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  • As Soon As She Leaves The House, The Girl Becomes A Basket Of Alphonso Mangoes, Everyone's Eyes Are On Her While Walking On The Road.

बात बराबरी की:घर छोड़ते ही लड़की अल्फांसो आम की टोकरी बन जाती है, सड़क चलते हर किसी की नजर उसी पर रहती है

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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लगभग 10 साल पहले यही वक्त था, जब मैं लंदन की लाल ईंट से बनी इमारतों के बीच भटक रही थी। मुझे किराए पर कमरा चाहिए था। वाइटचैपल के जिस हॉस्टल में रहती, वो सेंट्रल लंदन से दूर था और महंगा भी। ऑनलाइन इश्तेहार खोजकर मकान-मालिकों को फोन करने लगी। दो-एक मकान पसंद आए, बात भी हुई, लेकिन एक जगह पेंच अटक गया। दरअसल वहां शेयर्ड फ्लैट थे, जिनमें कमरा तो आपका होता, लेकिन बगैर चिटकनी का। किचन और हॉल-वे बाकियों के साथ शेयर करना था।

जितने फ्लैट पसंद आए, सबके यही हाल। कहीं भी कमरा अंदर से बंद करने का रिवाज नहीं। मेरे देसी दिमाग के लिए ये सड़क पर रात बिताने जितना ही भयंकर था। ले-देकर एक श्रीलंकाई मकान-मालिक पर बात रुकी। था तो वो भी बगैर लॉक का, लेकिन फ्लैट में सारी लड़कियां ही थीं। इनसे कोई खतरा नहीं- ओनर ने हंसते हुए कहा। वो मेरा डर भांप चुका था।

लिखा-पढ़ी हुई और स्लेटी नीली दीवारों वाला कमरा मेरा मकान बन गया। वहां बगैर चिटकनी लगाए आराम से सोते हुए मैं उन तमाम बीते सालों को याद करती, जब अकेली लड़की होने के कारण अपने ही देश में मैंने जमकर धक्के खाए।

हैदराबाद के कुलीन परिवार ने मुंह फाड़कर कहा, ‘लड़की, तिस पर यंग और अकेली! अरे भई, ये घर है, कोई सराय नहीं’। इंदौर में कई झूठों की बंदनवार सजाई, तब जाकर एक अदद कमरा मिल सका। फॉरबेसगंज में एक परिवार के बीच ही घुसा दिया गया। झल्लाकर कई महीने मैंने होटल में काटे।

हर जगह बंदिशों की लंबी फेहरिस्त। रात 10 बजे की डेडलाइन थी, तब तक घर न पहुंचो तो मालिक-ए-मकान एक्सरे से मानो पूरा शरीर भेद डालते। कपडों पर खुली टिप्पणी तो नहीं हुई, लेकिन अबोला सेंसर हमेशा रहा। लड़कों से बाहर चाहे जितना हंसो-बतियाओ, लेकिन खबरदार जो घर लेकर आए।

खुन्नस में एक रोज मैं न सिर्फ एक मित्र को लेकर आई, बल्कि दरवाजा भी भिड़ा दिया। पापों में पाप- महापाप के कुछ ही दिनों बाद मुझे कमरा खाली करने का नोटिस मिल गया। मैं तैयार थी।

दक्षिण के लगभग सभी शहरों में लड़की किराएदारिनों की पारी लगती कि वे गेट से बाहर रंगोली बनाया करें। इनकार के बाद मैं अलग-थलग पड़ गई। किसी के यहां प्याज की गंध पर मनाही रही तो कोई फ्लैट देने से पहले शर्त बदता- पहले परिवार हाजिर करो! कहना न होगा कि उम्र का मोटा हिस्सा दिलपसंद मकान तलाशते बीत गया।

ये किस्से तब भी पुराने हैं, लेकिन अकेली लड़की को लेकर सोच साल 2022 में भी नहीं बदली। हाल में चेन्नई की एक लड़की ने ट्विटर पर मकान को लेकर पोस्ट डाली। पेशे से पत्रकार ये युवती भारती सिंघरावल दक्षिण के किसी दूसरे हिस्से से थीं और चेन्नई में मकान तलाश रही थीं।

वे लिखती हैं- मैंने एक घर लगभग पसंद कर लिया। मकान मालिक से बात भी हो गई, लेकिन तभी उसी बिल्डिंग में रहते एक युवक के ऑब्जेक्शन पर मकान हाथ से निकल गया। युवक को ऐतराज था कि सिंगल लड़की के आने से बिल्डिंग का माहौल खराब हो जाएगा। भारती पोस्ट में आगे बताती हैं- मजे की बात ये थी कि ऐतराज उठाने वाला लड़का खुद सिंगल था। हालांकि, उसके रहने का माहौल से कोई लेना-देना नहीं।

लड़की के पढ़ने-लिखने तक ठीक है। नौकरी भी ठीक है जब तक अपना शहर न छोड़ना पड़े, लेकिन घर से निकलते ही जवान लड़की अल्फांसो आम की वो टोकरी बन जाती है, जो फलों के मालिक से बिछुड़ गई हो और बीच सड़क पर पड़ी हो। हर गुजरता आदमी उसे लूटने या उस पर कहानी कहने के लिए आजाद है।

वहीं, सिंगल लड़के के साथ एक ही डर रहता है कि वो बेचारा घर को साफ नहीं ‘रख सकेगा’ या फिर, दोस्तों के साथ ‘थोड़ी’ हुल्लड़बाजी करेगा। बाकी लड़के तो नेक ही होते हैं। जरूरत पड़े तो रात-बेरात काम भी आते हैं, जबकि लड़कियां खुद में जिम्मेदारी होती हैं।

सिंगल औरतों से नफरत की जड़ें बूढ़े पीपल की जड़ों से भी गहरे दबी हुई हैं। 17वीं सदी में यूरोप समेत लगभग पूरा पश्चिम 20 पार की कुंआरी लड़कियों को टेढ़ी नजर से देखता और उन्हें ओल्ड मेड कहता। यानी खूसट नौकरानी! कोई उन पर डायन होने का शक करता तो कोई पागल मान कोड़े बरसाता।

इसी दौर में इंग्लैंड की एक लेखिका जेन बार्कर ने कहा था- मैं पच्चीस की हूं। अमीर भी। तब भी डरती हूं। बग्घी में अकेली घूमते हुए मैं उन हवाओं को सुनती हूं, जो मुझे बूढ़ी नौकरानी या चुड़ैल फुसफुसाती हैं। उन हाथों से डरती हूं, मुझे देखकर जो काम रोक देते हैं कि कहीं उन पर भी मेरे कुंआरेपन की छाया न पड़ जाए!

यही वो वक्त था, जब इंग्लैंड में मैरिज ड्यूटी एक्ट लागू हुआ। इसके तहत अविवाहित पुरुषों के अलावा गैर-शादीशुदा औरतों को भी मोटा जुर्माना भरना होता- क्योंकि उन्होंने शादी नहीं की थी। दरअसल तब बड़ी संख्या में औरतें शादी से पीछे हटने लगी थीं। साहित्य और विज्ञान में उनका दखल बढ़ा था। तभी औरतों पर लगाम कसने के लिए इस समेत कई टैक्स सोचे गए। हालांकि, धीरे-धीरे टैक्स तो हट गए, लेकिन अकेली औरत अपने-आप में गाली बनी रही।

कहा जाने लगा कि औरत के शरीर में एक घड़ी होती है, जो टिकटिकाती रहती है। वो चेताती रहती है कि जब तक तुम्हारा मुंह ओसधुले कमल जैसा ताजा है और शरीर में लोच है- फट से ब्याह रचा लो और झट से चिलबिल्ले बच्चे पैदा कर लो, वरना बात हाथ से निकल जाएगी।

नए वक्त की औरतें इसी सोच से बगावत कर रही हैं। वे पढ़ रही हैं। लिख रही हैं। और अपने लिए एक कमरा भी तलाश रही हैं। वो कमरा, जहां बैठकर वे दोस्तों को चिट्ठियां लिख सकें। देर रात दफ्तर का काम कर सकें। या फिर बगैर खाना पकाए कई-कई दिन नूडल्स पर बिता सकें। बिना किसी दखल के। वो कमरा, जिसके ताले की चाबी उनके पर्स में सुस्ताती हो और रात-बेरात जिसे खोलते हुए उन्हें किसी सवाल का जवाब न देना पड़े।