: टायलर हिक्स
दिसंबर 2001: अफगानिस्तान में टोरा-बोरा गुफाओं के ऊपर चक्कर लगाता अमेरिकी बी-52 बमवर्षक। तब माना जा रहा था कि यहां ओसामा बिन लादेन छिपा था। फोटो: जोआओ सिल्वा
दिसंबर 2001: अफगानिस्तान में टोरा-बोरा गुफाओं के ऊपर चक्कर लगाता अमेरिकी बी-52 बमवर्षक। तब माना जा रहा था कि यहां ओसामा बिन लादेन छिपा था। फोटो: जोआओ सिल्वा
अगस्त 2002: अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के उत्तर में बगराम एयरबेस पर मौजूद अमेरिकी सैनिक। यह एयरबेस अमेरिका का सबसे बड़े सैन्य-अड्डा था। फोटो: टायलर हिक्स
अगस्त 2002: अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के उत्तर में बगराम एयरबेस पर मौजूद अमेरिकी सैनिक। यह एयरबेस अमेरिका का सबसे बड़े सैन्य-अड्डा था। फोटो: टायलर हिक्स

2003 से 2007 के बीच अमेरिकी सरकार का ध्यान इराक में जंग की तरफ मुड़ गया
मई, 2003 को उस समय अमेरिका के रक्षामंत्री डोनाल्ड रमस्फेल्ड ने अफगानिस्तान मुख्य सैन्य अभियानों के खत्म होने की बात कही। इस दौरान अमेरिका का ध्यान इराक में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने पर लग चुका था। तालिबान ने इसका फायदा उठाना शुरू कर दिया।

2004 में अफगानिस्तान का संविधान तैयार हुआ, लेकिन धीरे-धीरे तालिबान ने घात लगाकर हमले करना और आत्मघाती हमले शुरू कर दिए।

अक्टूबर 2004: राष्ट्रपति पद के ऐतिहासिक चुनाव में वोट डालने की बारी का इंतजार करती महिलाएं। यह चुनाव फौरन ही विवादों में घिर गया। फोटो: टायलर हिक्स
अक्टूबर 2004: राष्ट्रपति पद के ऐतिहासिक चुनाव में वोट डालने की बारी का इंतजार करती महिलाएं। यह चुनाव फौरन ही विवादों में घिर गया। फोटो: टायलर हिक्स
अगस्त 2005: पाकिस्तान की सीमा से लगते पकतिका प्रांत में अमेरिका के सैन्यवाहन की परछाई के करीब खड़ा एक अफगानी नागरिक। फोटो: स्कॉट एल्स
अगस्त 2005: पाकिस्तान की सीमा से लगते पकतिका प्रांत में अमेरिका के सैन्यवाहन की परछाई के करीब खड़ा एक अफगानी नागरिक। फोटो: स्कॉट एल्स
नवंबर 2005: काबुल में अफगान पुलिस के रंगरूटों को ट्रेनिंग देते अमेरिकी कॉन्ट्रैक्टर डाइन कॉर्प। अफगान पुलिस का प्रभाव काबुल और कुछ प्रमुख इलाकों में बचा है। फोटो: स्कॉट एल्स
नवंबर 2005: काबुल में अफगान पुलिस के रंगरूटों को ट्रेनिंग देते अमेरिकी कॉन्ट्रैक्टर डाइन कॉर्प। अफगान पुलिस का प्रभाव काबुल और कुछ प्रमुख इलाकों में बचा है। फोटो: स्कॉट एल्स
जून 2006: दक्षिण अफगानिस्तान में तालिबानी हमले के दौरान 10वीं माउंटेन डिवीजन का जवान अपने साथियों को फायरिंग से दूर रहने के लिए चेताता हुआ। फोटो: टायलर हिक्स
जून 2006: दक्षिण अफगानिस्तान में तालिबानी हमले के दौरान 10वीं माउंटेन डिवीजन का जवान अपने साथियों को फायरिंग से दूर रहने के लिए चेताता हुआ। फोटो: टायलर हिक्स
अक्टूबर 2007: पूर्वी अफगानिस्तान में कोरेंगल घाटी में तालिबान के हमले में घायल अमेरिकी सैनिक। घाटी पर तालिबान की मजबूत पकड़ थी। फोटो: लिन्से एडारियो
अक्टूबर 2007: पूर्वी अफगानिस्तान में कोरेंगल घाटी में तालिबान के हमले में घायल अमेरिकी सैनिक। घाटी पर तालिबान की मजबूत पकड़ थी। फोटो: लिन्से एडारियो

2008 से 2010 अमेरिका ने तालिबान को खदेड़ने के लिए दोबारा जोर लगाया
फरवरी 2009 में अमेरिका में नए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान में 17 हजार और सैनिकों को भेजने का ऐलान कर दिया। अफगानिस्तान में पहले से 36 हजार विदेशी सैनिक मौजूद थे। ओबामा ने 2010 तक कुल एक लाख सैनिक भेज दिए। अफगानिस्तान में फिर तेज जंग छिड़ गई।

अक्टूबर 2008: अफगानिस्तान के कामू इलाके के पहाड़ों पर लोवेल सैन्य चौकी पर तालिबान के एक बड़े हमले का मुकाबला करते अमेरिकी सैनिक। फोटो: टायलर हिक्स
अक्टूबर 2008: अफगानिस्तान के कामू इलाके के पहाड़ों पर लोवेल सैन्य चौकी पर तालिबान के एक बड़े हमले का मुकाबला करते अमेरिकी सैनिक। फोटो: टायलर हिक्स
दिसंबर 2008: काबुल यात्रा के दौरान अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश। बुश के समय ही यह जंग शुरू हुई थी। फोटो: लिन्से एडारियो
दिसंबर 2008: काबुल यात्रा के दौरान अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश। बुश के समय ही यह जंग शुरू हुई थी। फोटो: लिन्से एडारियो
जनवरी 2009: अफगानिस्तान के दक्षिणी प्रांत कंधार के हुताल में खेतों में पैदल गश्त करती अमेरिका की फर्स्ट इन्फैंट्री डिवीजन के सैनिकों की टुकड़ी। फोटो: डैनफंग डेनिस
जनवरी 2009: अफगानिस्तान के दक्षिणी प्रांत कंधार के हुताल में खेतों में पैदल गश्त करती अमेरिका की फर्स्ट इन्फैंट्री डिवीजन के सैनिकों की टुकड़ी। फोटो: डैनफंग डेनिस
अक्टूबर 2009: अफगानिस्तान के कुंदुज प्रांत के रेगिस्तान के एक अस्थायी शिविर में फ्लेयर दिखाते जर्मन सैनिक। ये सैनिक नाटो की तरफ से यहां पहुंचे थे। फोटो: मोइसेस समन
अक्टूबर 2009: अफगानिस्तान के कुंदुज प्रांत के रेगिस्तान के एक अस्थायी शिविर में फ्लेयर दिखाते जर्मन सैनिक। ये सैनिक नाटो की तरफ से यहां पहुंचे थे। फोटो: मोइसेस समन
दिसंबर 2009: काबुल में एक होटल के पास आत्मघाती हमले में आठ लोग मारे गए और दर्जनों घायल हो गए। तालिबान ने इस दौरान ऐसे कई और हमले किए। फोटो: एडम फर्ग्यूसन
दिसंबर 2009: काबुल में एक होटल के पास आत्मघाती हमले में आठ लोग मारे गए और दर्जनों घायल हो गए। तालिबान ने इस दौरान ऐसे कई और हमले किए। फोटो: एडम फर्ग्यूसन
दिसंबर 2009: यूनाइटेड स्टेट्स मिलिट्री एकेडमी के कैडेटों के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा। उन्होंने ही अमेरिकी सैनिकों की वापसी की शुरुआत की थी। फोटो : डॉग मिल्स
दिसंबर 2009: यूनाइटेड स्टेट्स मिलिट्री एकेडमी के कैडेटों के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा। उन्होंने ही अमेरिकी सैनिकों की वापसी की शुरुआत की थी। फोटो : डॉग मिल्स
मार्च 2010: अफगानिस्तान के कंधार प्रांत में अफगानों की बैठक। इस धार्मिक बैठक को मरजा कहते हैं। ऐसी बैठकों में कई बड़े फैसले लिए जाते हैं। फोटो: मोइसेस समन
मार्च 2010: अफगानिस्तान के कंधार प्रांत में अफगानों की बैठक। इस धार्मिक बैठक को मरजा कहते हैं। ऐसी बैठकों में कई बड़े फैसले लिए जाते हैं। फोटो: मोइसेस समन
मार्च 2010: अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में एक घायल अफगान पुलिस अधिकारी को अमेरिकी हेलिकॉप्टर में ले जाते उसके साथी। फोटो: मोइसेस समन
मार्च 2010: अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में एक घायल अफगान पुलिस अधिकारी को अमेरिकी हेलिकॉप्टर में ले जाते उसके साथी। फोटो: मोइसेस समन
अप्रैल 2010: सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान से मजार-ए-शरीफ पहुंचने से पहले अमेरिकी सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी। इस दौरान अमेरिका ने लगातार अपने सैनिक बढ़ाए। फोटो: डेमन विंटर
अप्रैल 2010: सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान से मजार-ए-शरीफ पहुंचने से पहले अमेरिकी सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी। इस दौरान अमेरिका ने लगातार अपने सैनिक बढ़ाए। फोटो: डेमन विंटर
मई 2010: तालिबान के गढ़ रहे हेलमंड प्रांत में IED विस्फोट में मारे गए अपने साथी के अवशेष को उठाने में मदद करते सार्जेंट ग्रेसन सी कोल्बी (सबसे दायें)। फोटो: टायलर हिक्स
मई 2010: तालिबान के गढ़ रहे हेलमंड प्रांत में IED विस्फोट में मारे गए अपने साथी के अवशेष को उठाने में मदद करते सार्जेंट ग्रेसन सी कोल्बी (सबसे दायें)। फोटो: टायलर हिक्स

2011 में ओसामा बिन लादेन मारा गया, अमेरिका ने फौज कम करना शुरू कर दी
मई 2011 में अमेरिकी नेवी के सील कमांडो ने पाकिस्तान के एबटाबाद में अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादने को मार गिराया। उसी साल जून में राष्ट्रपति ओबामा ने मई 2012 तक 33 हजार सैनिक वापस बुलाने का ऐलान कर दिया।
इस बीच अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने नागरिकों की मौत के लिए विदेशी सैनिकों पर आरोप लगाने शुरू कर दिए। अफगान सरकार के संबंध बिगड़ने लगे तो अमेरिका ने 2013 में अफगानों को आंतरिक सुरक्षा सौंप दी, लेकिन तालिबान का आतंक जारी रहा।

मार्च 2011: कुंदुज में एक ट्रांसपोर्ट हेलिकॉप्टर में सवार होते अमेरिकी सैनिक। यह इलाका तालिबान और नाटो सेना के बीच संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा। फोटो: डेमन विंटर
मार्च 2011: कुंदुज में एक ट्रांसपोर्ट हेलिकॉप्टर में सवार होते अमेरिकी सैनिक। यह इलाका तालिबान और नाटो सेना के बीच संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा। फोटो: डेमन विंटर
जनवरी 2012: विमानवाहक पोत जॉन सी स्टेनिस पर मौजूद लड़ाकू जेट। उत्तरी अरब सागर से ये विमान अफगानिस्तान में आतंकी ठिकानों पर बमबारी कर रहे थे। फोटो: टायरल हिक्स
जनवरी 2012: विमानवाहक पोत जॉन सी स्टेनिस पर मौजूद लड़ाकू जेट। उत्तरी अरब सागर से ये विमान अफगानिस्तान में आतंकी ठिकानों पर बमबारी कर रहे थे। फोटो: टायरल हिक्स
फरवरी 2013: अफगान (बाईं ओर) और अमेरिकी सैनिकों ने कंधार प्रांत के लायदिरा गांव में गोलीबारी के बीच तालिबान की एक चौकी को उड़ा दिया। फोटो: ब्रायन डेंटन
फरवरी 2013: अफगान (बाईं ओर) और अमेरिकी सैनिकों ने कंधार प्रांत के लायदिरा गांव में गोलीबारी के बीच तालिबान की एक चौकी को उड़ा दिया। फोटो: ब्रायन डेंटन
अप्रैल 2013: अफगानिस्तान के पक्तिया प्रांत में गश्त करता अमेरिकी सेना की 101वीं एयरबोर्न डिविजन के सैनिकों का दस्ता। फोटो: सर्गेई पोनोमारेव
अप्रैल 2013: अफगानिस्तान के पक्तिया प्रांत में गश्त करता अमेरिकी सेना की 101वीं एयरबोर्न डिविजन के सैनिकों का दस्ता। फोटो: सर्गेई पोनोमारेव
सितंबर 2013: अफगानिस्तान के हेलमंड प्रांत के लशगर गार के एक अस्पताल में 15 साल की मां इस्लाम बीबी की गोद में आठ माह का कुपोषित समीउल्लाह। फोटो: डेनियल बेरेहुलाक
सितंबर 2013: अफगानिस्तान के हेलमंड प्रांत के लशगर गार के एक अस्पताल में 15 साल की मां इस्लाम बीबी की गोद में आठ माह का कुपोषित समीउल्लाह। फोटो: डेनियल बेरेहुलाक
नवंबर 2013: वारदाक प्रांत में तालिबान के ठिकानों पर रॉकेट दागते हुए सईद वजीर। चालीस साल का सईद कभी रूस के खिलाफ मुजाहिदीन रहा था। फोटो: डेनियल बेरेहुलाक
नवंबर 2013: वारदाक प्रांत में तालिबान के ठिकानों पर रॉकेट दागते हुए सईद वजीर। चालीस साल का सईद कभी रूस के खिलाफ मुजाहिदीन रहा था। फोटो: डेनियल बेरेहुलाक
नवंबर 2013: काबुल को अफगानिस्तान के प्रमुख शहरों से जोड़ने वाले हाईवे नंबर 1 पर अमेरिका सैनिकों का बख्तरबंद पेट्रोल वाहन हमवी। फोटो: डेनियल बेरेहुलक
नवंबर 2013: काबुल को अफगानिस्तान के प्रमुख शहरों से जोड़ने वाले हाईवे नंबर 1 पर अमेरिका सैनिकों का बख्तरबंद पेट्रोल वाहन हमवी। फोटो: डेनियल बेरेहुलक

2014-2018 तालिबान फिर उठाने लगा सिर

अक्टूबर 2015: अफगानिस्तान के कुंदुज प्रांत में एक अस्पताल पर अमेरिकी हवाई हमले में 42 लोग मारे गए थे। अमेरिकी ने इसे मानवीय भूल बताया था। फोटो: एडम फर्ग्यूसन
अक्टूबर 2015: अफगानिस्तान के कुंदुज प्रांत में एक अस्पताल पर अमेरिकी हवाई हमले में 42 लोग मारे गए थे। अमेरिकी ने इसे मानवीय भूल बताया था। फोटो: एडम फर्ग्यूसन
अप्रैल 2016: काबुल का कार्त-ए-सखी कब्रिस्तान। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पिछले साल कहा था कि 2015 के बाद से 28 हजार से ज्यादा अफगान सैनिक मारे गए हैं। फोटो: एडम फर्ग्यूसन
अप्रैल 2016: काबुल का कार्त-ए-सखी कब्रिस्तान। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पिछले साल कहा था कि 2015 के बाद से 28 हजार से ज्यादा अफगान सैनिक मारे गए हैं। फोटो: एडम फर्ग्यूसन
मई 2018: अमेरिका के वर्जिनिया प्रांत में अर्लिग्टन नेशनल सिमेट्री में अफगानिस्तान और इराक युद्ध में शहीद हुए कई सैनिकों को दफनाया गया है। फोटो: डेमन विंटर
मई 2018: अमेरिका के वर्जिनिया प्रांत में अर्लिग्टन नेशनल सिमेट्री में अफगानिस्तान और इराक युद्ध में शहीद हुए कई सैनिकों को दफनाया गया है। फोटो: डेमन विंटर
जुलाई 2018 : पूर्वी अफगानिस्तान के खोस्त शहर का बाहरी इलाका। यह इलाका भी तालिबान और अमेरिकी सैनिकों के बीच संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है। फोटो: जिम हुयलेब्रोक
जुलाई 2018 : पूर्वी अफगानिस्तान के खोस्त शहर का बाहरी इलाका। यह इलाका भी तालिबान और अमेरिकी सैनिकों के बीच संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है। फोटो: जिम हुयलेब्रोक

2018 से 2020 के बीच तालिबान से अमेरिका की शांति-वार्ता और समझौता
2018 में अमेरिका और तालिबान ने शांति-वार्ता शुरू कर दी। खास बात यह इसमें अफगान सरकार शामिल नहीं थी। तालिबान ने उनसे बात करने से इंकार कर दिया। 29 फरवरी 2020 को कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका ने फौज वापसी के लिए तालिबान से समझौता कर लिया।
कहने को इस डील में अमेरिका ने दो खास शर्तें भी रखी थीं। पहली-तालिबान हिंसा कम करेगा और दूसरी-तालिबान और अफगान सरकार के बीच बातचीत की शुरुआत होगी।
बाइडेन ने जब अफगानिस्तान से अमेरिका की पूरी वापसी का घोषणा की तो उसमें इन शर्तों का जिक्र नहीं किया। इसका असर भी साफ नजर भी दिया। इस ऐलान के कुछ दिनों बाद ही तालिबान पूरी तरह मैदान में आ गया।

अगस्त 2019: काबुल में एक शादी में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के आत्मघाती हमले में 63 लोग मारे गए। उन्हीं में एक का अंतिम संस्कार करते परिजन। फोटो: जिम हुयलेब्रोक
अगस्त 2019: काबुल में एक शादी में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के आत्मघाती हमले में 63 लोग मारे गए। उन्हीं में एक का अंतिम संस्कार करते परिजन। फोटो: जिम हुयलेब्रोक
सितंबर 2019: काबुल में एक भीषण कार बम धमाके के बाद बना गड्ढा। इस हमले की जिम्मेदारी तालिबान ने ली थी। फोटो: जिम हुयेलेब्रोक
सितंबर 2019: काबुल में एक भीषण कार बम धमाके के बाद बना गड्ढा। इस हमले की जिम्मेदारी तालिबान ने ली थी। फोटो: जिम हुयेलेब्रोक
नवंबर 2019: काबुल के करीब अमेरिकी सेना के सबसे बड़े सैन्य अड्डे बगराम एयरबेस पर अपने सैनिकों के बीच उस समय के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। फोटो: एरिन शेफ
नवंबर 2019: काबुल के करीब अमेरिकी सेना के सबसे बड़े सैन्य अड्डे बगराम एयरबेस पर अपने सैनिकों के बीच उस समय के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। फोटो: एरिन शेफ
फरवरी 2020: तालिबान के हाथों बेस गंवाने के बाद अफगान पुलिस अधिकारी। अमेरिका की वापसी की खबर ने तालिबान को और आक्रमक बना दिया। फोटो: कियाना हायरी
फरवरी 2020: तालिबान के हाथों बेस गंवाने के बाद अफगान पुलिस अधिकारी। अमेरिका की वापसी की खबर ने तालिबान को और आक्रमक बना दिया। फोटो: कियाना हायरी

2020-21 के दौरान अमेरिकी हस्तक्षेप का अंत और तालिबान का पैर पसारना शुरू किया
आखिर अमेरिका और नाटो ने अफगानिस्तान से वापसी शुरू कर दी। 20 साल की इस लड़ाई में अमेरिका ने 2 ट्रिलियन डॉलर, यानी करीब 150 लाख करोड़ रुपए खर्च किए। उस दौरान 2400 अमेरिकी और दूसरे देशों के करीब 700 सैनिक मारे गए।
60 हजार सैनिक और 40 हजार नागरिकों समेत कुल एक लाख अफगानी भी इस लड़ाई में जान गंवा चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक दो तिहाई से ज्यादा अफगान भूमि काबुल के काबू से बाहर हो चुकी है। इनमें ज्यादा इलाके पर तालिबान दोबारा काबिज हो चुका है।

फरवरी 2020: अफगानिस्तान के जाबुल प्रांत में युद्ध से थके हुए अफगान पुलिस के जवान। इनमें ज्यादातर जवान कई वर्षों से अपने घर नहीं गए थे। फोटो: कियाना हायरी
फरवरी 2020: अफगानिस्तान के जाबुल प्रांत में युद्ध से थके हुए अफगान पुलिस के जवान। इनमें ज्यादातर जवान कई वर्षों से अपने घर नहीं गए थे। फोटो: कियाना हायरी
जनवरी 2020: कंधार के पास पंजवाई जिले की सीमा पर मौजूद अकेली सरकारी सुरक्षा चौकी पर आक्रामक तालिबान से हुए संघर्ष के बाद के हालात। फोटो: जिम हुयलेब्रोक
जनवरी 2020: कंधार के पास पंजवाई जिले की सीमा पर मौजूद अकेली सरकारी सुरक्षा चौकी पर आक्रामक तालिबान से हुए संघर्ष के बाद के हालात। फोटो: जिम हुयलेब्रोक
नवंबर 2020: काबुल यूनिवर्सिटी पर ISIS के हमले में 32 लोग मारे गए और 50 घायल हुए। हमले में मारे गए एक छात्र की कब्र पर शोक मनाता उनका परिवार। फोटो: फरजाना वहीदी
नवंबर 2020: काबुल यूनिवर्सिटी पर ISIS के हमले में 32 लोग मारे गए और 50 घायल हुए। हमले में मारे गए एक छात्र की कब्र पर शोक मनाता उनका परिवार। फोटो: फरजाना वहीदी
नवंबर 2020: तालिबान कंधार शहर के आसपास के इलाके पर कब्जा करने के करीब था। तस्वीर पंजवाई जिले की है, जहां आतंकी पैर पसारने लगे थे। फोटो: जिम हुयलेब्रोएक
नवंबर 2020: तालिबान कंधार शहर के आसपास के इलाके पर कब्जा करने के करीब था। तस्वीर पंजवाई जिले की है, जहां आतंकी पैर पसारने लगे थे। फोटो: जिम हुयलेब्रोएक
दिसंबर 2020: अफगानिस्तान के लगमान इलाके में तालिबान की रेड यूनिट के बीच से गुजरते बच्चे। ज्यादातर ग्रामीण इलाकों पर तालिबान काबिज है। फोटो: जिम हुयलेब्रोएक
दिसंबर 2020: अफगानिस्तान के लगमान इलाके में तालिबान की रेड यूनिट के बीच से गुजरते बच्चे। ज्यादातर ग्रामीण इलाकों पर तालिबान काबिज है। फोटो: जिम हुयलेब्रोएक

बुश ने तालिबान के खिलाफ ताकत झोंकी और ट्रंप ने समझौता कर लिया

दरअसल, 20 साल पहले जिस तालिबान को उखाड़ फेंकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अपनी ताकत झोंक दी थी, 2020 में उसी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान से समझौता कर लिया। दोहा डील के नाम से चर्चित यह समझौता 29 फरवरी 2020 को हुआ था। इसके तहत अमेरिका और नाटो को एक मई 2021 तक अफगानिस्तान छोड़ देना था। इसी हिसाब से अब अफगानिस्तान में विदेशी सेना नाममात्र की बची है। उनके अभियान पूरी तरह बंद हो चुके हैं।

अब तक कुल 421 जिलों में से 320 पर तालिबान पूरी तरह हावी
अफगानिस्तान में कुल 34 प्रांत हैं। इन 34 प्रांतों में कुल 387 जिले हैं। हर प्रांत में एक प्रोविंशियल सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट भी है। कुल मिलाकर 421 प्रशासनिक इकाई हैं।
एक मई के बाद से तालिबान करीब 75 नए जिलों पर कब्जा कर चुका है। जो जिले पहले से उसके कब्जे में हैं उन्हें जोड़ लें तो इस समय तालिबान के कब्जे में 161 जिले हैं। इसके अलावा 160 जिले हैं जिनके मुख्यालय तो सरकार के पास हैं लेकिन बाकी ग्रामीण इलाका तालिबान के कब्जे में है। दो महीनों के कम समय में तीन चौथाई अफगानी जमीन को कब्जे में ले लिया गया है। तालिबान अंतरराष्ट्रीय हल्ले से बचने के लिए रणनीति अपनाए हुए है।

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