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ब्यूरोक्रेट्स की चिट्ठी से पहले भी नपे नेता:9 साल पहले जब एक चिट्ठी ने किया सिंचाई घोटाले का खुलासा, अजित पवार को देना पड़ा था इस्तीफा

12 दिन पहले
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मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की चिट्ठी ने सोमवार को अपना असर दिखा दिया। उनके आरोपों पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिए। इसके बाद महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। देशमुख ने 6 लाइन के अपने इस्तीफे में लिखा- आज माननीय हाईकोर्ट की ओर से एडवोकेट जयश्री पाटिल की याचिका पर CBI जांच का आदेश दिया गया है। इसलिए मैं नैतिकता के आधार पर गृह मंत्री के पद से इस्तीफा देता हूं।

देशमुख के इस्तीफे ने महाराष्ट्र में 9 साल पुरानी एक कहानी को दोहराया है। उस वक्त भी एक चिट्ठी की वजह से घोटाले से पर्दा हटा था और एनसीपी के अजित पवार को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। क्या है पूरी कहानी? आइए जानते हैं...

चीफ इंजीनियर की चिट्ठी से सामने आया घोटाला
फरवरी 2012 की बात है। सिंचाई विभाग में चीफ इंजीनियर रहे विजय पंढारे ने उस वक्त के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और राज्यपाल के. शंकरनारायणन को एक चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 10 सालों से इरिगेशन के काम में आने वाला पैसा नेताओं, ठेकेदारों और भ्रष्ट अधिकारियों की जेब में जा रहा है।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG ने भी सिंचाई विभाग की इन गड़बड़ियों को उजागर किया। इकोनॉमिक सर्वे की एक रिपोर्ट में सामने आया कि 2001-02 से 2011-12 के बीच सिंचाई के लिए 70 हजार करोड़ खर्च किए गए, लेकिन सिंचाई क्षमता में सिर्फ 0.1% की बढ़ोतरी हुई।

महाराष्ट्र में सिंचाई विभाग की अनियमितताओं को उजागर करने वाले इंजीनियर विजय पंढारे। 2013 में इन्होंने आम आदमी पार्टी ज्वॉइन कर ली।
महाराष्ट्र में सिंचाई विभाग की अनियमितताओं को उजागर करने वाले इंजीनियर विजय पंढारे। 2013 में इन्होंने आम आदमी पार्टी ज्वॉइन कर ली।

पवार पर आंख मूंदकर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देने का आरोप
अजित पवार पर आरोप लगे कि 2009 में उन्होंने जल संसाधन मंत्री रहते हुए आंख मूंदकर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी। यानी पहले प्रोजेक्ट कम लागत में शुरू कर दिए जाते थे और बाद में उनका बजट बदल दिया जाता था। अनुमान लगाया गया कि ये करीब 70 हजार करोड़ रुपए का घोटाला हो सकता है।

इनमें एक चर्चित मामला है कोंढणा डैम का। आरोप लगा कि इस प्रोजेक्ट का बजट बिना किसी जांच के 80 करोड़ से बढ़ाकर 435 करोड़ कर दिया गया। इस प्रोजेक्ट को बंद करना पड़ा और इससे जुड़े 4 इंजीनियरों को सस्पेंड कर दिया गया।

घोसीखुर्द डैम की तस्वीर। विदर्भ इलाके में चल रही ऐसी 38 सिंचाई परियोजनाओं का बजट बिना किसी मूल्यांकन के बढ़ाने का आरोप लगा।
घोसीखुर्द डैम की तस्वीर। विदर्भ इलाके में चल रही ऐसी 38 सिंचाई परियोजनाओं का बजट बिना किसी मूल्यांकन के बढ़ाने का आरोप लगा।

आखिरकार पवार को देना पड़ा इस्तीफा
एक चिट्ठी से शुरू हुए इस विवाद में आखिरकार सितंबर 2012 में अजित पवार को इस्तीफा देना पड़ा। नवंबर 2012 में राज्य सरकार की एक रिपोर्ट आई जिसमें कहा गया कि पिछले 10 सालों में सिंचित क्षेत्र में 28% की बढ़ोतरी हुई है। इसके बाद मुख्यमंत्री ने अजित पवार को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया। हालांकि विपक्ष के दबाव में एक SIT बनाई गई, लेकिन उसने अपनी जांच रिपोर्ट में अजित पवार को क्लीन चिट दे दी।

सरकार बदली तो फिर खुली फाइल, पर गिरफ्तारी नहीं हुई
2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। देवेंद्र फडणवीस ने पवार को जेल की चक्की पिसवाने का वादा किया। सरकार बनने के बाद एंटी-करप्शन ब्यूरो से जांच भी शुरू करवाई गई, लेकिन पवार को गिरफ्तार नहीं किया गया। 2020 में जब अजित पवार ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला लिया, तब उनको सिंचाई घोटाले समेत कई मामलों में राहत मिल गई। घोटाले की चिट्ठी लिखने वाले विजय पंढारे बाद में आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए और उन्होंने चुनाव भी लड़ा।

23 नवंबर 2019 की सुबह भाजपा ने एनसीपी के अजित पवार की अगुवाई में सरकार बना ली थी। हालांकि, केवल 80 घंटे के बाद सरकार गिर गई थी।
23 नवंबर 2019 की सुबह भाजपा ने एनसीपी के अजित पवार की अगुवाई में सरकार बना ली थी। हालांकि, केवल 80 घंटे के बाद सरकार गिर गई थी।

नेताओं पर ब्यूरोक्रेट्स के आरोपों के और भी उदाहरण

महाराष्ट्र में नेताओं पर ब्यूरोक्रेट्स के आरोपों के कुछ और उदाहरण भी हैं। 1993 में पूर्व आईएएस अधिकारी जीआर खैरनार ने शरद पवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे जिससे उनकी खूब किरकिरी हुई थी। 1995 के चुनावों में भी इस मुद्दे ने असर दिखाया। लिहाजा पवार जीत का परचम नहीं लहरा सके। शिवसेना-बीजेपी गठबंधन ने कुल 138 सीटों पर जीत हासिल की जबकि कांग्रेस केवल 80 सीटें ही जीत सकी।

एक मामला उस वक्त पुणे के कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह का भी है, जब उन्होंने महाराष्ट्र के गृह राज्यमंत्री रमेश बागवे के क्रिमिनल रिकॉर्ड को देखते हुए उनके पासपोर्ट आवेदन पर टिप्पणी की थी। हालांकि वो मामला कुछ दिनों में ठंडा पड़ गया था। अब देखना होगा कि परमबीर सिंह और अनिल देशमुख का ताजा मामला क्या रुख लेता है।

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