लखीमपुर खीरी से ग्राउंड रिपोर्ट:नाराज किसान बोले- आज हमारे बच्चों को कुचला तो 45 लाख में समझौता हो गया, कल कोई और कुचलेगा तो 50 लाख में मामला निपट जाएगा

2 महीने पहले

पिछले कुछ दिनों से चर्चा में रहे लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में अब खामोशी है। जली हुई गाड़ियां, थके हुए पुलिसकर्मी और सच तलाशते गिने-चुने पत्रकारों को देखने के बाद ये अहसास ही नहीं होता कि 48 घंटे पहले यहां हुए उपद्रव में 8 लोगों की जान गई है। मन में सवाल कौंधता है कि आखिर इतनी जल्दी स्थिति कैसे काबू हो गई। लोग इतने सामान्य क्यों दिखाई दे रहे हैं? सरकार ने इस पूरे मामले को कैसे कंट्रोल किया?

फिर घटनास्थल से जैसे ही आगे बढ़ते हैं चीजें परत दर परत खुलने लगती हैं। तिकुनिया से करीब 60 किलोमीटर दूर पलिया से यहां आए एक किसान जगरूप सिंह कहते हैं कि आज एक नेता के बेटे ने किसानों के बच्चों को मारा और 45 लाख रुपए पर समझौता हो गया। कल किसी और नेता का बेटा किसानों को मारेगा और 50 लाख में समझौता कर लेगा। किसानों को इतनी जल्दी सरकार से समझौता नहीं करना था। कल यहां हजारों में किसान थे, आज यहां लाखों लोग होते। राकेश टिकैत ने प्रदर्शन खत्म कराने में बहुत जल्दबाजी की।

जब हमने चश्मदीद प्रदर्शनकारी से घटना को लेकर सवाल किया तो वे किसानों पर गाड़ी चढ़ाने के बारे में तो खुलकर बात कर रहे थे, लेकिन जवाबी हिंसा में 4 लोगों की मौत से जुड़े सवालों पर हिचक रहे थे। किसान संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता और स्थानीय नेता यहां से करीब 100 किलोमीटर दूर बहराइच जिले के नानपारा गांव के घटनाक्रम के लेकर चिंतित थे, जहां हिंसा में मारे गए दो सिख युवकों का अंतिम संस्कार होना था।

ये नेता आपस में कह रहे थे- पुलिस ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दबा दी है, यदि इस घटना का पूरा सच सामने नहीं आया तो किसान आंदोलन पटरी से उतर जाएगा और किसान ही सवालों के घेरे में होंगे। मैं जब बात करने के लिए उनकी तरफ बढ़ी तो उन्होंने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि अभी वे नानपारा के घटनाक्रम को लेकर चर्चा कर रहे हैं। उनकी बातों में किसानों से सरकार से हुए समझौते को लेकर आक्रोश साफ झलक रहा था।

घटनास्थल पर दो जली हुई गाड़ियां मौजूद हैं। यहां कुछ स्थानीय किसान हैं, जो घटना को लेकर आपस में चर्चा कर रहे हैं।
घटनास्थल पर दो जली हुई गाड़ियां मौजूद हैं। यहां कुछ स्थानीय किसान हैं, जो घटना को लेकर आपस में चर्चा कर रहे हैं।

सरकार ने किसी विपक्षी नेता को पहुंचने नहीं दिया, इसलिए वह कामयाब रही

3 अक्टूबर की शाम होते-होते मारे गए किसानों के शवों के साथ प्रदर्शन शुरू हो गया था। पंजाब और दूसरे इलाकों से किसानों ने तिकुनिया पहुंचने का ऐलान कर दिया था। किसान नेता राकेश टिकैत ने भी घटनास्थल की तरफ कूच कर दिया था। स्थितियां तेजी से बदल रही थीं। स्थिति को भांपते हुए UP सरकार ने आसपास के जिलों के पुलिस अधिकारियों को तुरंत तिकुनिया पहुंचने का आदेश दिया था। बाहरी जिले से यहां ड्यूटी पर आए पुलिस अधिकारियों से बातचीत से पता चलता है कि सरकार का फोकस किसी भी तरह तिकुनिया में स्थिति को नियंत्रित करने पर था।

एक SHO स्तर के पुलिस अधिकारी कहते हैं, 'मुझे रात में बारह बजे तुरंत तिकुनिया के लिए निकलने का आदेश दिया गया। मैं जिस स्थिति में था तुरंत यहां के लिए निकल पड़ा। सरकार ने आसपास के सभी जिलों में पक्की नाकेबंदी की और नेताओं को यहां नहीं पहुंचने दिया।' सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी ये रही कि विपक्ष के किसी भी नेता को यहां नहीं पहुंचने दिया। सिर्फ किसान नेता राकेश टिकैत को ही यहां आने दिया, जिन्होंने सरकारी प्रतिनिधिमंडल से बात करके समझौता कर लिया और किसान शव उठाने के लिए तैयार हो गए।

एक अन्य पुलिस अधिकारी कहते हैं, 'सरकार ने किसानों की सभी मांगें मान लीं, ऐसे में उनके पास आगे प्रदर्शन जारी करने का कारण ही नहीं बचा।' तिकुनिया में स्थिति सामान्य हो जाने का कारण ये भी है कि इस घटनाक्रम में किसी स्थानीय व्यक्ति की मौत नहीं हुई है। जिस पत्रकार की मौत हुई है वो भी यहां से बीस किलोमीटर दूर रहते हैं। इसकी वजह से यहां की स्थानीय आबादी इस घटनाक्रम से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं हुई और सभी ने अपने आप को घटना से अलग ही रखा।

मौके पर मौजूद स्थानीय पत्रकारों और चश्मदीदों के बयानों के बाद दो अहम सवाल खड़े हुए- क्या अजय मिश्र के बेटे आशीष मिश्र उस गाड़ी में सवार थे जो किसानों पर चढ़ी और क्या मौके पर गोलीबारी हुई? इस घटना के वीडियो बनाने वाले स्थानीय पत्रकारों ने हमें कई ऐसे वीडियो दिखाए जिसमें गोली चलने की आवाज साफ सुनाई दे रही है। ये फायर पिस्टल के लग रहे हैं, लेकिन कोई भी व्यक्ति गोली चलाता हुआ दिख नहीं रहा है।

जिस जगह पर उपद्रव हुआ, लोगों की जानें गईं वहां अब खामोशी है। इधर-उधर कुछ काले झंडे नजर आ रहे हैं।
जिस जगह पर उपद्रव हुआ, लोगों की जानें गईं वहां अब खामोशी है। इधर-उधर कुछ काले झंडे नजर आ रहे हैं।

अब तक कोई ठोस सबूत हाथ नहीं लगा है

भारतीय सिख संगठन से जुड़े गुरमीत सिंह रंधावा ने हमें बताया कि अजय मिश्र गाड़ी में सवार थे और फायरिंग करते हुए मौके से भाग गए। उन्होंने कहा, 'इस प्रदर्शन की अगुआई कर रहे किसान नेता तजिंदर सिंह विर्क भी थार गाड़ी के नीचे आ गए थे। वो अभी गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती हैं, उन्होंने हमें बताया है कि मोनू (आशीष मिश्र) गाड़ी में सवार था और किसानों पर गाड़ी चढ़ाने के बाद भाग गया था।'

वहीं मौके पर कवरेज कर रहे एक पत्रकार भी मोनू को गाड़ी से उतरकर भागते हुए देखने का दावा करते हैं, लेकिन उनके पास भी इसका कोई फुटेज नहीं हैं। वे अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, 'हम सभी पत्रकार कवरेज कर रहे थे। सब अलग-अलग एंगल पर खड़े थे। किसी को ये अंदाजा नहीं था कि ऐसा हो जाएगा। सब कुछ बहुत तेजी से हुआ। मैं भागकर ही बिजलीघर में छुपा। मैंने कार से उतरकर खेत की तरफ भागते हुए एक व्यक्ति को देखा। मुझे लगता है कि वे मोनू ही थे, लेकिन मेरे पास कोई वीडियो सबूत नहीं है। उस अफरातफरी में मेरी आंखें धोखा भी खा सकती हैं। गोलियां चल रही थीं, यदि मैं दीवार फांदकर बिजलीघर में नहीं घुसता तो शायद मुझे ही गोली लग जाती।'

हालांकि केंद्रीय राज्य मंत्री अजय मिश्र ने अपने बेटे के मौके पर ना होने का दावा किया है। आशीष मिश्र मोनू ने भी दावा किया है कि घटना के पूरे दिन वो अपने गांव बनवीरपुर में थे। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्हें जबर्दस्ती इस विवाद में खींचा जा रहा है। घटना के कई वीडियो जो अब वायरल हो गए हैं वो इन पत्रकारों ने ही शूट किए हैं। ऐसा ही एक वीडियो उन्होंने तीन बजकर 13 मिनट पर बिजली घर के भीतर से शूट किया है। इसमें गाड़ी जलती हुई दिख रही है और लोग इधर-उधर भागते दिख रहे हैं।

पुलिस क्या कर रही थी?

घटना के बाद सरकार ने हर तरफ नाके लगा दिए थे लेकिन उसके बाद भी किसान नेता राकेश टिकैत लखीमपुर पहुंच गए और सरकार के साथ समझौता हो गया।
घटना के बाद सरकार ने हर तरफ नाके लगा दिए थे लेकिन उसके बाद भी किसान नेता राकेश टिकैत लखीमपुर पहुंच गए और सरकार के साथ समझौता हो गया।

प्रदर्शन स्थल पर भारी पुलिस बल तैनात था। घटना से पहले के कई वीडियो में भारी तादाद में पुलिसकर्मी दिखाई दे रहे हैं, लेकिन घटना के दौरान और बाद में पुलिसकर्मी नदारद नजर आते हैं। मौके पर मौजूद एक पत्रकार कहते हैं, ''जैसे ही गाड़ी लोगों पर चढ़ी, पुलिस भाग गई। एक अधिकारी के तो भागते-भागते जूते ही पैर से निकल गए। पुलिस ने घटना को रोकने या बाद में भीड़ के हत्थे चढ़े लोगों को बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया। महिला पुलिसकर्मी भी इधर-उधर भाग रहीं थीं, वो तो हमसे ही जान बचाने की गुहार लगा रहीं थीं।"

जिन सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं

पूरे घटनाक्रम पर सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि डिप्टी CM का रूट डायवर्ट किए जाने और पुलिस के मना करने के बावजूद सांसद अजय मिश्र के गांव से लोगों से भरी हुई ये तीन गाड़ियां किसानों के प्रदर्शन स्थल की तरफ क्यों और किस मकसद से गईं?

दूसरा सवाल ये है कि यदि आशीष मिश्र गाड़ी में थे या गाड़ी चला रहे थे तो वो किसी वीडियो में स्पष्ट क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं। इस घटना में उन्हें कोई खरोंच तक क्यों नहीं आई। वो भीड़ से बचकर कैसे भाग निकले?

इस घटना में पत्रकार रमन कश्यप की भी मौत हुई है। उन्हें किसने मारा अभी ये स्पष्ट नहीं है। कहा जा रहा है कि उनके फोन में कुछ ऐसे सबूत रहे होंगे जिनकी वजह से उसे टार्गेट किया गया हो।

चिंतित है सिख समुदाय के लोग

तिकुनिया भारत नेपाल बॉर्डर के पास बसा एक मिश्रित आबादी का कस्बा है जहां बड़ी आबादी सिखों की है जो यहां कृषि करते हैं। यहां दो बड़े सिख गुरुद्वारे हैं और एक सिख सैनिक स्कूल है। इस कस्बे पर सिख आबादी की छाप साफ नजर आती है। जगह-जगह कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाली बड़ी मशीनें खड़ी दिखाई देती हैं। इस घटना के बाद यहां की सिख आबादी इस क्षेत्र में अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। एक सिख नौजवान गंभीर होते हुए कहता है, ‘इस घटना ने मंत्री और सिखों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। हम नहीं जानते आगे क्या होगा।’

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